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    सूरए आले इमरान; आयतें १००-१०४ (कार्यक्रम 98)

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    आइए पहले सूरए आले इमरान की आयत संख्या १००-१०१ की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا إِنْ تُطِيعُوا فَرِيقًا مِنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ يَرُدُّوكُمْ بَعْدَ إِيمَانِكُمْ كَافِرِينَ (100) وَكَيْفَ تَكْفُرُونَ وَأَنْتُمْ تُتْلَى عَلَيْكُمْ آَيَاتُ اللَّهِ وَفِيكُمْ رَسُولُهُ وَمَنْ يَعْتَصِمْ بِاللَّهِ فَقَدْ هُدِيَ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ (101)हे ईमान वालो! यदि तुम (आसमानी) किताब (रखने) वालों के एक गुट का अनुसरण करोगे तो वह तुमको ईमान के पश्चात, कुफ़्र की ओर पलटा देगा। (3:100) और तुम किस प्रकार कुफ़्र अपनाते हो जबकि तुम्हारे लिए ईश्वरीय आयतों की तिलावत की जाती है और ईश्वर का पैग़म्बर तुम्हारे बीच है। और जो कोई भी ईश्वर (के धर्म और उसकी किताब) से नाता जोड़े रहे निःसन्देह, सीधे मार्ग की ओर उसका मार्गदर्शन हुआ है। (3:101) पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के मदीना नगर आने और वहां इस्लामी शासन स्थापित होने के पश्चात इस नगर के विभिन्न क़बीलों के बीच शांति स्थापित हो गई। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की छत्रछाया में औस तथा ख़ज़रज नामक दो क़बीलों के बीच शांति स्थापित हो गई। यह दोनों क़बीले दसियों वर्षों से एक-दूसरे के साथ युद्धरत थे। अब वे मिल-जुलकर रहने लगे। यहूदियों के कुछ नेताओं ने जो मुसलमानों की इस एकता तथा समरसता को अपने लिए हानिकारक समझ रहे थे पुनः मुसलमानों के बीच युद्ध भड़काने का षड्यंत्र रचना आरंभ किया। इस परिप्रेक्ष्य में उन्होंने एक मुसलमान व्यक्ति को यह दायित्व सौंपा कि वह पुराने युद्धों की बातें याद दिला कर औस तथा ख़ज़रज नामक दोनों क़बीलों के सरदारों को उत्तेजित करे। यहूदियों की यह चाल पूरी हो गई और मुसलमानों के बीच एक गंभीर युद्ध की संभावना उत्पन्न हो गई। उसी समय ये आयतें उतरी जिनमें ईश्वर ने मुसलमानों को चेतावनी दी कि वे शत्रुओं के षड्यंत्रों की ओर से सचेत रहें और यह जान लें कि शत्रु का लक्ष्य उन्हें ईश्वर तथा एक-दूसरे से दूर करना है। लोगों के बीच एकता का सबसे अच्छा केन्द्र बिंदु, ईश्वर की किताब का अस्तित्व है तथा ईश्वर के मार्ग और पैग़म्बर के आदेशों का पालन है अतः मुसलमानों को सदैव एकता की इस रस्सी को मज़बूती से थामे रहना चाहिए और कभी भी मित्र समान शत्रुओं के फूट डालने वाली बातों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। इन आयतों से हमने यह सीखा कि शत्रु की इच्छा ईश्वर के पैग़म्बर औउ उसकी किताब के प्रति हमारे ईमान को कमज़ोर बनाना है अतः हमें ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे उसकी यह इच्छा पूरी हो सके। अपने आज के ईमान पर घमण्ड नहीं करना चाहिए, कितने ही ऐसे ईमान वाले थे जिनका अंत बुरा हुआ और वे काफ़िर होकर मरे। समाज में ईश्वरीय क़ानून और आसमानी किताब का होना ही, पथभ्रष्टता को रोकने के लिए काफ़ी नहीं है बल्कि ईश्वरीय नेता की उपस्थिति और उसका अनुसरण भी आवश्यक है। मनुष्य का प्रयास उसी दशा में उसे लक्ष्य तक पहुंचा सकता है कि जब वह सीधे मार्ग पर चल रहा हो न कि ग़लत तथा टेढ़े-मेढ़े मार्ग पर।आइए अब सूरए आले इमरान की आयत संख्या १०२ और १०३ की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ حَقَّ تُقَاتِهِ وَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنْتُمْ مُسْلِمُونَ (102) وَاعْتَصِمُوا بِحَبْلِ اللَّهِ جَمِيعًا وَلَا تَفَرَّقُوا وَاذْكُرُوا نِعْمَةَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ كُنْتُمْ أَعْدَاءً فَأَلَّفَ بَيْنَ قُلُوبِكُمْ فَأَصْبَحْتُمْ بِنِعْمَتِهِ إِخْوَانًا وَكُنْتُمْ عَلَى شَفَا حُفْرَةٍ مِنَ النَّارِ فَأَنْقَذَكُمْ مِنْهَا كَذَلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمْ آَيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ (103)हे ईमान लाने वालो, ईश्वर से वैसे डरो जैसे उससे डरना चाहिए और मुस्लिम रहते हुए ही मरना। (3:102) और तुम सब मिलकर ईश्वर की रस्सी को मज़बूती से थामे रहो और बिखरो नहीं और अपने ऊपर ईश्वर की उस विभूति को याद करो जब तुम एक-दूसरे के शत्रु थे तो उसने तुम्हारे दिलों में एक-दूसरे के लिए प्रेम जगाया तो तुम उसकी विभूति की छाया में एक-दूसरे के भाई बन गए (जैसा कि) तुम नरक की कगार पर थे और ईश्वर ने तुम्हें उससे मुक्ति दिलाई। ईश्वर अपनी निशानियों को इस प्रकार तुम्हारे लिए स्पष्ट रूप से वर्णित करता है कि शायद तुम लोग मार्गदर्शित हो जाओ। (3:103) ईश्वरीय पैग़म्बरों को विद्यालय में, ईमान वालों के प्रशिक्षण व प्रगति के लिए, जो इस विद्यालय के छात्र हैं, बड़ी कक्षाओं में मौजूद हैं। हर भलाई और परिपूर्णता के कुछ चरण हैं अतः ईश्वर पर ईमान रखने वाले व्यक्ति को सदा ही अगले चरण तक पहुंचने के प्रयास करते रहना चाहिए। ईश्वर की ओर से मनुष्य को दी गई एक विभूति, ज्ञान, उन परिपूर्णताओं में से है जिसमें अपनी प्रगति के लिए पैग़म्बरे इस्लाम भी सदैव ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा करते थे कि प्रभुवर मेरे ज्ञान में वृद्ध कर दे। ईमान तथा ईश्वर से डरने के भी कुछ चरण हैं। इस आयत में ईश्वर, ईमान वालों को उसके अगले चरण की ओर बढ़ने की सिफ़ारिश और प्रोत्साहन करते हुए कहता है कि ईश्वर से ऐसा भय रखो कि जो उस पर ईमान के लाएक़ हो, ऐसा भय जो तुम्हें बुराइयों से दूर भी रखे और भलाई करने पर प्रोत्साहित भी करे। आयत संख्या १०३ मुसलमानों को ईश्वरीय धर्म की छत्र-छाया में एकता व एकजुटता का निमंत्रण देते हुए कहती है कि यह मत भूलो कि ईश्वर पर ईमान लाने से पूर्व तुम लोगों के बीच किस प्रकार विवाद और द्वेष व्याप्त था और तुम लोग बुराई की ऐसी कगार पर जीवन व्यतीत कर रहे थे जहां से तबाही और गंदगी में तुम्हारे गिरने और तबाह होने की संभावना हर पल पाई जाती थी अतः तुम लोग ईश्वर के प्रति कृतज्ञ रहो कि उसने तुम्हारे दिलों को समीप लाकर तुम्हारे बीच ऐसा प्रेम उत्पन्न कर दिया कि तुम भाइयों के समान जीवन व्यतीत करने लगे। इन आयतों से हमने सीखा कि अच्छा अंत तथा ईमान के साथ मृत्यु, ईश्वर से भय और पवित्रता से ही संभव है। मनुष्य किस प्रकार मरता है यह उसकी जीवन शैली पर निर्भर है। भाषा, संप्रदाय और राष्ट्रीयता के आधार पर समाज में एकता, सुदृढ़ व स्थायी नहीं हो सकती। वास्तविक एकता ईश्वरीय धर्म की छाया में ही प्राप्त हो सकती है जो सदैव ठोस, सुदृढ़ व स्थायी है। अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक व सामरिक समझौतों के आधार पर होने वाली एकता टिकाऊ नहीं होती, वास्तविक एकता दिलों के प्रेम से प्राप्त होती है जो ईश्वर के हाथ में है। ईश्वर की दी हुई विभूतियों का स्मरण उससे प्रेम और उसके आदेशों के पालन का कारण बनता है जैसा कि ईश्वरीय कृपाओं की ओर से निश्चेतना विभूतियों के समाप्त होने का कारण बनती है।आइये अब सूरए आले इमरान की आयत नंबर 104 की तिलावत सुनें।وَلْتَكُنْ مِنْكُمْ أُمَّةٌ يَدْعُونَ إِلَى الْخَيْرِ وَيَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَأُولَئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ (104)और तुम मुसलमानों के बीच एक ऐसा गुट होना चाहिए जो लोगों को भलाई का निमंत्रण दे, अच्छे कार्यों की ओर आमंत्रित करे और बुराइयों से रोके और ऐसे ही लोग सफलता प्राप्त करने वाले हैं। (3:104) मनुष्य का जीवन सामाजिक है अर्थात वह अन्य लोगों के साथ मिल कर रहता है और सामाजिक जीवन में लोगों क व्यवहार व्यक्तिगत परिणामों के अतिरिक्त समाज के अन्य सदस्यों पर भी प्रभाव डालता है। मानव समाज एक बड़ी नौका के समान है जिसके किसी भाग में यदि कोई अनभिज्ञ व्यक्ति या शत्रु छेद कर देता है तो यह कार्य संपूर्ण नौका और उसमें सवार अन्य लोगों के डूबने का कारण बनता है अतः बुद्धि के आदेशानुसार समाज के सभी लोग एक दूसरे के प्रति उत्तरदायी हैं ताकि मानवता की इस नौका को कोई क्षति न पहुंच सके।बुद्धि के इस आदेश को धर्म ने अच्छे काम के निमंत्रण और बुराई से रोकने जैसे कर्तव्य का नाम दिया है और हर मुसलमान को प्रतिबद्ध किया है कि जहां कहीं भी भलाई और अच्छे कर्मों को छोड़ दिया गया हो वह लोगों को उनकी ओर आमंत्रित करे और जहां कहीं भी बुराई देखे उससे लोगों को रोके। इस सीमा तक भलाई का आदेश देना और बुराई से रोकना हर एक का कर्तव्य है सभी को अपनी क्षमता के अनुसार यह काम करना चाहिए।परंतु यह आयत कहती है कि सभी मुसलमानों के अतिरिक्त इस काम क लिए एक प्रशिक्षित एवं व्यवस्थित गुट भी होना चाहिए जो पूरी गंभीरता और शक्ति के साथ समाज में भलाई प्रचलित करने और बुराई करने का प्रयास करे। जैसा कि यदि कोई अनभिज्ञ या क़ानून तोड़ने वाला चालक वनवे सड़क पर गाड़ी ले जाए तो दूसरे चालक भी उसे हार्न बजा कर या हेडलाइट्स जला कर चेतावनी देते हैं और ट्रेफ़िक पुलिस भी जुर्माना करके उसे दंडित करती है।रोचक बात यह है कि भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने की यह आयत ऐसी दो आयतों के बीच में है जिनमें लोगों को एकता व एकजुटता की सिफ़ारिश की गई है। इसका अर्थ यह है कि भलाई का आदेश और उसका प्रचलन ऐसे समाज में संभव है जिसमें फूट न पड़ी हो और सामाजिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त न हो अन्यथा इस प्रकार का निमंत्रण प्रभावी नहीं होगा।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लामी समाज में लोगों के सामाजिक व्यवहार पर भी दृष्टि रखने के लिए कुछ गुटों का होना आवश्यक है ताकि जहां भी आवश्यक हो वे बुराइयों की रोकथाम करें और समाज में बुराइयों व अशिष्ट बातों को प्रचलित न होने दें।सफलता व कल्याण समाज की बुराइयों को समाप्त करने हेतु प्रयासरत रहने में है न कि सामाजिक मामलों से कट कर अलग-थलग रहने में।ईमान वालों को केवल अपने कल्याण व मोक्ष के विचार में नहीं रहना चाहिए बल्कि उन्हें समाज के अन्य सदस्यों की प्रगति व मोक्ष का भी ध्यान रखना चाहिए।भलाइयों का आदेश देने को बुराइयों से रोकने पर वरीयता प्राप्त है क्योंकि यदि समाज में सही और भले कामों के मार्ग खुल जाएं ग़लत मार्ग अपने आप कम हो जाएंगे।