islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए आले इमरान; आयतें १०५-१०९ (कार्यक्रम 99)

    सूरए आले इमरान; आयतें १०५-१०९ (कार्यक्रम 99)

    Rate this post

    आइए पहले सूरए आले इमरान की १०५वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ تَفَرَّقُوا وَاخْتَلَفُوا مِنْ بَعْدِ مَا جَاءَهُمُ الْبَيِّنَاتُ وَأُولَئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ (105)(हे मुसलमानो!) उन लोगों की भांति न हो जाना जो ईश्वरीय धर्म के बारे में भ्रमित हो गए और उनमें फूट पड़ गई हालांकि उनके लिए स्पष्ट तर्क और नीतियां आ चुकी थीं। और ऐसे ही लोगों के लिए कड़ा दण्ड है। (3:105) जातीय व सांप्रदायिक मतभेदों या ऐतिहासिक समस्याओं के आधार पर फूट डालने वाली बातों की प्रस्तुति वह ख़तरा है जो ईश्वरीय धर्मों के अनुयाइयों को सदैव लगा रहता है। पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि ईश्वर ने सभी ईमान वालों को एकता व सहहृदयता का निमंत्रण देते हुए उन्हें एक-दूसरे का भाई बताया है। इस आधार पर ईश्वर में आस्था रखने वालों के बीच एक वैचारिक संबन्ध और संपर्क पाया जाता है तथा भौगोलिक सीमाएं उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं कर सकतीं। जैसाकि सामयिक सीमाएं भी अतीत के एकेश्वरवादियों को भविष्य के एकेश्वरवादियों से अलग नहीं कर सकतीं। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने आज से शताब्दियों पूर्व कहा था कि मेरे भाई वे लोग हैं जो भविष्य में आने वाले हैं। उन्होंने मुझको नहीं देखा परन्तु वे मुझपर ईमान लाएंगे। वे मेरे वास्तविक भाई हैं। जी हां, ईश्वर पर ईमान तथा आस्था, एकता का दृढ़तम घ्रुव है और इसे सभी धर्मों के अनुयाइयों, विशेषकर मुसलमानों के बीच सहहृदयता का कारण बनना चाहिए। बड़े खेद के साथ कहना पड़ता है कि भौतिक हित या फिर राजनैतिक उद्देश्य इस बात का कारण बन गए हैं कि कभी मोमिनों के बीच एसा भीष्ण युद्ध हुआ कि एसा युद्ध कभी उनके तथा ईश्वरीय धर्म के शत्रुओं के बीच भी नहीं हुआ होगा। यह आयत सबको सावधान करते हुए कहती है कि इन मतभेदों का परिणाम लोक तथा परलोक में बहुत ही कड़ा दण्ड है। इस आयत से हमने यह सीखा कि बहुत से मतभेदों का स्रोत, अज्ञानता नहीं है। कुछ लोग तो सत्य को समझने के बावजूद अपने हितों तथा इच्छाओं की पूर्ति के लिए सत्य के साथ युद्ध करते हैं और ईमान वालों के बीच फूट डालने का प्रयास करते हैं। अतीत के लोगों के इतिहास से हमे पाठ सीखना चाहिए। फूट और मतभेद फैलाने वाली जातियों को क्या कल्याण प्राप्त हो सका, या फिर उनको जो एकदूसरे के साथ एकता एवं सहहृदयता के साथ रहे।आइए अब सूरए आले इमरान की आयत संख्या १०६ और १०७ की तिलावत सुनते हैं।يَوْمَ تَبْيَضُّ وُجُوهٌ وَتَسْوَدُّ وُجُوهٌ فَأَمَّا الَّذِينَ اسْوَدَّتْ وُجُوهُهُمْ أَكَفَرْتُمْ بَعْدَ إِيمَانِكُمْ فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنْتُمْ تَكْفُرُونَ (106) وَأَمَّا الَّذِينَ ابْيَضَّتْ وُجُوهُهُمْ فَفِي رَحْمَةِ اللَّهِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ (107)प्रलय के दिन कुछ चेहरे सफेद और प्रकाशमई होंगे जबकि कुछ चेहरे काले और अंधकारमय होंगे। तो जिनके चेहरे काले हो गए होंगे उनसे यह पूछा जाएगा कि तुम ईमान लाने के पश्चात फिर क्यों काफ़िर हो गए थे? लो अब अपने कुफ़्र के कारण ईश्वरीय दण्ड का स्वाद चखो। (3:106) और जिन लोगों के चेहरे सफ़ेद होंगे वे ईश्वर की दया व कृपा की छाया में होंगे जहां वे सदैव रहेंगे। (3:107) संसार में हम जो भी काम करते हैं चाहे वह अच्छा हो या बुरा उसके दो स्वरूप होते हैं। परोक्ष और अपरोक्ष। इस कार्य का अपरोक्ष और विदित स्वरूप तो वहीं होता है जो हम देखते और सुनते हैं जबकि उसका परोक्ष स्वरूप वह प्रभाव है जो उस कार्य के कारण हमारी आत्मा, मानस और व्यवहार पर पड़ता है। जिस प्रकार से संसार अपरोक्ष और विदित है तथा प्रलय उसका परोक्ष रूप है उसी प्रकार से कर्मों का विदित रूप संसार में दिखाई देता है परन्तु उनका परिणाम प्रलय में सामने आएगा। अतः प्रलय के दिन मनुष्य के कार्यों का स्वरूप उसके विदित स्वरूप के अनुकूल साक्षात होगा और मनुष्य का परोक्ष स्पष्ट हो जाएगा। यह आयतें प्रलय के दिन उपस्थित लोगों के चेहरों के काले या सफ़ेद होने का वर्णन करती हैं जो उनके परोक्ष कर्मों के स्वरूप का परिचायक हैं। संसार में सत्य का इन्कार या उसे छिपाना मनुष्य के चेहरे या फिर उसके व्यवहार से ईमान के प्रकाश को समाप्त करके उसके चेहरे पर अंधकार और कालिख़ पोत देता है। इससे बढ़कर कड़ा दण्ड और क्या होगा कि मनुष्य का आंतरिक कूरूप अन्य लोगों के सामने आ जाए जैसाकि प्रलय में ईमान वालों का उज्जवल व प्रकाशमई चेहरा उनके पवित्र तथा सुन्दर व्यवहार का परिचायक है जो उनके लिए ईश्वर की असीम दया व कृपा को लिए हुए है। इन आयतों से हमने यह सीखा कि यदि हम संसार में सत्यवादी और अत्याचारग्रस्त चेहरों के साथ अन्य लोगों के विश्वास और आश्वासन को अपनी ओर आकृष्ट कर लें तो फिर प्रलय के दिन हमारा चेहरा वही होगा जो आज हमारा व्यवहार है। हमें अपने आज के ईमान पर घमण्ड नहीं करना चाहिए क्योंकि मोमिनों को भी काफ़िर होने का ख़तरा लगा रहता है। आइए अब सूरए आले इमरान की आयत संख्या १०८ तथा १०९ की तिलावत सुनते हैं।تِلْكَ آَيَاتُ اللَّهِ نَتْلُوهَا عَلَيْكَ بِالْحَقِّ وَمَا اللَّهُ يُرِيدُ ظُلْمًا لِلْعَالَمِينَ (108) وَلِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَإِلَى اللَّهِ تُرْجَعُ الْأُمُورُ (109)ये ईश्वरीय किताब की आयते हैं जिन्हें हम सत्य के साथ तुम्हारे लिए तिलावत करते हैं और ईश्वर संसार वालों में से किसी पर भी अत्याचार का इरादा नहीं रखता। (3:108) (क्योंकि) जो कुछ आकाशों और धरती में है वह सबका सब केवल ईश्वर का ही है और हर वस्तु और हर बात की वापसी ईश्वर ही की ओर है। (3:109) यह आयत पैग़म्बर और मुसलमानों को संबोधित करते हुए इस्लाम के एक महत्वपूर्ण विश्वास की ओर संकेत करती है और वह है ईश्वरीय न्याय। इस विश्वास के अनुसार ईश्वर, मनुष्य की क्षमता व शक्ति से अधिक उसपर कोई बात अनिवार्य नहीं करता और न ही अच्छे कर्मों का फल और बुरे कर्मों का दण्ड देने में उसपर कोई अत्याचार करता है। यदि प्रलय के दिन कुछ लोगों का चेहरा सफ़ेद और कुछ का काला होगा तो यह न तो ईश्वर की इच्छा है और न ही मनुष्य की विवश्ता बल्कि यह संसार में किये गए उसके कार्य हैं जो प्रलय के दिन इस रूप में दिखाई देंगे। प्रलय के दिन यदि कोई नरक में जाएगा तो ईश्वर ने उसपर अत्याचार नहीं करना चाहा है बल्कि अपने बुरे कर्मों के कारण स्वयं उसने नरक की इच्छा व्यक्त की है। मूलरूप से अन्य लोगों पर अत्याचार करने का कारण अज्ञान है या विवश्ता और आवश्यकता या फिर अपनी शक्ति का प्रदर्शन और प्रतिशोध। ईश्वर जो आकाशों, असीमित गृहों और नक्षत्रों तथा धरती के अनगिनत जीवों का स्वामी है, उसे मनुष्यों के एक गुट पर अत्याचार करने या उनके समक्ष अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की क्या आवश्यकता है? वह जो हमें दूसरों के अत्याचारों से बचाता है, किस प्रकार संभव है कि स्वयं हमारे ऊपर वह अत्याचार करे। वह जो बुराई, अपवित्रता और अत्याचार से सबसे अधिक अवगत है, किस प्रकार से एक चींटी पर अत्याचार कर सकता है? वह जिसने दया व कृपा के आधार पर हमारी सृष्टि की रचना की है किस प्रकार अपनी ही रचनाओं पर अत्याचार करेगा? इन आयतों से हमने यह सीखा कि जिस ईश्वर पर हम आस्था रखते हैं वह सृष्टि, बंदों पर कर्तव्य निर्धारण और कर्मों का फल देने में न्याय करता है और उसे अत्याचार की कोई आवश्यकता नहीं है। जिस प्रकार से सृष्टि का आरंभ ईश्वर की ओर से है उसी प्रकार से सृष्टि का अंत भी उसी की ओर है। संसार उसकी शक्ति या उसके शासन क्षेत्र से बाहर नहीं है। जो कुछ हम इस संसार में करते हैं वह बाक़ी रहने वाला है, चाहे विदित रूप से समाप्त ही क्यों न हो जाए।