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    सूरए आले इमरान; आयतें ११०-११५ (कार्यक्रम 100)

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    आइए पहले सूरए आले इमरान की ११०वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।كُنْتُمْ خَيْرَ أُمَّةٍ أُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ تَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَتَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَتُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَلَوْ آَمَنَ أَهْلُ الْكِتَابِ لَكَانَ خَيْرًا لَهُمْ مِنْهُمُ الْمُؤْمِنُونَ وَأَكْثَرُهُمُ الْفَاسِقُونَ (110)तुम उत्तम समुदाय हो जो लोगों के लिए प्रकट किये गए हो। (क्योंकि) तुम भलाई का आदेश देते हो, बुराइयों से रोकते हो तथा ईश्वर पर ईमान रखते हो। और यदि आसमानी किताब रखने वाले (भी ऐसे ही धर्म पर) ईमान ले आएं तो उनके लिए बेहतर है, उनमें कुछ ही लोग ईमान वाले हैं जबकि अधिकांश अवज्ञाकारी हैं। (3:110) बहुत से लोग यह सोचते हैं कि धर्म, ईश्वर से मनुष्य के संपर्क के संबन्ध में उपासनाओं के कुछ शुष्क आदेशों का संग्रहमात्र है और इसी कारण वे धर्म को नमाज़, रोज़े, प्रार्थना और क़ुरआन तक ही सीमित रखते हैं जबकि धर्म के अधिकांश आदेश, मनुष्य के समाजिक पहलू और समाज के अन्य सदस्यों के साथ उसके संबन्धों को बताते हैं। यहां तक कि धर्म की दृष्टि में उस नमाज़ का महत्व अधिक है जो अन्य लोगों के साथ मिलकर पढ़ी जाए। इस्लामी समाज को हर प्रकार की बुराई व अपवित्रता से सुरक्षित रखने हेतु धर्म के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में से एक, भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने का कर्तव्य है। जैसाकि हमने पिछले कार्यक्रम में कहा था कि यह कर्तव्य दो चरणों में पूरा होता है। पहला चरण एक विशेष गुट द्वारा जो समाजिक व्यवहारों की देखभाल और उनके नियंत्रण का उत्तरदायी होता है। इसकी चर्चा इसी सूरे की आयत संख्या १०४ में की जा चुकी है। दूसरा चरण एक सार्वजनिक कर्तव्य के रूप में सभी मुसलमानों के लिए अनिवार्य है जिसकी ओर इस आयत मे संकेत किया गया है। यह ईश्वरीय आदेश बताता है कि मनुष्य केवल अपने सुधार का ही उत्तरदायी नहीं है बल्कि समाज में सुधार और उसकी प्रगति के प्रति भी उसका कर्तव्य बनता है। उसे भलाई और प्रेम के आधार पर समाजिक बुराइयों की समाप्ति और भलाइयों के विस्तार के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। यदि ऐसा हो गया तो फिर सबसे उत्तम समुदाय उभर कर सामने आएगा और एक अच्छे आदर्श के रूप में अन्य समाजों के सामने भी प्रस्तुत किया जा सकेगा। इस आयत से हमने यह सीखा कि बुराइयों का मुक़ाबला किये बिना, भलाई के आदेश का बहुत अच्छा परिणाम नहीं निकलेगा अतः भलाई के आदेश के साथ ही बुराई से रोकने को भी कहा गया है। दूसरों को भलाई का आदशे देने में आयु, शिक्षा, धन और पद की कोई भूमिका नहीं होती है। हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को चाहे वह जिस पद पर हो भलाई का आदेश दे सकता है और बुराई से रोक सकता है। लोगों के चयन और उन्हें वरीयता देने का मानदण्ड, भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने के कर्तव्य का पालन है। समाज में कोई भी पद ऐसा ही व्यक्ति ग्रहण कर सकता है जो लोगों की भलाई का इच्छुक हो और उनसे प्रेम करता हो। सबसे उत्तम समुदाय बनने के लिए ईमान और कर्म दोनों ही आवश्यक होते हैं और वे भी समाज में सुधार के मार्ग में, न कि अपने व्यक्तिगत कर्तव्यों की पूर्ति के लिए किया गया कर्म।आइए अब सूरए आले इमरान की १११वीं और ११२ वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।لَنْ يَضُرُّوكُمْ إِلَّا أَذًى وَإِنْ يُقَاتِلُوكُمْ يُوَلُّوكُمُ الْأَدْبَارَ ثُمَّ لَا يُنْصَرُونَ (111) ضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ الذِّلَّةُ أَيْنَ مَا ثُقِفُوا إِلَّا بِحَبْلٍ مِنَ اللَّهِ وَحَبْلٍ مِنَ النَّاسِ وَبَاءُوا بِغَضَبٍ مِنَ اللَّهِ وَضُرِبَتْ عَلَيْهِمُ الْمَسْكَنَةُ ذَلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانُوا يَكْفُرُونَ بِآَيَاتِ اللَّهِ وَيَقْتُلُونَ الْأَنْبِيَاءَ بِغَيْرِ حَقٍّ ذَلِكَ بِمَا عَصَوْا وَكَانُوا يَعْتَدُونَ (112)(हे मुसलमानों जान लो कि शत्रु) थोड़ी सी यातना के अतिरिक्त तुम्हें कोई नुक़सान नहीं पहुंचा सकेंगे और जब वे तुमसे युद्ध करेंगे तो तुम्हे पीठ दिखाकर भाग खड़े होंगे और फिर उनकी कोई सहायता नहीं होगी। (3:111) (क्योंकि) वे जहां कहीं भी पाए जाएंगे उनके ऊपर अपमान का ठप्पा लगा रहेगा, सिवाय इसके कि वे ईश्वर और लोगों की रस्सी को थाम लें। वे ईश्वरीय प्रकोप में फंस गए हैं और उनपर असहाय होने का ठप्पा लगा दिया गया है। यह इसलिए है कि वे ईश्वरीय आयतों का इनकार करते हैं और अकारण ही पैग़म्बरों की हत्या करते हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने अवज्ञा की है और (ईश्वर द्वारा निर्धारित) सीमा से आगे बढ़ गए हैं। (3:112) यह आयतें मुसलमानों के लिए शुभ सूचना हैं कि यदि तुम अपने ईमान में दृढ़ रहोगे और एकता व समरस्ता के साथ अच्छाई का आदेश देकर और बुराई से रोककर समाज को सुधारने का प्रयास करोगे तो तुम शत्रु की ओर से सुरक्षित रहोगे और फिर तुम्हें कोई भी ख़तरा नहीं होगा बल्कि यह शत्रु हैं जो तुम्हारे मुक़ाबले में घाटा उठाकर अपमानित होंगे। यह आयतें जो यहूदी जाति के बारे में हैं, पवित्र क़ुरआन की उन भविष्यवाणियों में से हैं जो अब तक पूरी हो रही हैं क्योंकि यहूदी जाति सदैव ही तुच्छ, हीन और अपमानित रही है और इसे कभी भी लोकप्रियता व सम्मान प्राप्त नहीं हो सका है। यहां तक कि आज भी जब संसार की अर्थव्यवस्था का प्रचार तंत्र यहूदी धनवानों के नियंत्रण में है संसार का एक ही स्वतंत्र देश यहूदी धर्म के आधार पर नहीं चलाया जाता और एक अतिग्रहणकारी सरकार के रूप में इज़राईल पूरे संसार की घृणा का पात्र बना हुआ है। एक डाकू तथा अपराधी की भांति जो लोगों में भय उत्पन्न करता है और कभी-कभी उसे बहुत अधिक धन भी मिल जाता है परन्तु कभी भी उसे सम्मान प्राप्त नहीं होता और लोग उससे घृणा करते हैं और द्वेष रखते हैं। इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर पर ईमान एक ऐसा मज़बूत दुर्ग है जो शत्रु को भीतर नहीं आने देता और उसकी पराजय व पलायन का कारण बनता है। सम्मान का रहस्य दो बातों में है। एक ईश्वर से मज़बूत संपर्क और दूसरे लोगों से अच्छे संबन्ध। यह दोनों रिश्ते यदि मज़बूत रहें तो कोई ही शक्ति समाज में घुसपैंठ करने में सक्षम नहीं होगी। अपराध व अतिक्रमण, अपमानित और असहाय होने का सबसे बड़ा कारण है। आइए अब सूरए आले इमरान की ११३वीं ११४वीं और ११५वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।لَيْسُوا سَوَاءً مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ أُمَّةٌ قَائِمَةٌ يَتْلُونَ آَيَاتِ اللَّهِ آَنَاءَ اللَّيْلِ وَهُمْ يَسْجُدُونَ (113) يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآَخِرِ وَيَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَيُسَارِعُونَ فِي الْخَيْرَاتِ وَأُولَئِكَ مِنَ الصَّالِحِينَ (114) وَمَا يَفْعَلُوا مِنْ خَيْرٍ فَلَنْ يُكْفَرُوهُ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالْمُتَّقِينَ (115)आसमानी किताब रखने वाले सारे के सारे एक समान हैं। उनमें से कुछ लोग ईश्वर की उपासना और आज्ञा पालन के लिए उठ खड़े होते हैं, मध्य रात्रि में वे ईश्वर की आयतों की तिलावत करते हैं और सज्दा करते हैं। (3:113) यह लोग ईश्वर और प्रलय पर ईमान रखते हैं, भलाई का आदेश देते हैं, बुराई से रोकते हैं, भले कार्य करने में तेज़ी दिखाते हैं। यही लोग (ईश्वर के) भले (बंदे) हैं। (3:114) और यह लोग जो भी भले कर्म करते हैं उसे कदापि अनदेखा नहीं किया जाएगा और ईश्वर, अपने से भय रखने वालों की दया से भलि भांति अवगत है। (3:115) पिछली आयतों में आसमानी किताब रखने वाले एक गुट द्वारा ईमान वालों को पथभ्रष्ट करने के षड्यंत्रों का पर्दाफ़ाश करने के पश्चात ईश्वर इन आयतों में आसमानी किताब वालों में उपस्थित भले लोगों की ओर संकेत करते हुए कहता है कि यह मत सोचो कि वे सभी एक समान हैं बल्कि उनमें से बहुत से लोग तुम मुसलमानों की ही भांति ईश्वर की उपसना करते हैं और रातों को जागकर सज्दे और रूकू करते हैं। वे लोग ईश्वर पर भी ईमान रखते हैं और प्रलय पर भी। वे समाज में भलाइयों के प्रसार के लिए भी प्रयासरत रहते हैं और स्वयं एक समाज से बराइयों को समाप्त करने की चेष्टा भी करते हैं। भले कर्म करने में वे सदैव अगुवा बने रहते हैं। स्वाभाविक है कि ईश्वर ऐसे लोगों के भले कर्मों की अनदेखी नहीं करेगा और वे उनकी दया व कृपा के पात्र बन जाते हैं क्योंकि ईमान तथा अच्छा कर्म जिसकी ओर से भी हो ईश्वर उसे स्वीकार करेगा। आसमानी किताब रखने वालों के बारे में क़ुरआन का यह दृष्टिकोण और उनके बारे में न्यापूर्ण रवैया, ग़ैर मुस्लिमों के साथ व्यवहार में मुसलमानों के लिए आदर्श होना चाहिए। यदि हम भी क़ुरआन की भांति न्यायप्रिय होंगे तो स्वयं हमारा व्यवहार लोगों को इस्लाम की ओर आकृष्ट करने का उत्तम मार्ग होगा और बहुत अधिक प्रचार की आवश्यकता नहीं होगी। इन आयतों से हमने यह सीखा कि अच्छाई और परिपूर्णता को, चाहे जिसकी ओर से भी हो, स्वीकार करना चाहिए। दूसरों की आलोचना करते समय उनकी अच्छाइयों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। ईश्वर की उपासना और उसकी प्रार्थना का उत्तम समय रात है जब सारे लोग सो रहे होते हैं। रात की व्यक्तिगत उपासना भी आवश्यक है और समाज के सुधान के लिए दिन में लोगों को भलाई का आदेश देना भी।भलाई का आदेश देना और बुराई से रोकना केवल इस्लाम से विशेष नहीं है बल्कि यह आदेश अन्य धर्मों में भी मौजूद है। भले कामों में एक-दूसरे से आगे बढ़ना, उसके मूल्य को बढ़ा देता है। पवित्र क़ुरआन ने भलाइयों के आदेश को बुराइयों से रोकने से पहले उल्लेख किया है क्योंकि यदि लोगों के बीच भलाई के द्वार खुल जाएं तो बुराई के द्वार स्वयं ही बंद हो जाएंगे।