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    सूरए आले इमरान; आयतें ११६-१२० (कार्यक्रम 101)

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    आइए पहले सूरए आले इमरान की ११६वीं और ११७वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا لَنْ تُغْنِيَ عَنْهُمْ أَمْوَالُهُمْ وَلَا أَوْلَادُهُمْ مِنَ اللَّهِ شَيْئًا وَأُولَئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ (116) مَثَلُ مَا يُنْفِقُونَ فِي هَذِهِ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا كَمَثَلِ رِيحٍ فِيهَا صِرٌّ أَصَابَتْ حَرْثَ قَوْمٍ ظَلَمُوا أَنْفُسَهُمْ فَأَهْلَكَتْهُ وَمَا ظَلَمَهُمُ اللَّهُ وَلَكِنْ أَنْفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ (117)निःसन्देह, जो लोग काफ़िर हुए उन्हें उनकी धन-संपत्ति और बाल-बच्चे, ईश्वर के मुक़ाबले, आवश्यकतामुक्त नहीं कर सकते। वे लोग नरक के वासी हैं और वे अनंत काल तक वहीं पर रहेंगे। (3:116) इस संसार में वे जो दान दक्षिणा करते हैं वह उस गर्म हवा की भांति है जो उस समुदाय के खेतों पर चले जिन्होंने स्वयं अपने ऊपर अत्याचार किया और वह हवा उनके खेतों को नष्ट कर दे। ईश्वर ने उनपर अत्याचार नहीं किया है बल्कि वे स्वयं अपने ऊपर अत्याचार करते हैं। (3:117) कुफ़्र अर्थात ईश्वर से इन्कार का एक कारण, धन व शक्ति होने की स्थिति में ईश्वर से आवश्यकतामुक्त होने का आभास है। कुछ लोग यह सोचते हैं कि धन-संपत्ति और बच्चों के पश्चात ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं है और यदि कोई ईश्वर है भी तो उन्हें उसकी कोई आवश्यकता नहीं रह गई है। यह आयत उनकी इस ग़लत धारणा को रद्द करते हुए कहती है कि यदि यह मान भी लिया जाए कि इस संसार में धन और बच्चे उनकी रक्षा करेंगे तो प्रलय के दिन वे क्या करेंगे? उस दिन उनका भीतरी कुफ़्र नरक की भड़कती हुई आग में प्रकट होगा और उन्हें सदा के लिए नरक में डाल देगा। ११७वीं आयत दान-दक्षिणा जैसे काफ़िरों के कुछ अच्छे कर्मों की ओर संकेत करते हुए कहती है कि इस मार्ग में वे जो कुछ भी ख़र्च करते हैं वह उन बीजों की भांति है जिन्हें अनुचित भूमि में बोया जाए। ऐसी धरती जिसे सदैव ही तेज़ हवाओं, तूफ़ान और सर्दी तथा गर्मी का सामना रहता है और उसमें कोई भी फ़सल नहीं उगती। कुफ़्र तथा ग़ैर ईश्वरीय इच्छाएं ऐसा तूफ़ान हैं जो काफ़िरों के भले कर्मों के खेतों पर चलता है और जो कुछ उन्होंने बोया है उसे नष्ट कर देता है। किसी भी कार्य का वास्तविक मूल्य उसे करने की वास्तविक प्रेरणा और लक्ष्य के कारण होता है न कि उसके विदित स्वरूप से। जिसने कुफ़्र जैसे पाप के कारण स्वयं ही अपने भले कर्मों को तबाही के ख़तरे में डाल दिया हो उसपर ईश्वर ने कोई अत्याचार नहीं किया है बल्कि यह तो स्वयं वही व्यक्ति है जिसने अपने अस्तित्व की योग्यताओं से पूर्व खेत पर अत्याचार किया। इन आयतों से हमने यह सीखा कि अपने माल तथा दौलत और बच्चों पर घमण्ड तथा ईश्वर से आवश्यकता मुक्त होने का आभास, एक प्रकार से कुफ़्र वे अकृतज्ञता की निशानी है। इस्लाम में दान-दक्षिणा का उद्देश्य, केवल भूखों का पेट भरना ही नहीं है बल्कि दान करने वाले की प्रवृति व परिपूर्णता भी दृष्टिगत है और कुफ़्र मनुष्य की आध्यात्मिक प्रगति में रुकावट डालता है। ईश्वरीय प्रकोप स्वयं हमारे ही कर्मों की प्रतिक्रिया है न कि ईश्वर की ओर से किसी प्रकार का अत्याचार।आइए अब सूरए आले इमरान की आयत संख्या ११८ की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا بِطَانَةً مِنْ دُونِكُمْ لَا يَأْلُونَكُمْ خَبَالًا وَدُّوا مَا عَنِتُّمْ قَدْ بَدَتِ الْبَغْضَاءُ مِنْ أَفْوَاهِهِمْ وَمَا تُخْفِي صُدُورُهُمْ أَكْبَرُ قَدْ بَيَّنَّا لَكُمُ الْآَيَاتِ إِنْ كُنْتُمْ تَعْقِلُونَ (118)हे ईमान लाने वालो! अपनों के अतिरिक्त किसी अन्य पर अपने रहस्य न खोलो, वे तुम्हारी तबाही में कोई कसर नहीं छोड़ेगे वे तुम्हारे दुखों और कठिनाइयों को पसंद करते हैं। द्वेष और शत्रुता उनकी बातों से स्पष्ट है और जो कुछ उन्होंने अपने हृदय में छिपा रखा है वह और भी बड़ा है। निःसन्देह, हम (शत्रुओं के षड्यंत्रों का पर्दा फ़ाश करने वाली) आयतें तुम्हारे लिए बयान करते हैं यदि तुम मंथन करो। (3:118) इस्लामी समाजों को सदैव जो खतरे लगे रहते हैं उनमें से एक, सरकार के महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील केन्द्रों में अपरिचित व दूसरे लोगों की इस प्रकार से घुसपैठ है कि वे मुसलमानों के रहस्यों और उनकी सूचनाओं से अवगत हो जाएं क्योंकि यदि विदित रूप से भी वे मित्रता एवं सहयोग की घोषणा करें तो आंतरिक रूप से वे इस्लाम को पसंद नहीं करते और मुसलमानों की प्रगति को नहीं देख सकते बल्कि इसके विपरीत वे मुसलमानों को कमज़ोर बनाने और उन्हें तबाह करने का भरसक प्रयास करते हैं और यहां तक कि अपने द्वेष और शत्रुता को भी नहीं छिपाते। इस आयत से हमने सीखा कि मोमिन को भोला नहीं होना चाहिए और किसी की भी बातों पर तुरन्त विश्वास नहीं कर लेना चाहिए बल्कि अपनी बुद्धि को प्रयोग करते हुए शत्रु के समक्ष होशियार रहना चाहिए। इस्लामी देशों में विदेशी बलों की उपस्थिति वर्जित है क्योंकि इससे मुसलमानों के रहस्य अन्य लोगों तक पहुंच जाएंगे। काफ़िरों के साथ यद्यपि शांतिपूर्ण संबन्ध रखना सही है परन्तु हमें यह जान लेना चाहिए कि इस्लाम और कुफ़्र के बीच कभी भी मित्रता नहीं हो सकती।आइए अब सूरए आले इमरान की आयत संख्या ११९ और १२० की तिलावत सुनते हैं।هَا أَنْتُمْ أُولَاءِ تُحِبُّونَهُمْ وَلَا يُحِبُّونَكُمْ وَتُؤْمِنُونَ بِالْكِتَابِ كُلِّهِ وَإِذَا لَقُوكُمْ قَالُوا آَمَنَّا وَإِذَا خَلَوْا عَضُّوا عَلَيْكُمُ الْأَنَامِلَ مِنَ الْغَيْظِ قُلْ مُوتُوا بِغَيْظِكُمْ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ (119) إِنْ تَمْسَسْكُمْ حَسَنَةٌ تَسُؤْهُمْ وَإِنْ تُصِبْكُمْ سَيِّئَةٌ يَفْرَحُوا بِهَا وَإِنْ تَصْبِرُوا وَتَتَّقُوا لَا يَضُرُّكُمْ كَيْدُهُمْ شَيْئًا إِنَّ اللَّهَ بِمَا يَعْمَلُونَ مُحِيطٌ (120)हे मुसलमानों तुम उनसे मित्रता व्यक्त करते हो जबकि वे तुम्हें पसंद नहीं करते। तुम समस्त आसमानी किताबों पर ईमान रखते हो (जबकि वे तुम्हारी किताब पर ईमान नहीं लाते) वे जब भी तुमसे मिलते हैं तो कहते हैं कि हम ईमान ले आए हैं किंतु जब वे (अपने जैसे लोगों से) एकांत में मिलते हैं तो तुम्हारे प्रति उनके हृदय में जो द्वेष है उसके कारण वे क्रोध मे अपनी उंगलियों को दातों से काट लेते हैं। (हे पैग़म्बर) उनसे कह दो कि अपने क्रोध में मर जाओ कि ईश्वर तुम्हारे हृदय में जो कुछ है उससे अवगत है। (3:119) (हे मुसलमानो! जान लो कि) यदि तुम तक कोई भलाई पहुंचती है तो उन्हें बुरा लगता है और यदि तुम्हें कोई बुराई आ लेती है तो वे प्रसन्न हो जाते हैं। परन्तु यदि तुम दृढ़ रहो और धैर्य करो तथा ईश्वर से भयभीत रहो तो उनका छल व कपट तुम्हें कोई हानि नहीं पहुंचा सकता क्योंकि वे जो कुछ भी करते हैं ईश्वर उससे अवगत है। (3:120) ये आयतें मुसलमानों के प्रति शत्रु की गंदी भावना और उसके विचारों का पर्दा फ़ाश करते हुए कहती है, यह मत सोचो कि यदि तुमने स्वयं को उनके समीप कर लिया है और उनसे प्रेम व मित्रता व्यक्त करते हो तो वे भी तुमसे प्रेम करने लगें हैं और तुम्हारे बारे में उनके विचार बदल गए हैं। यदि वे दिखावे के तौर पर ईमान प्रकट करते हैं तो जान लो कि दिल में वे तुम्हारे प्रति क्रोध और द्वेष रखते हैं, क्योंकि यदि तुम्हें कोई प्रगति प्राप्त होती है तो वे क्रोधित होते हैं और जब कोई कठिनाई या मुसीबत तुम पर आ पड़ती है तो वे प्रसन्त होते हैं। अतः एकमात्र मार्ग यह है कि तुम शत्रु के वादों पर भरोसा मत करो और पूर्ण रूप से ईश्वरीय आदेशों का पालन करो और यदि दृढ़ता से तुमने इन दो बातों का पालन किया तो तुम्हारे विरुद्ध शत्रु के षड्यंत्र कभी भी व्यवहारिक नहीं हो सकेंगे और वे तुम्हे क्षति नहीं पहुंचा सकेंगे। इन आयतों से हमने यह सीखा कि ग़ैर इस्लामी देशों से राजनैतिक एवं आर्थिक संबन्ध पारस्परिक सम्मान के आधार पर होने चाहिए अन्यथा यह मुसलमानों के अनादर का कारण बन जाएंगे। हमें किसी की भी बातों पर तुरंत विश्वास नहीं करना चाहिए और न ही शत्रु की ओर से मित्रता की घोषणा पर संतोष व्यक्त करना चाहिए। जहां पर शत्रु अपने द्वेष और ईर्ष्या को नहीं छिपाता वहां पर हमें भी कड़े स्वर में उससे घृणा की घोषणा करनी चाहिए। शत्रु के प्रभाव और उसकी घुसपैठ का मार्ग या तो उसके प्रति हमारा भय और लालच है या ईश्वर से हमारा भयभीत न रहना है। हम यदि धैर्य एवं संयम रखें तो शत्रु के ये दोनों ही मार्ग बंद हो सकते हैं।