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    सूरए आले इमरान; आयतें १३२-१३६ (कार्यक्रम 104)

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    आइए पहले सूरए आले इमरान की १३२वीं और १३३वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।وَأَطِيعُوا اللَّهَ وَالرَّسُولَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ (132) وَسَارِعُوا إِلَى مَغْفِرَةٍ مِنْ رَبِّكُمْ وَجَنَّةٍ عَرْضُهَا السَّمَاوَاتُ وَالْأَرْضُ أُعِدَّتْ لِلْمُتَّقِينَ (133)हे ईमान वालो! ईश्वर और उसके पैग़म्बर का आज्ञापालन को ताकि तुम पर दया हो। (3:132) और अपने पालनहार की क्षमा और स्वर्ग की ओर तेज़ी से बढ़ो, ऐसा स्वर्ग जो आकाशों और धरती जितना बड़ा है और जो ईश्वर से डरने वालों के लिए तैयार किया गया है। (3:133) ओहद के युद्ध और ब्याज खाने के विषय पर पिछली आयतों में चर्चा करने के पश्चात, इन आयतों में मुसलमानों को दो बातों की सिफ़ारिश की गई है। एक ईश्वर और उसके पैग़म्बर के आदेशों का पूर्ण पालन जो ईश्वरीय दया व सहायता की शर्त है। ओहद में मुसलमानों की पराजय का कारण, पैग़म्बरे इस्लाम के आदेशों की अवहेलना थी। दूसरी सिफ़ारिश, भले कर्मों और अन्य लोगों को लाभ पहुंचाने में आगे रहना और जल्दी करना कि जो पापों के क्षमा होने और स्वर्ग मे जाने का कारण बनता है। ओहद में जो बात मुसलमानों की पराजय का कारण बनी वह शत्रु द्वारा भागते समय छोड़ी गई वस्तुओं को एकत्रित करने में तेज़ी दिखाना था। और जो बात बाज़ार में ब्याज की भूमि समतल करती है वह पूंजी व संपत्ति एकत्रित करने में दूसरों से आगे बढ़ने का प्रयास है। परन्तु क़ुरआन ईमान वालों को ईश्वरीय दया व क्षमा कमाने में तेज़ी दिखाने का निमंत्रण देता है जो स्वर्ग में जाने की भूमिका है। ऐसा स्वर्ग जो आकाशों, धरती और जो कुछ उसमें है, सबको अपने में समेट लेगा और उसमें जाने की शर्त, पापों से बचना है। इन आयतों से हमने यह सीखा कि ईश्वर की दया का पात्र वह बनता है जो कमज़ोर और निर्धनों पर दया करे और उन्हें ऋण देकर ब्याज न ले। मोमिन को किसी बात या एक स्थान पर ठहर जाना नहीं चाहिए बल्कि उसे अपनी प्रगति एवं दूसरों से आगे बढ़ने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। अलबत्ता केवल भले कामों के लिए।आइए अब सूरए आले इमरान की १३४वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।الَّذِينَ يُنْفِقُونَ فِي السَّرَّاءِ وَالضَّرَّاءِ وَالْكَاظِمِينَ الْغَيْظَ وَالْعَافِينَ عَنِ النَّاسِ وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ (134)ईश्वर से डरने वाले वे लोग हैं जो अमीरी और ग़रीबी में दान-दक्षिणा करते हैं तथा (क्रोध के समय) अपने क्रोध को पी जाते हैं और लोगों के दायित्वों को क्षमा कर देते हैं और निःसन्देह, ईश्वर भलाई करने वालों को पसंद करता है। (3:134) पिछली आयत में ईमान वालों को ईश्वरीय क्षमा की ओर बुलाने के पश्चात यह आयत क्षमा के साधनों का वर्णन करती है। यद्यपि लोगों की ग़ल्तियों को क्षमा करना तथा क्रोध एवं द्वेष से बचना, ईश्वर से डरने वालों की महत्वपूर्ण विशेषताएं हैं परन्तु ईश्वर ने क्षमाके कारकों के रूप में इससे पूर्व धन व संपत्ति में से दान-दक्षिणा तथा वंचितों को सहायता का उल्लेख किया है। आम लोगों की कल्पना यह है कि केवल धनवान ही दान-दक्षिणा कर सकते हैं जबकि अधिक धन, कंजूसी व लालच की भावना को बढ़ाता है न कि दान और दक्षिणा और भलाई की भावना को अतः अमीरी में भी वही व्यक्ति दूसरों की सहायता के विचार में रहेगा जिसने ग़रीबी में अपनी क्षमता के अनुसार उनकी सहायता की हो। इसीलिए यह आयत कहती है कि वास्तविक ईमान वाले हर स्थिति में दान-दक्षिणा करते हैं चाहे उनके पास धन हो या न हो। इस आयत से हमने सीखा कि दान-दक्षिणा के लिए धन नहीं बल्कि उदारता की आवश्यकता होती है। कितने धनवान है जो कंजूस हैं जबकि कितने दरिद्र ऐसे भी है जो दानी व उदार हैं। ईश्वर से डरने वाला, समाज से अलग-थलग एक कोने में नहीं रहता बल्कि सक्रिय रूप से समाज में उपस्थित रहता है। वह अपने धन तथा शिष्टाचार के साथ लोगों से मेल-जोल रखता है। जो कोई ही ईश्वर की दृष्टि में प्रिय बनना चाहता है उसे ईश्वर के मार्ग में धन भी लुटाना चाहिए और अपने हृदय को दूसरों के प्रति क्रोध और द्वेष से भी खाली रखता है।आइए अब सूरए आले इमरान की १३५वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَالَّذِينَ إِذَا فَعَلُوا فَاحِشَةً أَوْ ظَلَمُوا أَنْفُسَهُمْ ذَكَرُوا اللَّهَ فَاسْتَغْفَرُوا لِذُنُوبِهِمْ وَمَنْ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا اللَّهُ وَلَمْ يُصِرُّوا عَلَى مَا فَعَلُوا وَهُمْ يَعْلَمُونَ (135)(ईश्वर से डरने वाले वे लोग हैं) जो जब भी कोई बुरा कार्य करते हैं या (वास्तव में) स्वयं पर अत्याचार करते हैं तो ईश्वर को याद करते हैं और अपने पापों के लिए ईश्वर से क्षमा चाहते हैं और ईश्वर के अतिरिक्त कौन उनके पापों को क्षमा करता है? और वे लोग जिसकी बुराई को वे जानते हैं उस पर आग्रह नहीं करते। (3:135) कुछ लोग यह सोचते हैं कि मोमिन वह व्यक्ति है जो कभी भी कोई पाप या ग़लती नहीं करता जबकि यह आयत कहती है कि ईश्वर से डरने वाले लोग ग़लती कर सकते हैं अर्थात स्वयं अपने आप पर अत्याचार कर सकते हैं परन्तु उनमें और अन्य लोगों में दो बातों का अंतर होता है। प्रथम यह कि उनके ग़लत कार्यों को दोहराते नहीं और जैसे ही उन्हें अपनी ग़लती का आभास होता है वे उसे छोड़ देते हैं। दूसरे यह कि वे यथाशीघ्र तौबा अर्थात प्रायश्चित कर लेते हैं और ईश्वर से क्षमा याचना करते हैं क्योंकि वे कहते हैं कि ईश्वर, क्षमा करने वाला है और वह पापी की तौबा को स्वीकार कर लेता है। इस आधार पर जान बूझ कर और योजनाबद्ध पाप करने वाले तथा आंतरिक इच्छाओं व शैतान के बहकावे के कारण न चाहते हुए भी पाप करने वाले के बीच अंतर है। दूसरा व्यक्ति पाप को समझने के पश्चात लज्जित होता है और ईश्वर से वह फिर पाप न करने की प्रतिज्ञा करता है। इस आयत से हमने यह सीखा कि ईश्वर से डरने का अर्थ पाप न करना नहीं है बल्कि पाप का प्रायश्चित करना और उसे फिर न करने का दृढ़ संकल्प करना है। पाप से अधिक ख़तरनाक, पाप की बुराई से निश्चेतता है। मनुष्य पाप को यदि बुरा न समझे तो फिर वह प्रायश्चित का विचार ही नहीं करेगा। पाप करना, ईश्वर द्वारा मानव शरीर में फूंकी गई ईश्वरीय आत्मा पर सबसे बड़ा अत्याचार है।आइए अब सूरए आले इमरान की १३६वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।أُولَئِكَ جَزَاؤُهُمْ مَغْفِرَةٌ مِنْ رَبِّهِمْ وَجَنَّاتٌ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا وَنِعْمَ أَجْرُ الْعَامِلِينَ (136)ईश्वर से डरने वाले एसे लोगों का बदला उनके पालनहार की ओर से क्षमा और (स्वर्ग के) बाग़ हैं जिसके पेड़ों के नीचे नहरें बह रही हैं जिसमें में अनंत काल तक रहेंगे और (ईश्वर के आदेशों का) पालन करने वालों का बदला कितना भला है। (3:136) सूरए आले इमरान की १३३वीं आयत में ईमान वालों को ईश्वरीय क्षमा और स्वर्ग की प्राप्ति में दूसरों से आगे बढ़ने की सिफ़ारिश की गई थी और १३४वीं तथा १३५वीं आयतों में दान दक्षिणा, उदारता, क्षमा और पापों के प्रायश्चि को इसका साधन बताया गया था। इस आयत में पुनः उसी बात पर बल देकर यह कहा गया है कि केवल ईश्वर से डरने वालों को ही ईश्वर की दया और क्षमा प्राप्त होगी और पापों के क्षमा किये जाने और बुराइयों से पवित्र होने के पश्चात उनके स्वर्ग में जाने की भूमि प्रशस्त हो जाएगी और वे ईश्वरीय विभूतियों और अनुकंपाओं में डूब जाएंगे। वह स्वर्ग एसा है जिसका कोई समय और स्थान नहीं है। उसका क्षेत्रफल असीम और उसकी अवधि अनंत है। रोचक बात यह है कि इन आयतों का अंत “मुत्तक़ीन” अर्थात ईश्वर से डरने वाले, “मोहसेनीन” अर्थात भले कर्म करने वाले और “आमेलीन” अर्थात आदेश का पालन करने वाले जैसे शब्दों से हुआ है जो इस बात का परिचायक है कि ईश्वर से डर, केवल एक आंतरिक स्थिति नहीं है जो समाज से अलग-थलग रहने का कारण बने बल्कि ईश्वर से भय के लिए भले कर्म करना भी आवश्यक है। इस आयत से हमने सीखा कि केवल आशाओं द्वारा ईश्वरीय कृपा को प्राप्त नहीं किया जा सकता बल्कि इसके लिए कर्म आवश्यक है और वह भी भले उद्देश्य से किया गया भला कर्म। जबतक मनुष्य, पापों से पवित्र नहीं हो जाता, उसमें स्वर्ग के भले व पवित्र लोगों के बीच उपस्थित होने की क्षमता नहीं होगी।