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    सूरए आले इमरान; आयतें १३७-१४२ (कार्यक्रम 105)

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    आइए पहले सूरए आले इमरान की १३७वीं और १३८वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِكُمْ سُنَنٌ فَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَانْظُروا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُكَذِّبِينَ (137) هَذَا بَيَانٌ لِلنَّاسِ وَهُدًى وَمَوْعِظَةٌ لِلْمُتَّقِينَ (138)(हे मुसलमानो!) तुमसे पहले भी बहुत सी जातियां आईं और (उनके बारे में) ईश्वरीय परंपराएं मौजूद थीं, तो धरती में घूमो-फिरो और देखो कि (ईश्वरीय आदेशों को) झुठलाने वालों का अंत कैसा हुआ? (3:137) यह आयतें सभी लोगों के लिए स्पष्ट बयान हैं (परन्तु) केवल ईश्वर से डरने वालों के लिए मार्गदर्शन व शिक्षा सामग्री हैं। (3:138) मनुष्य के मार्गदर्शन व प्रशिक्षण के लिए क़ुरआन की एक पद्धति, उसे इतिहास व अतीत ही घटनाओं पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करना है। संसार केवल वर्तमान समय में सीमित नहीं है। हमसे पहले ही असंख्य लोग आ चुके हैं। उन्होंने भी इसी संसार में जीवन व्यतीत किया और फिर चले गए। उनके इतिहास और उनके अंत की पहचान, वर्तमान समय के लोगों के लिए सबसे अच्छी शिक्षा सामग्री है क्योंकि संसार की व्यवस्था ईश्वर के ठोस व स्थिर क़ानूनों और परंपराओं के आधार पर चलती है और इन परंपराओं की पहचान, मानव इतहास से अवगत हुए बिना संभव ही नहीं है। इसी कारण क़ुरआन हमको धरती में घूमने-फिरने और बीते हुए लोगों के इतिहास के अध्धयन का निमंत्रण देता है ताकि भले और बुरे लोगों के अंत पर ध्यान देकर हम जीवन के सही मार्ग का चयन कर सकें और दूसरों के कटु अनुभवों को फिर न दोहराएं। इन आयतों से हमने यह सीखा कि इस्लाम बीती हुई सभ्यताओं के बचे हुए व ऐतिहासिक स्थलों को देखने पर बल देता है परन्तु शर्त यह है कि इससे शिक्षा ली जाए और उस सभ्यता के बारे में विचार-विमर्श किया जाए। इतिहास में सम्मान या अनादर के कारक एक समान रहे हैं और उन कारकों की पहचान हमारे आजके जीवन के लिए आवश्यक है। पवित्र क़ुरआन यद्यपि सभी लोगों के मार्गदर्शन के लिए आया है परन्तु केवल पवित्र लोग ही उसकी बातों को स्वीकार करते हैं और मार्गदर्शन पाते हैं। आइए अब सूरए आले इमरान की १३९वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَلَا تَهِنُوا وَلَا تَحْزَنُوا وَأَنْتُمُ الْأَعْلَوْنَ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ (139)और न सुस्त पड़ो और न ही दुखी हो कि तुम दूसरों से श्रेष्ठ हो, यदि तुम ईमान वाले हो। (3:139) ओहद के युद्ध में मुसलमानों की पराजय के पश्चात उनका सारा जोश ठंडा पड़ गया और वे निराशा का शिकार हो गए। यह आयत उन्हें सांत्वना देते हुए कहती है कि एक पराजय के पश्चात वह भी जो अपने ही सेनापति की अवज्ञा के कारण थी, तुम लोग कदापि निराश मत हो, बल्कि इसके स्थान पर अपने ईमान को मज़बूत बनाते रहो कि अंतिम विजय तुम्हारी ही होगी। पिछली आयतों में अतीत के लोगों के इतिहास में ईश्वरीय परंपराओं पर ध्यान देने की सिफ़ारिश की गई थी, और यह आयत उन्हीं में से एक परंपरा की ओर, जिसे मुसलमानों ने स्वयं अपनी आंखों से देखा है, संकेत करते हुए कहती है कि किसी भी राष्ट्र के सम्मान, गौरव व विजय का सबसे महत्वपूर्ण कारक, ईश्वर पर भरोसा और ईश्वरीय प्रतिनिधियों का आज्ञापालन है। जैसा कि ईश्वर ने उसके दूतों की अवज्ञा, पतन और पराजय का कारण है और तुमने ओहद के युद्ध में इस ईश्वरीय परंपरा को देखा है। इस आयत से हमने यह सीखा कि ईश्वर पर ईमान न केवल प्रलय में गर्व व सम्मान का कारण है बल्कि संसार में भी अन्य सभी जातियों व सभ्यताओं पर विजय व श्रेष्ठता का कारण है। पराजय की पीछे हटने या ढ़ीले पड़ने का कारण नहीं अपितु अगली कार्यवाहियों के लिए शिक्षा सामग्री बनाना चाहिए।आइए अब सूरए आले इमरान की १४०वीं और १४१वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।إِنْ يَمْسَسْكُمْ قَرْحٌ فَقَدْ مَسَّ الْقَوْمَ قَرْحٌ مِثْلُهُ وَتِلْكَ الْأَيَّامُ نُدَاوِلُهَا بَيْنَ النَّاسِ وَلِيَعْلَمَ اللَّهُ الَّذِينَ آَمَنُوا وَيَتَّخِذَ مِنْكُمْ شُهَدَاءَ وَاللَّهُ لَا يُحِبُّ الظَّالِمِينَ (140) وَلِيُمَحِّصَ اللَّهُ الَّذِينَ آَمَنُوا وَيَمْحَقَ الْكَافِرِينَ (141)(हे मुसलमानो! शत्रु के साथ युद्ध में) यदि तुम्हें कोई घाव लग जाए तो निश्चित रूप से तुम्हारे सामने वाले गुट को भी ऐसा ही घाव लगा है। इन दिनों को हम लोगों के बीच घुमाते हैं ताकि ईश्वर ईमान लाने वालों को पहचान ले और तुम्हारे बीच से गवाह चुन ले और निःसन्देह, ईश्वर अत्याचारियों को पसंद नहीं करता। (3:140) और (यह युद्ध की ऊंच-नीच इसलिए है कि) ईश्वर ईमान वालों को पवित्र व शुद्ध बनाए और काफ़िरों को धीरे-धीरे समाप्त कर दे। (3:141) इन आयतों में ईश्वर की एक अन्य परंपरा की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि संसार किसी के लिए भी सदैव एक समान व स्थिर नहीं रहता। सफलता के पश्चात कटु घटनाएं भी आती हैं। विजय के साथ ही पराजय का भी असित्तव है। यह सारी ऊंचनीच इसलिए है कि लोगों की योग्यताएं स्पष्ट हों और वास्तविक ईमान वाले, काफ़िरों से अलग हो जाएं तथा एसे पवित्र लोग प्रकट हों जिनका अस्तित्व दूसरों के लिए आदेश बन जाए कि संसार में पवित्रता के साथ जिया और मरा जा सकता है। यह आयतें मुसलमानों को सांत्वना देती हैं कि यदि आज तुम्हें ओहद के युद्ध में पराजय हुई है तो क्या हुआ, कल तुम्हें बद्र के युद्ध में विजय प्राप्त हो चुकी है। आज यदि तुम घायल हुए हो तो तुम्हारे शत्रु को भी घाव लगे हैं अतः इस बात को भलि भांति समझ लो कि कटु घटनाएं केवल तुम्हारे लिए नहीं हैं और दूसरी बात यह है कि इस प्रकार की घटनाएं स्थाई नहीं होतीं। तो तुम संयम और धैर्य से काम लो कि अंततः विजय तुम्हारी ही होगी। इन आयतों से हमने यह सीखा कि युद्ध जैसी कटु घटनाओं में लोगों की परीक्षा लेना, पूरे इतिहास में ईश्वर की एक स्थायी परंपरा रही है। काफ़िरों की विजय, ईश्वर द्वारा उनसे प्रेम की निशानी नहीं है बल्कि यह ईश्वरीय परीक्षा के लिए आवश्यक है। युद्ध, पवित्र व ईमान वाले लोगों की पहचान की कसौटी है और इसमें मोमिन को कदापि पराजय नहीं होती क्योंकि शहादत भी उसके लिए सफलता ही है। आइए अब सूरए इमरान की १४२वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।أَمْ حَسِبْتُمْ أَنْ تَدْخُلُوا الْجَنَّةَ وَلَمَّا يَعْلَمِ اللَّهُ الَّذِينَ جَاهَدُوا مِنْكُمْ وَيَعْلَمَ الصَّابِرِينَ (142)क्या तुमने यह सोचा था कि (ईमान का दावा करके) स्वर्ग में प्रविष्ट हो जाओगे जबकि अभी ईश्वर ने तुम्हारे बीच से जेहाद करने वालों तथा संयम बरतने वालों को अलग ही नहीं किया है। (3:142) पिछली आयतों की भांति यह आयत भी इस बात पर बल देती है कि धर्म और मुसलमानों के सम्मान की रक्षा के लिए युद्ध व जेहाद के मैदान में उपस्थित होना ईमान की शर्त है और यह नहीं सोचना चाहिए कि केवल ज़बान से ईमान व्यक्त करके बल्कि नमाज़ पढ़ कर या रोज़े रखकर हम स्वर्ग में चले जाएंगे क्योंकि रणक्षेत्र में यह बात स्पष्ट होती है कि कौन वास्तविक ईमान वाला है और दृढ़ता के साथ लड़ने के लिए तैयार है और कौन केवल ज़बान से ईमान लाया है और यह ईमान उसके हृदय तक नहीं पहुंचा है। इस आयत से हमने यह सीखा कि बेकार की आशाओं से सदैव ही दूर रहना चाहिए क्योंकि यह घमण्ड और कर्म व व्यवहार में रुकावट का कारण बनती हैं। स्वर्ग को बहाने से नहीं बल्कि मूल्य से दिया जाएगा। स्वर्ग का मूल्य कर्म है न कि ईमान का बहाना। संयम और जेहाद का क्षेत्र केवल रणक्षेत्र नहीं है बल्कि मोमिन सदैव ही शैतान व अपनी आंतरिक इच्छओं से संघर्ष करता रहता है और ईश्वरीय आदेशों के पालन में संयम बरतता रहता है।