islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए आले इमरान; आयतें १४३-१४८ (कार्यक्रम 106)

    सूरए आले इमरान; आयतें १४३-१४८ (कार्यक्रम 106)

    Rate this post

    आइए पहले सूरए आले इमरान की १४३वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَلَقَدْ كُنْتُمْ تَمَنَّوْنَ الْمَوْتَ مِنْ قَبْلِ أَنْ تَلْقَوْهُ فَقَدْ رَأَيْتُمُوهُ وَأَنْتُمْ تَنْظُرُونَ (143)और (हे ओहद के योद्धाओ!) शत्रु से आमना-सामना होने से पूर्व तुम मृत्यु (और ईश्वर के मार्ग में शहादत) की मनोकामना रखते थे तो जब तुमने उसे देखा तो (क्यों) उसपर अप्रसन्नता की दृष्टि डाली? (3:143) बद्र के युद्ध में, जिसमें मुसलमानों को विजय प्राप्त हुई और कुछ लोग शहीद हुए, कुछ मुसलमानों ने कहा था कि काश हम भी बद्र के युद्ध में शहीद हो जाते। परन्तु इन्हीं लोगों ने जब ओहद के युद्ध में पराजय के लक्षण देखे तो वे पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को छोड़कर भागने लगे थे। यह आयत इस प्रकार के लोगों की आलोचना करते हुए कहती है कि रणक्षेत्र में जब जान देने का समय आया तो तुम लोग क्यों केवल देखते रहे और ईश्वर के धर्म और उसके पैग़म्बर का तुमने समर्थन नहीं किया? इस आयत से हमने सीखा कि अपनी आशाओं और इच्छाओं से धोखा नहीं खाना चाहिए क्योंकि हमें ज्ञात नहीं है कि कर्म और व्यवहार के मैदान में हम ईश्वरीय परीक्षा में खरे उतरेंगे या नहीं? ईमान का दावा करने वाले तो बहुत हैं किंतु ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है जो अपनी जान देने के लिए तो तैयार हों किंतु ईमान छोड़ने के लिए तैयार न हों। आइए अब सूरए आले इमरान की १४४वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَمَا مُحَمَّدٌ إِلَّا رَسُولٌ قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِهِ الرُّسُلُ أَفَإِنْ مَاتَ أَوْ قُتِلَ انْقَلَبْتُمْ عَلَى أَعْقَابِكُمْ وَمَنْ يَنْقَلِبْ عَلَى عَقِبَيْهِ فَلَنْ يَضُرَّ اللَّهَ شَيْئًا وَسَيَجْزِي اللَّهُ الشَّاكِرِينَ (144)और मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) पैग़म्बर के अतरिक्त कुछ नहीं हैं। उनसे पहले भी दूसरे पैग़म्बर (आकर) जा चुके हैं। तो क्या यदि वे मर जाएं या उनकी हत्या कर दी जाए तो तुम पूर्वजों के धर्म पर पलट जाओगे? (जान लो कि) जो भी पीछे की ओर पलटे वह ईश्वर को कोई हानि नहीं पहुंचाता और शीघ्र ही ईश्वर कृतज्ञ लोगों को भला बदला देगा। (3:144) ओहद के युद्ध में जो घटनाएं घटीं उनमें से एक, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की शहादत की अफ़वाह थी। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के माथे और चेहरे से बहने वाला रक्त, इस प्रकार था कि एक शत्रु ने चिल्लाकर कहा कि मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम मारे गए। यह अफ़वाह एक ओर तो शत्रुओं की प्रसन्नता और और उनके जोश में वृद्धि का कारण बनी और दूसरी और मुसलमानों के पीछे हटने और उनके भागने का भी कारण बन गई। अलबत्ता मुसलमानों में कुछ लोग एसे भी थे जो चिल्ला-चिल्ला कर यह कह रहे थे कि यदि मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम नहीं भी हैं तो उनका मार्ग और ईश्वर तो जीवित है, तुम लोग क्यों भाग रहे हो? यह आयत मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहती है कि तुम्हारे पैग़म्बर से पूर्व भी बहुत से पैग़म्बर आए थे परन्तु क्या उनकी मृत्यु के पश्चात उनके अनुयायी अपने धर्म से पलट गए तो फिर तुम क्यों इस अफवाह के पश्चात इतनी जल्दी डगमगा गए और भागने लगे? जबकि पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम जीवित हैं और यह शत्रु की ओर से उड़ाई गई एक अफ़वाह कि अतिरिक्त कुछ और नहीं है। क्या पैग़म्बर के असित्तव के प्रति कृतज्ञता यही है कि तुम इतनी सरलता के साथ पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और उनके धर्म को छोड़ दो? इस आयत से हमने सीखा कि दूसरे लोगों की भांति ही पैग़म्बर भी जीवन व मृत्यु के मामले में प्रकृति के क़ानून के अधीन हैं। उनसे अनंत जीवन की आशा नहीं रखनी चाहिए। पैग़म्बर की आयु सीमित है परन्तु उनका मार्ग सीमित नहीं है। हम ईश्वर को मानते हैं न कि व्यक्ति विशेष को, कि पैग़म्बर की मृत्यु या शहादत के पश्चात इस्लाम धर्म को छोड़ दें। धर्म की ओर से लोगों के मुंह मोड़ लेने से, ईश्वर और उसके धर्म को कोई हानि नहीं पहुंचती है क्योंकि उसे तो स्वयं लोगों की हो कोई आवश्यकता नहीं है तो फिर उनके थोड़े से कर्मों या उपासना की बात ही छोड़ दीजिए। अपने ईमान को हम इतना सुदृढ़ बना लें कि पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम जैसी महान हस्ती के जाने के बाद भी उसमें कोई कमज़ोरी न आने पाए।आइए अब सूरए आले इमरान की १४५वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَمَا كَانَ لِنَفْسٍ أَنْ تَمُوتَ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ كِتَابًا مُؤَجَّلًا وَمَنْ يُرِدْ ثَوَابَ الدُّنْيَا نُؤْتِهِ مِنْهَا وَمَنْ يُرِدْ ثَوَابَ الْآَخِرَةِ نُؤْتِهِ مِنْهَا وَسَنَجْزِي الشَّاكِرِينَ (145)और कोई भी ईश्वर के आदेश के बिना नहीं मरता। यह एक निर्धारित भविष्य है और जो कोई संसार का बदला चाहे तो हम उसे उसमें से देते हैं और जो कोई प्रलय का बदला चाहे तो हम उसे उसमें से देते हैं। और हम शीघ्र ही कृतज्ञों को भला बदला देंगे। (3:145) युद्ध से भागने का एक सबसे बड़ा बहाना, मौत के भय से अपनी जान बचानी है। यह आयत कहती है कि तुम्हारी मृत्यु तो ईश्वर के हाथ में है जिसका समय निर्धारित है। कितने एसे बूढ़े हैं जो युद्ध के लिए गए और युद्ध के पश्चात सुरक्षित लौट आए और कितने एसे युवा हैं जो पीठ दिखाकर युद्ध से भाग आए किंतु रणक्षेत्र के बाहर किसी दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई। इसके पश्चात क़ुरआन युद्ध में भाग लेने वालों की भावनाओं की ओर संकेत करते हुए कहता है कि कुछ लोग धन और माल एकत्रित करने के उद्देश्य से युद्ध में भाग लेते हैं तो उनका उद्देश्य भी पूरा हो जाता है और कुछ लोग ईश्वर के लिए तथा प्रलय में अपना बदला पाने हेतु या शहीद होने के लिए युद्ध में भाग लेते हैं तो उनकी इच्छा भी पूरी हो जाती है। इस आयत से हमने यह सीखा कि युद्ध से भागकर मृत्यु से छुटकारा नहीं मिल सकता। रणक्षेत्र में जाने वाला हर व्यक्ति नहीं मरता और घर में बैठे रहने वाला हर व्यक्ति जीवित नहीं बचता। मृत्यु हमारे हाथ में नहीं है परन्तु कर्मों की भावना तो हमारे हमारे हाथ में है। अपने कार्यों में नश्वर संसार को लक्ष्य बनाना चाहिए कि मृत्यु जिसका अंत आरंभ है न कि अंत।आइए अब सूरए आले इमरान की १४६वीं, १४७वीं और १४८वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।وَكَأَيِّنْ مِنْ نَبِيٍّ قَاتَلَ مَعَهُ رِبِّيُّونَ كَثِيرٌ فَمَا وَهَنُوا لِمَا أَصَابَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَمَا ضَعُفُوا وَمَا اسْتَكَانُوا وَاللَّهُ يُحِبُّ الصَّابِرِينَ (146) وَمَا كَانَ قَوْلَهُمْ إِلَّا أَنْ قَالُوا رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَإِسْرَافَنَا فِي أَمْرِنَا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وَانْصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ (147) فَآَتَاهُمُ اللَّهُ ثَوَابَ الدُّنْيَا وَحُسْنَ ثَوَابِ الْآَخِرَةِ وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ (148)और ऐसे कितने अधिक पैग़म्बर थे जिनके ढेरों दृढ़ संकल्प वाले अनुयाई थे जो उनके साथ रणक्षेत्र में जाते थे परन्तु वे कदापि ईश्वर के मार्ग में उनपर पड़ने वाली कठिनाइयों के कारण न तो ढीले पड़ते न कमज़ोर होते थे और न शत्रु के समक्ष झुकते थे और ईश्वर धैर्यवानों को पसंद करता है। (3:146) और उनका कथन इसके अतिरिक्त कुछ नहीं होता था कि हे प्रभुवर हमारे पापों को और हमारे कर्मों में हमारे अतिवाद को क्षमा कर दे। हमारे क़दमों को मज़बूत रख तथा काफ़िरों पर हमें विजय दिला। (3:147) तो ईश्वर ने उन्हें संसार का प्रतिफल और प्रलय का भला बदला दिया। और ईश्वर भले लोगों को पसंद करता है। (3:148) पिछली आयतों में ओहद के युद्ध में मुसलमानों की सुस्ती, अवज्ञा तथा युद्ध से उनके भागने की आलोचना के पश्चात ईश्वर इन आयतों में पिछले पैग़म्बरों के इतिहास की ओर संकेत करते हुए कहता है कि तुमसे पहले भी बहुत से पैग़म्बर थे जिन्होंने ईश्वर के मार्ग में युद्ध किया। उनके अनेक निष्ठापूर्ण, ईमान वाले तथा दृढ़ संकल्प अनुयायी थे जिन्होंने युद्ध की कठिनाइयों और घायल होने बाद भी कदापि ईश्वर का धर्म नहीं छोड़ा और अपनी ओर से कोई कमज़ोरी नहीं दिखाई। तुम मुसलमान उनका अनुसरण क्यों नही करते? तुमने क्यों रणक्षेत्र में शत्रु के बीच पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को अकेले छोड़ दिया? इसके पश्चात क़ुरआने मजीद, ईश्वर के मार्ग में लड़ने वालों की सबसे अधिक महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक का उल्लेख करते हुए कहता है कि इतने अधिक युद्ध और प्रयास के बावजूद वे कदापि ईश्वर से प्रार्थना करना नहीं भूलते थे और उससे अपने पापों को क्षमा करने के अनुरोध के साथ सत्य की विजय और कुफ़्र की समाप्ति की प्रार्थना करते थे। ईश्वर ही उनकी प्रार्थनाओं को स्वीकार करता था और उन्हें काफ़िरों के मुक़ाबले में विजयी बनाता था और इस प्रकार युद्ध में शत्रु द्वारा छोड़े गए माल से भौतिक आराम भी प्राप्त हो जाता था और वे प्रलय के भले बदले के भी पात्र बन जाते थे। इन आयतों से हमने यह सीखा कि इतिहास के साहसी लोगों और सत्य के मार्ग में उनके संकल्प से हमें पाठ सीखना चाहिए और स्वयं से सुस्ती व कमज़ोरी को दूर करना चाहिए। ईश्वर पर ईमान व भरोसा, रणक्षेत्र में प्रतिरोध व साहस का स्रोत है। पैग़म्बरों का पूरा इतिहास, संघर्ष और प्रयासों से भरा हुआ है न कि सुख व चैन से भरे जीवन से। कर्तव्य के पालन में प्रतिरोध और दायित्व पूरा करना महत्वपूर्ण होता है हमें चाहे विजय प्राप्त हो या पराजय। रणक्षेत्र में पराजय का एक कारण पाप व अतिवाद है अतः निष्ठावान योद्घाओं को ईश्वर से क्षमा चाहते हुए विजय की इन बाधाओं को दूर करना चाहिए।