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    सूरए आले इमरान; आयतें १४९-१५३ (कार्यक्रम 107)

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    आइए पहले सूरए आले इमरान की १४९वीं और १५०वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا إِنْ تُطِيعُوا الَّذِينَ كَفَرُوا يَرُدُّوكُمْ عَلَى أَعْقَابِكُمْ فَتَنْقَلِبُوا خَاسِرِينَ (149) بَلِ اللَّهُ مَوْلَاكُمْ وَهُوَ خَيْرُ النَّاصِرِينَ (150)हे ईमान वालो! यदि तुम काफ़िरों का अनुसरण करोगे तो वे तुम्हें, तुम्हारे पूर्वजों के अज्ञानतापूर्ण संस्कारों की ओर पलटा देंगे, तो तुम घाटा उठाने वाले हो जाओगे। (3:149) (वे तुम्हारे मित्र और सहायक नहीं हैं) बल्कि ईश्वर ही तुम्हारा अभिभावक है और वह सबसे अच्छा सहायक है। (3:150) ईमान वाले लोगों और इस्लामी समाज को जो ख़तरे सदैव ही लगे रहते हैं उनमें से एक, सांसारिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए धार्मिक मान्यताओं व सिद्धांतों से पलट जाना है। बहुत से लोगों और समाजों ने आरंभ में कुफ़्र के स्थान पर ईमान का मार्ग अपनाया था किंतु समय बीतने के साथ-साथ तथा कुछ ग़ैर इस्लामी समाजों में भौतिक आराम तथा स्वतंत्रता देखकर वे अपने विश्वास और व्यवहार में कमज़ोर हो गए तथा उन्होंने कुफ़्र का मार्ग अपना लिया। ऐसे लोगों को संबोधित करते हुए क़ुरआन कहता है कि हे ईमान वालों, यदि तुम ईश्वरीय आदेशों के बजाए काफ़िरों के मार्ग का अनुसरण करोगे तो वे तुम्हारी प्रगति के स्थान पर पतन का कारण बन जाएंगे। वे तुम्हारी प्रगति नहीं चाहते अतः तुम बहुत बड़े कष्ट में पड़ जाओगे क्योंकि तुम अपने धर्म को भी छोड़ दोगे और तुम्हें संसार भी नहीं मिल सकेगा। इसके पश्चात ईश्वर ईमान वालों को संबोधित करते हुए यह कहता है कि सम्मान व शक्ति की प्राप्ति के लिए काफ़िरों से जुड़ने का प्रयास मत करों क्योंकि विजय केवल उसी ईश्वर के हाथ में है जो तुम्हारा स्वामी है। इन आयतों से हमने यह सीखा कि धर्म और सच्चे मार्ग से विचलित होने का ख़तरा सभी को लगा रहता है अतः हमें शत्रु के शैतानी प्रयासों और बहकावों की ओर से सचेत रहना चाहिए। रणक्षेत्र में पराजय घाटा नहीं है। सबसे बड़ा घाटा वैचारिक युद्ध में ईमान तथा कुफ़्र के बीच पराजय है। यदि हम संसार के सम्मान व सत्य की भी आशा रखते हैं तो केवल प्रभुत्वशाली ईश्वर के आदेशों के पालन की छाया में ही प्राप्त कर सकते हैं।आइए अब सूरए आले इमरान की १५१वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।سَنُلْقِي فِي قُلُوبِ الَّذِينَ كَفَرُوا الرُّعْبَ بِمَا أَشْرَكُوا بِاللَّهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ سُلْطَانًا وَمَأْوَاهُمُ النَّارُ وَبِئْسَ مَثْوَى الظَّالِمِينَ (151)हम शीघ्र ही काफ़िरों के हृदयों में भय डाल देंगे क्योंकि उन्होंने ईश्वर की ओर से बिना किसी ठोस तर्क के उसका शरीक बनाया है। उनका ठिकाना नरक है और वह अत्याचारियों के लिए कितना बुरा ठिकाना है। (3:151) पिछली आयतों में कुछ मुसलमानों द्वारा काफ़िरों के संसार पर रीझने की आलोचना करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि वे लोग यह न सोचें कि काफ़िरों पर भरोसा करके उन्हें आराम और शांति प्राप्त हो जाएगी बल्कि उन्हें यह जानना चाहिए कि ईश्वर के अतिरिक्त किसी पर ही पूर्ण भरोसा या उससे सहायता चाहना, अनेकेश्वरवाद तथा कुफ़्र का कारण है और इस प्रकार के लोग असमंजस में फंस जाते हैं और उनके हृदयों में भय उत्पन्न हो जाता है। प्रलय में भी इस कुफ़्र और पथभ्रष्टता के कारण वे अन्य काफ़िरों और अत्याचारियों के साथ नरक में जाएंगे अतः काफ़िरों पर भरोसा न तो शांति का कारण है और न ही आराम का और न ही प्रलय में सफलता व कल्याण का। इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के अतिरिक्त किसी भी अन्य पर भरोसा अनेकेश्वरवाद और भय का कारण है और ईमान व ईश्वर का स्मरण शक्ति एवं संतोष का। मौत और अज्ञात भविष्य का भय, वह सबसे बड़ा आतंक है जो काफ़िरों के हृदयों पर छाया हुआ है और ईमान वालों की संख्या जितनी बढ़ती जाती है इस भय में उतनी ही वृद्धि होती जाती है। आइए अब सूरए आले इमरान की १५२वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَلَقَدْ صَدَقَكُمُ اللَّهُ وَعْدَهُ إِذْ تَحُسُّونَهُمْ بِإِذْنِهِ حَتَّى إِذَا فَشِلْتُمْ وَتَنَازَعْتُمْ فِي الْأَمْرِ وَعَصَيْتُمْ مِنْ بَعْدِ مَا أَرَاكُمْ مَا تُحِبُّونَ مِنْكُمْ مَنْ يُرِيدُ الدُّنْيَا وَمِنْكُمْ مَنْ يُرِيدُ الْآَخِرَةَ ثُمَّ صَرَفَكُمْ عَنْهُمْ لِيَبْتَلِيَكُمْ وَلَقَدْ عَفَا عَنْكُمْ وَاللَّهُ ذُو فَضْلٍ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ (152)निःसंदेह, (तुम्हारी सहायता के लिए) ईश्वर अपने वादे में सच्चा था क्योंकि उसकी इच्छा से ही शत्रु की हत्या करते थे यहां तक कि तुमने ढिलाई बरती और (युद्ध के) मामले में तुममें मतभेद हो गया। और ईश्वर द्वारा तुम्हें वे वस्तुएं दिखाए जाने के पश्चात, जिन्हें पसंद करते थे, तुमने उसकी अवज्ञा की। (इस युद्ध में स्पष्ट हो गया कि) तुम में से कुछ लोग इस संसार के और कुछ प्रलय के इच्छुक हैं। फिर उसने शत्रु का पीछा करने का तुम्हारा इरादा बदल दिया (और तुम्हारी विजय, पराजय में परिवर्तित हो गई) ताकि वे तुम्हारी परीक्षा लें परन्तु उसने तुम्हारी ग़लती को क्षमा कर दिया और निःसन्देह ईश्वर, ईमान वालों के प्रति बड़ा ही दयावान है। (3:152) ओहद के युद्ध में मुसलमानों की पराजय के पश्चात उनमें से कुछ ने पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर टिप्पणी करते हुए कहा कि क्या ईश्वर ने इस यु्द्ध में काफ़िरों पर हमारी विजय का वादा नहीं किया था तो हम लोग इस युद्ध में फिर किस प्रकार हार गए? यह आयत उनके उत्तर में कहती है कि ईश्वर का वादा सच्चा था और उसने अपना वादा पूरा किया क्योंकि युद्ध के आरंभ में तुम उसकी सहायता से शत्रुओं की हत्या कर रहे थे परन्तु कुछ बातों के कारण तुम पराजित हो गए। प्रथम यह कि तुमने शत्रु को भागते हुए और उसके द्वारा छोड़े गए माल को देखकर बहुत ही जल्दी ढिलाई बरती और शत्रु का पीछा करने के बजाए अपने हथियार छोड़कर माल एकत्रित करने में व्यस्त हो गए। दूसरे यह कि ओहद पर्वत के दर्रे की रक्षा के बारे में तुममें मतभेद हो गया जबकि पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने कहा था कि इस स्थान से कदापि नहीं हटना परन्तु तुम लोगों ने अपने-अपने विचार प्रकट करके विवाद खड़ा कर दिया और अंततः पैग़म्बर के आदेश की अवज्ञा करते हुए तुमने वह स्थान छोड़ दिया और शत्रु को पीछे से आक्रमण करने का अवसर प्रदान कर दिया। अतः जिस ईश्वर ने युद्ध के आरंभ में तुम्हारी सहायता की थी उसी ने अंत में तुम्हें पराजय का कटु स्वाद चखाया ताकि तुम जान लो कि ईश्वरीय सहायता की शर्त, तुम्हारा ईमान और एकता है और पराजय के इस अनुभव से तुम पाठ सीख सको। इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर द्वारा सहायता का वादा तब तक है जब तक ईमान वाले अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे अन्यथा ईश्वरीय वादों की पूर्ति का अर्थ, उसकी परंपराओं की उपेक्षा कदापि नहीं है। ढिलाई, मतभेद और नेता की अवज्ञा, पराजय के महत्वपूर्ण कारण हैं और इसमें मोमिन और काफ़िर के बीच कोई अंतर नहीं है। कुछ संसारवादी ईमान वाले युद्ध में भी प्रलय के बजाय संसार के विचार में रहते हैं। पराजय, ईश्वरीय परीक्षा का साधन है। निराश होने के स्थान पर हमें उससे पाठ सीखना चाहिए ताकि हम भविष्य में विजयी हो सकें।आइए अब सूरए आले इमरान की १५३वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।إِذْ تُصْعِدُونَ وَلَا تَلْوُونَ عَلَى أَحَدٍ وَالرَّسُولُ يَدْعُوكُمْ فِي أُخْرَاكُمْ فَأَثَابَكُمْ غَمًّا بِغَمٍّ لِكَيْلَا تَحْزَنُوا عَلَى مَا فَاتَكُمْ وَلَا مَا أَصَابَكُمْ وَاللَّهُ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ (153)(याद करो उस समय को) जब (ओहद के युद्ध में भागते समय तुम लोग पहाड़ से) ऊपर चढ़ रहे थे और किसी पर भी ध्यान नहीं दे रहे थे (जबकि) पैग़म्बर तुम्हें पीछे से पुकार रहे थे अतः इसके दण्ड स्वरूप ईश्वर ने तुम्हारे दुखों में एक अन्य दुख की वृद्धि कर दी ताकि तुम फिर हाथ से जाने वाले (युद्ध के माल) या जो कुछ तुम्हें (घाव) लगे हैं उनके बारे में दुखी न हो और जान लो कि जो कुछ तुम करते हो ईश्वर उससे अवगत है। (3:153) ओहद के युद्ध का एक बुरा दृष्य वह था कि जब शत्रु के आकस्मिक आक्रमण के कारण अनेक मुसलमानों ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को अकेला छोड़कर भागना आरंभ कर दिया। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने उन्हें जितना भी वापस बुलाया और शत्रु का मुक़ाबला करने को कहा, उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और वे ओहद के पर्वत पर चढ़ गए। क़ुरआने मजीद कहता है कि तुम्हारी इस अवज्ञा और फ़रार का परिणाम यह निकला कि काफ़िर शत्रु की सेना तुम पर हावी हो गई और इस बात का दुख इतना अधिक था कि तुम अपने घावों, पीड़ा और हाथ से चले जाने वाले माल को भूल गए। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के हृदय को दुख पहुंचाने के दण्ड स्वरूप तुम्हें इस प्रकार के बड़े दुख का सामना करना पड़ा। इस आयत से हमने यह सीखा कि धार्मिक नेताओं के आदेशों की अवहेलना भय तथा फ़रार अंततः शत्रु से पराजय का कारण बनती है। ईमान का दावा करने वालों की परीक्षा का स्थान रणक्षेत्र है। सामान्य परिस्थितियों में तो सभी लोग ईमान वाले होते हैं परन्तु कड़े दिनों में ही मोमिन पहचाने जाते हैं। हमें अतीत की कटु घटनाओं से पाठ लेना चाहिए और सांसारिक माल हाथ से चले जाने या फिर कठिनाइयां झेलने पर दुखी नहीं होना चाहिए।