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    सूरए आले इमरान; आयतें १४-१७ (कार्यक्रम 82)

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    सूरए आले इमरान की आयत संख्या १४ इस प्रकार है।
    زُيِّنَ لِلنَّاسِ حُبُّ الشَّهَوَاتِ مِنَ النِّسَاءِ وَالْبَنِينَ وَالْقَنَاطِيرِ الْمُقَنْطَرَةِ مِنَ الذَّهَبِ وَالْفِضَّةِ وَالْخَيْلِ الْمُسَوَّمَةِ وَالْأَنْعَامِ وَالْحَرْثِ ذَلِكَ مَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَاللَّهُ عِنْدَهُ حُسْنُ الْمَآَبِ (14) लोगों के लिए पत्नियों, संतानों, सोने-चांदी से बटोरे हुए धन, अच्छे घोड़ों, मवेशियों तथा खेतियों से प्रेम को अच्छा दिखाया गया है। यह सब सांसारिक जीवन की नश्वर वस्तुएं हैं और अल्लाह के पास अच्छा फल है। (3:14) अल्लाह ने इस संसार में मनुष्य को जीवन दिया। जीवन चलने और नैतिक सफलताओं के लिए जो भी आवश्यक था उसे प्रदान किया। अपना वंश आगे बढ़ाने के लिए हमें पत्नी और संतान की आवश्यकता होती है। जीवन यापन हेतु धन की आवश्यकता होती है। पेट भरने तथा तन ढांपने के लिए विभिन्न प्रकार के अनाजों और पशुओं की आवश्यकता होती है। अल्लाह ने इस सब वस्तुओं तक हमारी पहुंच को सरल बनाया है। हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि यह सारी चीज़ें समाप्त हो जाने वाली हैं। अब यदि वे बहुत अधिक रहेंगी तो इस संसार में हमारी आयु के समाप्त होने तक साथ देंगी। यदि हमें अल्लाह और प्रलय पर विश्वास है तो संसार तथा सांसारिक साज-सज्जा पर हमें मुग्ध नहीं होना चाहिए क्योंकि प्रलय के दिन इनमें से कोई भी वस्तु लाभ नहीं पहुंचाएगी। इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि सांसारिक वस्तुओं से प्रेम स्वभाविक है परन्तु ख़तरनाक बात यह है कि मनुष्य उसको ही सबकुछ समझ कर धोखा खा जाए। संसार तथा संसारिक वस्तुओं से लाठ उठाना कोई बुरी बात नहीं है किंतु संसार के मोह में डूबकर सबकुछ भुला देना बुरा है। संसार की नश्वर वस्तुओं से मोहभंग करने के लिए उनकी तुलना परलोक की स्थानी नेमतों से करनी चाहिए।सूरए आले इमरान की आयत संख्या १५ इस प्रकार है। قُلْ أَؤُنَبِّئُكُمْ بِخَيْرٍ مِنْ ذَلِكُمْ لِلَّذِينَ اتَّقَوْا عِنْدَ رَبِّهِمْ جَنَّاتٌ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا وَأَزْوَاجٌ مُطَهَّرَةٌ وَرِضْوَانٌ مِنَ اللَّهِ وَاللَّهُ بَصِيرٌ بِالْعِبَادِ (15) हे पैग़म्बर! कह दो मैं तुम्हें इससे अच्छी वस्तुओं की ख़बर देता हूं। जो लोग अल्लाह से डरते हैं उनके लिए अल्लाह के पास एसे बाग़ हैं जिनके नीचे से नहरे बहती हैं और वहां पर वे सदैव रहेंगे। उनकी पत्नियां होंगी और अल्लाह की प्रसन्नता होगी और अल्लाह अपने बंदों को देखने वाला है। (3:15) पहले वाली आयत के बाद जिसमें मनुष्य के लगाव वाली कुछ सांसारिक वस्तुओं का उल्लेख किया गया है इस आयत में जन्नत की सदैव रहने वाली नेमतों की ओर संकेत किया गया है ताकि मनुष्य दोनों की तुलना करे और धोखा न खाए। अगर संसार में प्राकृतिक दृश्य मनुष्य के मन को लुभाते हैं तो जन्नत मं भी वृक्षों से भरे हुए बाग़ होंगे जिनमें नहरे बह रही होंगी। पेड़ों पर विभिन्न प्रकार के फल होंगे। इसके अतिरिक्त इस आयत में अल्लाह पवित्र पत्नियों की भी सूचना देता है। यह नेमतें अल्लाह के नेक बंदों को परलोक में प्राप्त होने वाली भौतिक सुविधाओं का एक छोटा सा भाग हैं। स्वर्गवासियों का सबसे बड़ा इनाम उनसे ईश्वर की प्रसन्नता है कि जो सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इस आयत से हमें यह पाठ मिलता है कि स्वर्ग की सदैव रहने वाली नेमतों तक पहुंचने का एकमात्र मार्ग पापों से दूरी है। जन्नत पवित्र लोगों का स्थान है। स्वर्ग के भीतर केवल भौतिक ही नहीं बल्कि अल्लाह की प्रसन्नता स्वर्गवासियों के लिए सबसे बड़ा आध्यात्मिक इनाम है। पवित्रता महिला का सबसे बड़ा गुण है। अल्लाह ने जन्नत में प्राप्त होने वाली पत्नियों को पवित्र कहा है। आले इमरान की आयत संख्या १६ और १७ इस प्रकार है। الَّذِينَ يَقُولُونَ رَبَّنَا إِنَّنَا آَمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ (16) الصَّابِرِينَ وَالصَّادِقِينَ وَالْقَانِتِينَ وَالْمُنْفِقِينَ وَالْمُسْتَغْفِرِينَ بِالْأَسْحَارِ (17) अल्लाह से डरने वाले वे लोग हैं जो कहते हैं कि हे अल्लाह हम ईमान ले आए तो तू हमारे पापों को क्षमा कर दे और हमें आग के दंड से सुरक्षित रख। (3:16) वे संयम रखने वाले, सच बोलने वाले, दान देने वाले, आज्ञापालन करने वाले और भोर समय प्रायश्चित करने वाले हैं। (3:17) इससे पहले वाली आयत पापों से बचने वालों को स्वर्ग में स्थान पाने वाला बताती है। यह दो आयतें ईश्वर से डरने वालों की विशेषताओं का उल्लेख करती हैं ताकि यह ज्ञात हो जाए कि कौन से लोग स्वर्ग में जाने वाले हैं। पहली आयत ईश्वर से डरने वालों के प्रायश्चित की दशा का वर्णन करती है कि जो सदैव ईश्वर के लिए अपने पापों की क्षमा करने की याचना करते रहते हैं। वस्तुतः अल्लाह से डरने के चरण तक पहुंचने का मार्ग अल्लाह के अस्तित्व पर विश्वास है। जब तक मनुष्य को यह विश्वास नहीं होगा कि उसके सभी कामों को कोई देख रहा है उस समय तक वह अपने व्यवहार पर नियंत्रण नहीं करेगा। किंतु अल्लाह से डरने का अर्थ यह नहीं है कि ऐसा व्यक्ति पाप करता ही नहीं बल्कि इसका अर्थ स्वयं पर नियंत्रण है। संभवतः अल्लाह से डरने वाला भी पाप करे किंतु उसके पाप और अन्य लोगों के पाप में दो अंतर होते हैं। एक तो यह कि पाप करना उसके स्वभाव में सम्मिलित नहीं होता बल्कि भूल से उससे कोई ग़लत काम हो जाता है दूसरे यह कि जैसे ही उससे कोई गुनाह होता है वह तुरंत ही प्रायश्चित करने लगता है ताकि लोक-परलोक में उसके बुरे प्रभाव से वह सुरक्षित रह सके। इसके बाद की आयत तक़वा अर्थात ईश्वर से भय की पांच विशेषताओं का उल्लेख करती है। सत्य के मार्ग में संयम और शैतानी बहकावे के सामने डट जाना ही इन विशेषताओं की आधारशिला है। बातचीत, व्यवहार और विश्वास में सत्यता भी इन लोगों की एक अन्य विशेषता है। इस प्रकार के गुण उन्हें हर प्रकार के झूठ, धोखे, पाखण्ड तथा दिखावे से सुरक्षित रखते हैं। इसी प्रकार अल्लाह के आदेशों का पालन वे सदैव अत्यंत नम्रता के साथ करते हैं। वे अल्लाह के आदेशों के पालन के साथ ही उसके बंदों के बारे में भी चिंता करते हैं और दान देकर उनकी सहायता करते हैं। किंतु उनके यह अच्छे काम उनके भीतर घमण्ड नहीं पैदा करते। वे इसे बहुत बड़ा नहीं समझते बल्कि इसके विपरीत वे ईश्वर की उपासना और जनसेवा में अपनी कमी का आभास करते हुए प्रतिदिन ईश्वर से क्षमा मांगते हैं। इन आयतों से हमने सीखा कि तक़वा अर्थात अल्लाह से डर का अर्थ संसार को त्याग देना नहीं बल्कि पापों से दूर रहते हुए समाज सेवा के लिए भी सदा अग्रसर रहना चाहिए। {