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    सूरए आले इमरान; आयतें १५४-१५८ (कार्यक्रम 108)

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    आइए पहले सूरए आले इमरान की १५४वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।ثُمَّ أَنْزَلَ عَلَيْكُمْ مِنْ بَعْدِ الْغَمِّ أَمَنَةً نُعَاسًا يَغْشَى طَائِفَةً مِنْكُمْ وَطَائِفَةٌ قَدْ أَهَمَّتْهُمْ أَنْفُسُهُمْ يَظُنُّونَ بِاللَّهِ غَيْرَ الْحَقِّ ظَنَّ الْجَاهِلِيَّةِ يَقُولُونَ هَلْ لَنَا مِنَ الْأَمْرِ مِنْ شَيْءٍ قُلْ إِنَّ الْأَمْرَ كُلَّهُ لِلَّهِ يُخْفُونَ فِي أَنْفُسِهِمْ مَا لَا يُبْدُونَ لَكَ يَقُولُونَ لَوْ كَانَ لَنَا مِنَ الْأَمْرِ شَيْءٌ مَا قُتِلْنَا هَاهُنَا قُلْ لَوْ كُنْتُمْ فِي بُيُوتِكُمْ لَبَرَزَ الَّذِينَ كُتِبَ عَلَيْهِمُ الْقَتْلُ إِلَى مَضَاجِعِهِمْ وَلِيَبْتَلِيَ اللَّهُ مَا فِي صُدُورِكُمْ وَلِيُمَحِّصَ مَا فِي قُلُوبِكُمْ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ (154)फिर ईश्वर ने उस दुख के पश्चात तुम लोगों पर नींद की भांति शांति उतारी जिसने तुम में से एक गुट को (जो अपनी सुस्ती और फ़रार के कारण लज्जित था) शांत कर दिया परन्तु एक दूसरा गुट जिसका पूरा लक्ष्य, अपनी जान की रक्षा करना था अज्ञानता के काल की भांति ईश्वर (के वादों) की ओर से अकारण ही शंका में पड़ा हुआ था। वे कह रहे थे कि युद्ध में हमारे लिए कोई निर्णय क्यों नहीं था? हे पैग़म्बर! कह दो कि हर बात और निर्णय केवल ईश्वर के लिए है। वे अपने हृदय में ऐसी बात छिपाते हैं जिसे वे तुम्हारे लिए प्रकट नहीं करते। वे कहते हैं कि युद्ध का कुछ दायित्व यदि हमको दिया जाता तो हम यहां मारे न जाते। कह दो कि यदि तुम अपने घरों में भी होते तो जिनके लिए मरना निर्धारित हो चुका था वे अवश्य ही अपनी मृत्युभूमि की ओर जाते। (यह घटनाएं) इसलिए हैं कि ईश्वर उन बातों का परीक्षण करे कि जो तुम्हारे सीनों में हैं और जो कुछ तुम्हारे हृदयों में है उसको पवित्र व स्वच्छ बना दे और ईश्वर, उससे अवगत है जो कुछ सीनों में है। (3:154) पिछले कार्यक्रमों में हमने यह कहा था कि ओहद के युद्ध में पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की अवज्ञा अपनी सुस्ती और फ़रार के कारण जिससे उन्हें पराजय हुई अधिकांश मुसलमान लज्जित एवं दुखी थे। वे पैग़म्बरे इस्लाम के पास आए और उनसे क्षमा चाही। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने उन्हें क्षमा कर दिया और ईश्वर ने ही उनकी तौबा स्वीकार करते हुए उनके लिए शांति भेजी। परन्तु कुछ लोगों ने, जो अपनी ग़लतियों को पराजय का कारण मानने के लिए तैयार नहीं थे, ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर को दोषी ठहराया। एक ओर तो उन्होंने कहा कि ईश्वर ने हमारी सहायता का वादा किया था तो उसने हमारी सहायता क्यों नहीं की और हमे विजय क्यों नहीं दिलाई? दूसरी ओर उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से कहा कि युद्ध आरंभ होने के समय हमने मदीना नगर के भीतर ही रहकर प्रतिरोध करने का प्रस्ताव दिया था परन्तु आपने हमारे इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और नगर के बाहर निकल गए। इसी कारण आपको पराजय हुई। इस आयत में ईश्वर उनका उत्तर देते हुए कहता है कि पहले तो ईश्वर की सहायता का वादा शत्रु के मुक़ाबले जमे रहने और प्रतिरोध से सशर्त है, न यह कि तुम लोग अपनी जान के भय से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को अकेला छोड़कर भाग जाओ और इसके बावजूद विजय की आशा भी रखो। ईश्वर से तुम्हारी इस प्रकार की बेकार की आशा, अज्ञानता के काल की आशाओं की भांति है, जिसमें वे अकारण ही ईश्वर द्वारा उन्हें विजयी बनाने की आशा रखते थे। दूसरी बात यह है कि मृत्यु या शहादत तुम्हारे हाथ में नहीं है कि तुम यह कहो कि यदि हम मदीने में ही रहते तो मारे नहीं जाते क्योंकि जिनके भाग्य में शहादत लिखी थी यदि वे अपने घरों में रहकर भी लड़ते तो शहीद होते। इसके अतिरिक्त यह घटनाएं तुम्हारी परीक्षा के लिए हैं ताकि जो कुछ तुम्हारे भीतर है वह स्पष्ट हो जाए। इस आयत से हमने सीखा कि स्वार्थ, वास्तविक ईमान के विपरीत है। जिन लोगों का पूरा प्रयास केवल अपनी सुरक्षा है वे ईश्वर के प्रति ग़लत आशाएं बांध लेते हैं। पराजय के पश्चात हमें अपनी कमज़ोरियों को पहचानने और उन्हें सुधारने का प्रयास करना चाहिए न कि ईश्वर को दोषी ठहराना। ईश्वर तो सभी की भावनाओं और विचारों से अवगत है और कटु घटनाएं तथा संकट हमारी भावनाओं और विचारों को सामने लाने का कारण बनते हैं ताकि हम भी स्वयं को पहचान सकें और यह जान सकें कि हम अपने ईमान पर कितने कार्यबद्ध हैं और दूसरे भी हमें पहचान सकं और दायित्वों के संबन्ध में हमारी योग्यताओं से अवगत हो सकें।आइए अब सूरए आले इमरान की १५५वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ تَوَلَّوْا مِنْكُمْ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعَانِ إِنَّمَا اسْتَزَلَّهُمُ الشَّيْطَانُ بِبَعْضِ مَا كَسَبُوا وَلَقَدْ عَفَا اللَّهُ عَنْهُمْ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ حَلِيمٌ (155)निःसन्देह, तुममें से जो लोग (ओहद में) दो सेनाओं के टकराने के दिन (युद्ध से) पीठ दिखाकर भाग गए थे वह केवल इसलिए था कि शैतान ने उन्हें उनके कुछ अप्रिय कर्मों के कारण बहका दिया था और ईश्वर ने उन्हें क्षमा कर दिया। निःसन्देह, ईश्वर बड़ा ही कृपाशील और दयावान है। (3:155) यह आयत ओहद के युद्ध में कुछ मुसलमानों के फ़रार की ओर संकेत करते हुए इसके कारण का उल्लेख करती है। आयत कहती है कि उनके पिछले पापों के कारण उनका ईमान मज़बूत नहीं हो सका और वे बहुत ही जल्दी शैतान के बहकावे में आ गए अतः जब उन्होंने अपनी जान को ख़तरे में देखा तो वे धर्म के मार्ग में अपनी जान देने के लिए तैयार नहीं हुए। इस आयत से हमने सीखा कि छोटे पाप करने से बड़े पाप करने हेतु शैतान के बहकावे की भूमिका प्रशस्त हो जाती है, यहां तक कि मनुष्य अपनी जान बचाने के लिए ईश्वर और उसके पैग़म्बर की ओर से मुंह फेर लेता है। पाप, योद्धाओं के जोश और उनकी भावनाओं को कमज़ोर बनाने का कारण बनता है और यह शैतान से प्रभावित होने का मार्ग बन जाता है अतः उन्हें युद्ध से पूर्व प्रायश्चित करके स्वयं को शत्रु का मुक़ाबला करने के लिए तैयार करना चाहिए। ग़लती करने वालों को सदा के लिए नहीं ठुकराना चाहिए। ईश्वर ने फ़रार से लज्जित लोगों को क्षमा देकर उन्हें स्वीकार कर लिया।आइए अब सूरए आले इमरान की आयत १५६वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ كَفَرُوا وَقَالُوا لِإِخْوَانِهِمْ إِذَا ضَرَبُوا فِي الْأَرْضِ أَوْ كَانُوا غُزًّى لَوْ كَانُوا عِنْدَنَا مَا مَاتُوا وَمَا قُتِلُوا لِيَجْعَلَ اللَّهُ ذَلِكَ حَسْرَةً فِي قُلُوبِهِمْ وَاللَّهُ يُحْيِي وَيُمِيتُ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ (156)हे ईमान वालों, उन लोगों की भांति न हो जाना जिन्होंने कुफ़्र अपनाया और अपन भाइयों के बारे में, जब वे यात्रा या युद्ध में थे, कहाः यदि वे हमारे पास रहते तो न मरते और न ही मारे जाते। (यह वह बात है) जिसे ईश्वर प्रलय में उनके लिए पछतावे का कारण बताएगा। और यह ईश्वर ही तो है जो जीवित करता है और मृत्यु देता है और जो कुछ तुम करते हो उसे देखने वाला है। (3:156) पिछली आयतों में मिथ्याचारियों द्वारा ओहद के युद्ध में भाग ने लेने के बारे में औचित्य दर्शाने के उनके कथनों का वर्णन करने के पश्चात यह आयत उनकी कुफ़्र भरी बातों का उल्लेख करते हुए कहती है कि हे ईमान वालो, तुम लोग क्यों मिथ्याचारियों की बातें दोहराते हो, जो यह कहते हैं कि मदीना से बाहर निकल कर युद्ध में जाने वाले यदि हमारे पास रह जाते तो उनकी यह दशा न होती। क्या उन्हें यह नहीं मालूम कि जीवन और मृत्यु दोनों ही ईश्वर के हाथों में है। वही तो है जो मृत्यु देता है और वही है जो जीवित करता है। प्रलय के दिन मिथ्याचारी जब इन बातों को समझेंगे तब उन्हें बहुत अधिक पछतावा होगा। इस आयत से हमने यह सीखा कि कुछ बातें कुफ़्र और अधर्म का कारण बनती हैं और मिथ्याचारी कुफ़्र के बहुत ही क़रीब होता है। हमें अपने कुछ नादान मित्रों की बातों और प्रचारों की ओर से सचेत रहना चाहिए कि शत्रु उनकी ज़बान से और हमदर्दी के भेस में समाज में निराशा जनक बातें फैलाता है। ऐसा न हो कि अधिक जीवित रहने की आशा में हम रणक्षेत्र में जाने से कतराने लगें। ऐसे कितने वृद्ध हैं जो रणक्षेत्र में युद्ध करने के लिए गए और जीवित लौट आए और ऐसे कितने युवा है जो अपने घरों में रहे परन्तु मौत ने उन्हें आ लिया।आइए अब सूरए आले इमरान की १५७वीं और १५८वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।وَلَئِنْ قُتِلْتُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَوْ مُتُّمْ لَمَغْفِرَةٌ مِنَ اللَّهِ وَرَحْمَةٌ خَيْرٌ مِمَّا يَجْمَعُونَ (157) وَلَئِنْ مُتُّمْ أَوْ قُتِلْتُمْ لَإِلَى اللَّهِ تُحْشَرُونَ (158)और यदि तुम ईश्वर के मार्ग में शहीद हो जाओ या मर जाओ तो (कदापि तुमने घाटा नहीं उठाया है क्योंकि) ईश्वरीय क्षमा व दया उससे बेहतर है जो कुछ लोग एकत्रित करते हैं। (3:157) और (जान लो कि) यदि तुम मर गए या मार दिये गए तो निश्चित ही अपने ईश्वर की ओर पलटोगे। (3:158) यह आयत ओहद के युद्ध में मोमिनों के ईमान की भावना को सुदृढ़ बनाने के लिए कहती है कि मिथ्याचारियों की अनुचित बातों की ओर ध्यान मत दो और जान लो कि यदि तुम्हें ईश्वर के मार्ग में मौत आ जाए या तुम रणक्षेत्र में मारे जाओ तो तुमने कोई भी चीज़ खोई नहीं है बल्कि तुमने एसी चीज़ प्राप्त की है, जो मिथ्याचारियों और काफ़िरों द्वारा अपनी पूरी आयु में एकत्रित की गई वस्तुओं से, बहुत बेहतर है। वह ईश्वर की विशेष दया और कृपा है जो स्वर्ग में तुम्हारे जाने का कारण बनेगी। इन आयतों से हमने यह सीखा कि महत्वपूर्ण बात ईश्वर के मार्ग पर रहना है। इसमें मृत्यु या शहादत से कोई अंतर नहीं पड़ता। यदि कोई ईश्वर के लिए ज्ञान प्राप्ति हेतु यात्रा करे और इस मार्ग में दुर्घटनाग्रस्त हो जाए तो वह ईश्वरीय दया व कृपा का पात्र बनेगा। जब मौत से छुटकारा नहीं है और हम सभी को इस नश्वर संसार से जाना ही है तो क्यों न हम अपनी इच्छा से बेहतरीन मौत का चयन करें? पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के नाती इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कहते हैं कि यदि यह शरीर मृत्यु के लिए तैयार हो चुका है तो सबसे अच्छी मौत, ईश्वर के मार्ग में शहादत है।