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    सूरए आले इमरान; आयतें १६४-१६८ (कार्यक्रम 110)

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    आइए पहले सूरए आले इमरान की १६४वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।لَقَدْ مَنَّ اللَّهُ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ إِذْ بَعَثَ فِيهِمْ رَسُولًا مِنْ أَنْفُسِهِمْ يَتْلُو عَلَيْهِمْ آَيَاتِهِ وَيُزَكِّيهِمْ وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَإِنْ كَانُوا مِنْ قَبْلُ لَفِي ضَلَالٍ مُبِينٍ (164)निःसन्देह, ईश्वर ने ईमान वालों पर उपकार किया उस समय जब उसने उन्हीं में से एक को पैग़म्बर बनाकर भेजा ताकि वह उन्हें ईश्वर की आयतें पढ़कर सुनाए और उन्हें (बुराइयों से) पवित्र करे तथा उन्हें किताब व तत्वदर्शिता की शिक्षा दे। निःसन्देह इससे पूर्व वे खुली हुई पथभ्रष्टता में थे। (3:164) ईश्वरीय सृष्टि में, जो संसार की हर वस्तु विशेषकर मनुष्य के प्रति दया व कृपा के आधार पर की गई है, मार्गदर्शन की सबसे बड़ी कृपा है जो मनुष्य, विशेषरूप से ईश्वर की ओर से पाता है। बिना मार्गदर्शन के मनुष्य की सृष्टि उसकी शक्तियों, योग्यताओं के व्यर्थ जाने या उसके व्यवहार और विचारों के ग़लत मार्ग पर जाने का कारण होगी। जैसा कि आज हम देखते हैं कि जो लोग इस ईश्वरीय मार्गदर्शन को बुद्धि और विशेष रूप से वहि अर्थात ईश्वरीय संदेश के दृष्टिकोण से नहीं देखते उनके ज्ञान ने परिवारों को सुख व शांति पहुंचाने के स्थान पर विकसित समाजों में बेचैनी, चिंता, हिंसा व अशांति जैसे उपहार दिये हैं। परन्तु महान ईश्वर ने लोगों व मानव समाजों को हर प्रकार की बुराई से बचाए रखने और उनके भीतर प्रगति व परिपूर्णता की भूमि समतल करने के लिए पैग़म्बरों को दायित्व सौंपा है कि वे लोगों को ईश्वरीय कथन सुनाकर तथा उन्हें तत्वदर्शिता की बातें सिखाकर उनकी बुद्धि तथा प्रवृत्ति का प्रशिक्षण करे और उन्हें पतन तथा पथभ्रष्टता से मुक्ति दिलाए। इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों का भेजा जाना मनुष्य के लिए सबसे बड़ा आसमानी उपहार है। हमें इस उपहार का मूल्य समझना चाहिए। स्वयं को पापों से पवित्र रखना ज्ञान प्राप्ति पर प्राथमिकता रखता है। केवल वह ज्ञान लाभदायक होता है जिसका स्रोत पवित्र एवं स्वच्छ हो। आत्मनिर्माण तथा स्वयं को पापों से पवित्र बनाना, पैग़म्बरों की शिक्षाओं और ईश्वरीय आयतों की छाया में होना चाहिए। ईश्वरीय कथनों और पैग़म्बरों की शिक्षाओं से हटकर की जाने वाली उपासनाएं स्वयं एक पथभ्रष्टता हैं। आइए अब सूरए आले इमरान की १६५वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।أَوَلَمَّا أَصَابَتْكُمْ مُصِيبَةٌ قَدْ أَصَبْتُمْ مِثْلَيْهَا قُلْتُمْ أَنَّى هَذَا قُلْ هُوَ مِنْ عِنْدِ أَنْفُسِكُمْ إِنَّ اللَّهَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (165)जब भी तुम पर कोई मुसीबत पड़ती है, कि जिसकी दोगुनी (तुम युद्ध में शत्रु पर) डाल चुके हो, तो कहते हो यह (मुसीबत) किस की ओर से है? (हे पैग़म्बर!) कह दो कि यह स्वयं तुम्हारी ओर से है। निःसन्देह, ईश्वर हर काम में सक्षम है। (3:165) ओहद के युद्ध में जब सत्तर मुसलमान शहीद हो गए और उन्हें पराजय हो गई तो उन्होंने पैग़म्बर से पूछा कि हमें क्यों पराजय हुई? उनके उत्तर में ईश्वर कहता है कि पिछले वर्ष बद्र के युद्ध में तुम शत्रु को इससे दोगुनी क्षति पहुंचा चुके हो क्योंकि तुमने उनके सत्तर लोगों की हत्या की और इतने ही लोगों को बंदी भी बनाया था। इसके अतिरिक्त ओहद में तुम्हारी पराजय तुम लोगों की ढिलाई, अवज्ञा तथा मतभेद के कारण हुई। यह मत सोचो कि ईश्वर तुम्हें विजयी बनाने में सक्षम नहीं था। वह हर बात और हर कार्य में सक्षम है परन्तु उसकी सहायता तुम्हारे द्वारा पैग़म्बर के अनुसरण पर निर्भर है। न यह कि तुम पैग़म्बर के आदेशों की अवज्ञा करते जाओ और ईश्वर की ओर से सहायता की भी आशा रखो। इस आयत से हमने यह सीखा कि फ़ैसला करते समय आराम तथा कठिनाई दोनों को एक साथ देखना चाहिए। पराजय के कारणों की समीक्षा करते समय, पहले अपने आंतरिक कारणों को देखना चाहिए। दूसरों को अपनी पराजय का ज़िम्मेदार ठहराने के स्थान पर अपनी कमज़ोरियों को पहचानने और उन्हें दूर करने के बारे में अवश्य सोचना चाहिए।आइए अब सूरए आले इमरान की १६६वीं और १६७वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।وَمَا أَصَابَكُمْ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعَانِ فَبِإِذْنِ اللَّهِ وَلِيَعْلَمَ الْمُؤْمِنِينَ (166) وَلِيَعْلَمَ الَّذِينَ نَافَقُوا وَقِيلَ لَهُمْ تَعَالَوْا قَاتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَوِ ادْفَعُوا قَالُوا لَوْ نَعْلَمُ قِتَالًا لَاتَّبَعْنَاكُمْ هُمْ لِلْكُفْرِ يَوْمَئِذٍ أَقْرَبُ مِنْهُمْ لِلْإِيمَانِ يَقُولُونَ بِأَفْواهِهِمْ مَا لَيْسَ فِي قُلُوبِهِمْ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا يَكْتُمُونَ (167)और (ओहद) में दो गुटों के बीच युद्ध के दिन जो कुछ तुम पर कठिनाई पड़ी वह ईश्वर की इच्छा से थी ताकि ईमान वाले पहचाने जाएं। (3:166) और मिथ्याचारियों के चेहरे लोगों के लिए स्पष्ट हो जाएं। (उन मिथ्याचारियों से) जब कहा गया कि आओ ईश्वर के मार्ग में युद्ध करो या (कम से कम अपने नगर और घरों की) रक्षा करो तो उन्होंने कहा कि यदि हम युद्ध (के दांव-पेच) जानते तो अवश्य ही तुम्हारा साथ देते। उस दिन वे ईमान के मुक़ाबले में कुफ़्र के अधिक निकट थे। वे ज़बान से ऐसी बातें कहते हैं जिन पर वे हृदय से आस्था नहीं रखते और ईश्वर से वे जो कुछ छिपाते हैं वह उसको अधिक जानने वाला है। (3:167) पिछले कार्यक्रमों में यह उल्लेख किया गया था कि जब मक्के के अनेकेश्वरवादियों द्वारा मदीने पर आक्रमण की सूचना मिली तो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने परामर्श के लिए मस्जिद में एक बैठक बुलाई। उस बैठक में बहुमत से यह निर्णय किया गया कि मुसलमान मदीना नगर के बाहर निकलें और ओहद नामक पर्वत के आंचल में जाकर शत्रु का मुक़ाबला करें। परन्तु मदीने के कुछ विशिष्ट लोगों का यह मत था कि नगर में ही रहा जाए और घरों को मोर्चा बनाकर शत्रु का मुक़ाबला किया जाए। पैग़म्बरे इस्लाम ने युवाओं के मत को जो, अधिकांश लोगों का मत था, उनकी राय पर प्राथमिकता दी थी। अतः वे बहुत नाराज़ हुए। इसी लिए ओहद के लिए रवाना होते समय वे स्वयं भी विभिन्न बहानों से वापस आ गए और कुछ मुसलमानों की भावनाओं को कमज़ोर बनाकर उन्हें अपने साथ आधे मार्ग से ही लौटा लाए। क़ुरआन, ईमान वालों को संबोधित करते हुए कहता है कि यद्यपि ओहद का युद्ध बहुत ही कठिन एवं कटु था परन्तु उसके कारण सच्चे ईमान वाले, झूठे दावेदारों से अलग हो गए और यह स्पष्ट हो गया कि कौन लोग पैग़म्बर के आदेश के सामने सिर झुकाने वाले हैं और कौन लोग, पैग़म्बर को अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए चाहते हैं। इन आयतों से हमने यह सीखा कि जीवन की मीठी व कटु घटनाएं, लोगों को पहचानने के लिए ईश्वरीय परीक्षा का मैदान हैं। सचेत रहें कि इन परीक्षाओं मंी हम कहीं अनुत्तीर्ण न हो जाएं। दोमुखी आचरण और मिथ्या, मनुष्य को कुफ़्र व इन्कार की ओर ले जाती है। यह नहीं सोचना चाहिए कि जैसा देस वैसा भेस करने में चतुरता है बल्कि सच्ची और सदैव एक प्रकार की बात करना ही सफलता व विजय का सबसे बड़ा रहस्य है। अपनी जान, सम्मान और देश की रक्षा करना एक उच्च मान्यता है और जो कोई भी इस राह में मारा जाए वह शहीद समझा जाएगा।आइए अब सूरए आले इमरान की १६८वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।الَّذِينَ قَالُوا لِإِخْوَانِهِمْ وَقَعَدُوا لَوْ أَطَاعُونَا مَا قُتِلُوا قُلْ فَادْرَءُوا عَنْ أَنْفُسِكُمُ الْمَوْتَ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ (168)मिथ्याचारी वे लोग हैं जो (स्वयं रणक्षेत्र में जाने से कतरा कर) अपने घरों में बैठ गए हैं परन्तु वे अपने भाइयों के बारे में कहते हैं कि यदि उन्होंने हमारी बात मानी होती तो वे मारे न जाते। (हे पैग़म्बर!) उनसे कह दो कि यदि तुम सच्चे हो तो मौत को अपने से दूर कर लो। जिन लोगों ने युद्ध से पूर्व अपने उल्लंघनों द्वारा मुसलमानों में फूट डाली और उनकी भावनाओं को कमज़ोर बनाया उन्होंने युद्ध के पश्चात भी अपने निराशावादी प्रचार नहीं छोड़े और अपने सम्मान एवं नगर की रक्षा में ढिलाई के कारण स्वयं को बुरा भला कहने के स्थान पर उन्होंने उन लोगों को बुरा भला कहा जो रणक्षेत्र में गए और शहीद हो गए। जबकि मौत केवल रणक्षेत्र में ही नहीं आती बल्कि किसी को भी मौत से छुटकारा नहीं है। (3:168) इसी कारण ईश्वर उनको संबोधित करते हुए कहता है कि यह मत सोचो कि युद्ध से भाग कर तुम मौत से बच गए हो। मौत तो सभी के लिए है। धन्य हैं वे लोग जो ईश्वर की आज्ञा के पालन के मार्ग में आगे बढ़कर मौत को गले लगा लेते हैं और कितना बुरा हाल है उनका जो मौत से भागते हुए उसी के चुंगल में फंस जाते हैं। इस आयत से हमने यह सीखा कि शत्रु के आक्रमण के स्थान पर घर में बैठे रहना और इस्लामी समाज के लिए ख़तरा उत्पन्न करना मिथ्याचार और बेईमानी की निशानी है। शहीदों के परिजनों और घायल योद्धाओं की भावनाओं को कमज़ोर बनाना इस्लामी समाज के मिथ्याचारियों के कार्यक्रमों में से एक है। मिथ्याचारी स्वयं को अन्य लोगों से श्रेष्ठ समझते हैं इसी कारण उनकी यह इच्छा होती है कि अन्य लोग उनके विचारों और उनकी इच्छाओं का अनुसरण करें।