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    सूरए आले इमरान; आयतें १७४-१७८ (कार्यक्रम 112)

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    आइए पहले सूरए आले इमरान की १७४वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।فَانْقَلَبُوا بِنِعْمَةٍ مِنَ اللَّهِ وَفَضْلٍ لَمْ يَمْسَسْهُمْ سُوءٌ وَاتَّبَعُوا رِضْوَانَ اللَّهِ وَاللَّهُ ذُو فَضْلٍ عَظِيمٍ (174)(जो घायल व्यक्ति दूसरी बार प्रतिरक्षा के लिए तैयार हुए हैं) वे ईश्वर की कृपा से, बिना कोई क्षति उठाए वापस लौट आए। उन्होंने ईश्वर की प्रसन्नता का अनुसरण किया और ईश्वर भी महान कृपा वाला है। (3:174)पिछले कार्यक्रमों में हमने यह बताया था कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के आदेश पर ओहद के युद्ध में घायल होने वाले व अन्य योद्धा, शत्रु का पीछा करने के लिए पुनः एकत्रित हो गए। परन्तु चूंकि मुसलमानों की इस भावना और तैयारी से शत्रु भयभीत हो गया था अतः वह मदीने पर आक्रमण का इरादा छोड़कर वापस लौट गया। यह आयत ओहद के युद्ध में घायल होने वालों की सराहना मे उतरी है। इस आयत से हमने सीखा कि यदि हम अपने कर्तव्य का पालन करें तो हम ईश्वरीय कृपा के पात्र बनेंगे। बिना कर्तव्य पालन के ईश्वरीय कृपा की आशा रखना बेकार है। ईश्वर से प्रेम करने वालों के लिए उसकी प्रसन्नता प्राप्त करना महत्वपूर्ण होता है चाहे उसमें वे शहीद हों या घायल या इनमें से कुछ भी न हो। आइए अब सूरए आले इमरान की १७५वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।إِنَّمَا ذَلِكُمُ الشَّيْطَانُ يُخَوِّفُ أَوْلِيَاءَهُ فَلَا تَخَافُوهُمْ وَخَافُونِ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ (175)इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है कि शैतान अपने साथियों व अनुयाइयों को (युद्ध में भाग लेने से) डराता है तो तुम उनसे न डरो और यदि तुम ईमान रखते हो तो केवल मुझसे डरो। (3:175) पिछली आयत में ईश्वर ने कहा था कि वे मुसलमान जो मुझे प्रसन्न करना चाहते हैं वे किसी ही शत्रु से नहीं डरते यहां तक कि यदि वे घायल हों तब भी शत्रु का पीछा करने जाते हैं। यह आयत कमज़ोर ईमान वाले मुसलमानों की ओर संकेत करती है कि शैतान व उसके बहकावे, उन पर इस सीमा तक प्रभाव डाल चुके हैं कि वे ईश्वर के बजाए शैतान का अनुसरण करते हैं और इसी करण ईश्वर के मार्ग में कठिनाइयां उठाने के लिए तैयार नहीं होते। क़ुरआन मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहता है कि यदि तुम अपने ईमान में सच्चे हो तो केवल ईश्वर से डरो और उसके आदेशों का पालन करो और शत्रु की शक्ति से न डरो और न घबराओ कि ईश्वर की शक्ति उससे अधिक है। इस आयत से हमने यह सीखा कि इस्लामी समाज में भय व आतंक उत्पन्न होने का कारण बनने वाला हर प्रचार, शैतानी है। रणक्षेत्र में जाने से डरना, ईमान की कमज़ोरी और शैतान के अनुसरण की निशानी है। अत्याचारग्रस्तों की आवाज़ को दबाने और उनके आंदोलन व संघर्ष को रोकने के लिए बड़ी शक्तियों को एक शैतानी नीति, डराना और धमकाना है।आइए अब सूरए आले इमरान की १७६वीं और १७७वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।وَلَا يَحْزُنْكَ الَّذِينَ يُسَارِعُونَ فِي الْكُفْرِ إِنَّهُمْ لَنْ يَضُرُّوا اللَّهَ شَيْئًا يُرِيدُ اللَّهُ أَلَّا يَجْعَلَ لَهُمْ حَظًّا فِي الْآَخِرَةِ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ (176) إِنَّ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الْكُفْرَ بِالْإِيمَانِ لَنْ يَضُرُّوا اللَّهَ شَيْئًا وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (177)हे पैग़म्बर! कुफ़्र में आगे बढ़ने वाले तुम्हें दुखी न करें, वे कदापि ईश्वर को कोई हानि नहीं पहुंचा सकते। ईश्वर चाहता है कि प्रलय के दिन उनके लिए कोई लाभ न रहे और उनके लिए बहुत ही कड़ा दण्ड है। (3:176) निःसन्देह, जिन लोगों ने ईमान के बदले कुफ़्र ख़रीद लिया है वे कदापि ईश्वर को कोई हानि नहीं पहुंचाएंगे और उनके लिए बहुत ही कठोर दण्ड है। (3:177) ओहद के युद्ध में मुसलमानों की पराजय के पश्चात उनमें से एक गुट के भीतर भय व कमज़ोरी की भावना उत्पन्न हो गई और वे भयभीत व चिन्तित हो गए और वे एक दूसरे से पूछने लगे कि आगे क्या होगा? उनके इस प्रश्न के उत्तर में यह आयत पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहती है कि ओहद के युद्ध में काफ़िरो की विजय उनके कल्याण व मोक्ष का कारण नहीं है बल्कि वे कुफ्र के भंवर में और अधिक फंसते चले जाएंगे जो उन्हें प्रलय मे हर प्रकार के लाभ से वंचित कर देगा। इसके अतिरिक्त, उनका कुफ़्र ईश्वर को कोई हानि नहीं पहुंचा सकता बल्कि उसके कारण स्वयं उन्हीं को हानि होगी और प्रलय के दिन उन्हें बड़ा ही कठोर दण्ड भुगतना होगा। इस आयत की रोचक बातों में से एक, ईमान को गंवाने और कुफ़्र में फंसने के लिए ख़रीदने और बेचने की संज्ञा का प्रयोग है। क़ुरआन इस संसार को एक बाज़ार कहता है और लोगों को इस बाज़ार के विक्रेता, जो अपने अस्तित्व की पूंजी अर्थात कर्म और विश्वास को बेचते आए हैं। इस बाज़ार में बेचना अनिवार्य है क्योंकि हमारी आयु हमारे नियंत्रण में नहीं है परन्तु ग्राहक का चयन हमारे हाथ में है। ग्राहक या तो ईश्वर है या उसके अतिरिक्त कोई और। क़ुरआन ऐसे लोगों की सराहना करता है जो ईश्वर के साथ लेन-देन करते हैं और भारी लाभ उठाते हैं जो कि ईश्वरीय स्वर्ग है। इसी प्रकार से क़ुरआन उन लोगों की आलोचना करता है जो अपनी आयु के लेनेदेन में या लाभ नहीं उठाते या उन्हें भारी घाटा होता है। इन आयतों से हमने यह सीखा कि ईश्वर को हमारे असित्तव या हमारे कर्मों की कोई आवश्यकता नहीं है कि यदि कोई काफ़िर हो जाए और अपने कर्तव्यों का पालन न करे तो उसे घाटा होगा या उसका धर्म कमज़ोर पड़ जाएगा। विश्वास में कुफ़्र और व्यवहार में कर्म में अकृतज्ञता मनुष्य को प्रलय में ईश्वरीय दया व कृपा से वंचित कर देती है। काफ़िर समुदायों और इस्लामी समाज की तुलना करते समय केवल उनके संसार को ही नहीं देखना चाहिए बल्कि प्रलय में ईश्वरीय अनुकंपाओं से उनके वंचित होने पर भी ध्यान देना चाहिए। इससे हमारे विचारों और आत्मा को शांति मिलेगी।आइए अब सूरए आले इमरान की १७८वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَلَا يَحْسَبَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا أَنَّمَا نُمْلِي لَهُمْ خَيْرٌ لِأَنْفُسِهِمْ إِنَّمَا نُمْلِي لَهُمْ لِيَزْدَادُوا إِثْمًا وَلَهُمْ عَذَابٌ مُهِينٌ (178)और जो लोग काफ़िर हुए वे यह न सोचें कि हम उन्हें जो मोहलत देते हैं वह उनके लिए अच्छी है बल्कि इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है कि हम उन्हें मोहलत देते हैं ताकि वे अपने पापों में वृद्धि कर लें और उनके लिए अपमानजनक दण्ड है। (3:178) पिछली आयतों में मुसलमानों को यह सांत्वना देने के पश्चात कि वे काफ़िरों की विजय से दुखी व चिन्तित न हों, इस आयत में ईश्वर कहता है कि काफ़िरों को मोहलत देना ईश्वरीय परंपरा है न कि उन्हें दण्डित करने में ईश्वर की अक्षमता और अज्ञानता की निशानी। ईश्वर ने सभी मनुष्यों को चाहे वे अच्छे हों या बुरे, ईमान वाले हों या काफ़िर, यह अधिकार दिया है कि वे अपने कर्मों को पूरे अधिकार के साथ करें और अपने जीवन के मार्ग का चयन स्वयं करें। तो उन्हें मोहलत दी जानी चाहिए कि हर कोई अपने मन और इच्छा से जैसा करना चाहें वैसा करें, नहीं तो लोगों के चयन और अधिकार का कोई अर्थ नहीं रहेगा। अलबत्ता स्वाभाविक है कि काफ़िर इस ईश्वरीय मोहलत से ग़लत लाभ उठाता है और बुरे कर्म करता है और उस मोहलत का परिणाम, पापों में वृद्धि के रूप में निकलता है परन्तु स्वेच्छा से किये गए कर्म का मूल्य इतना अधिक है कि ईश्वर इस परिणाम को मनुष्य से अधिकार छीनने का कारण नहीं बनाता बल्कि वह काफ़िर को भी मोहलत देता है कि वह जैसा चाहे कर्म करे। यद्यपि काफ़िर इस मोहलत को अपने हित में समझते हैं और यह विचार करते हैं कि उनके कर्मों के लिए भूमि प्रशस्त होना, उनके तथा उनके कर्मों के अच्छे होने के अर्थ में है परन्तु स्वाभाविक है कि कुफ़्र और बुराई का अंत प्रलय में कड़े दण्ड के अतिरिक्त कुछ न होगा। इन आयतों से हमने यह सीखा कि ईश्वरीय मोहलत उसकी दृष्टि में प्रिय होने की निशानी नहीं है। इन मोहलतों से धोखा नहीं खाना चाहिए। लंबी आयु महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि आयु से लाभ उठाने की पद्धति महत्व रखती है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने मकारिमुल अख़लाक नामक एक दुआ में ईश्वर से प्रार्थना की है कि यदि मेरी आयु शैतान की चरागाह बन रही है तो उसे छोटा कर दे। काफ़िरों की स्थिति देखकर तुरन्त ही निर्णय नहीं करना चाहिए बल्कि उनके अंत और प्रलय में उनकी दशा को भी दृष्टिगत रखना आवश्यक है। अत्याचारियों के शासन को, उनसे ईश्वर के प्रसन्न होने का चिन्ह नहीं समझना चाहिए और उनके मुक़ाबले में चुप नहीं बैठना चाहिए।