islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए आले इमरान; आयतें १८३-१८६ (कार्यक्रम 114)

    सूरए आले इमरान; आयतें १८३-१८६ (कार्यक्रम 114)

    Rate this post

    आइए पहले सूरए आले इमरान की १८३वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।الَّذِينَ قَالُوا إِنَّ اللَّهَ عَهِدَ إِلَيْنَا أَلَّا نُؤْمِنَ لِرَسُولٍ حَتَّى يَأْتِيَنَا بِقُرْبَانٍ تَأْكُلُهُ النَّارُ قُلْ قَدْ جَاءَكُمْ رُسُلٌ مِنْ قَبْلِي بِالْبَيِّنَاتِ وَبِالَّذِي قُلْتُمْ فَلِمَ قَتَلْتُمُوهُمْ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ (183)वही लोग जिन्होंने कहा कि ईश्वर ने हमसे वचन लिया है कि हम किसी भी पैग़म्बर पर ईमान न लाएं सिवाए इसके कि वह हमारे लिए एक ऐसी बलि लाए जिसे आग व बजिली खा जाए। (हे पैग़म्बर!) कह दो कि निःसन्देह मुझसे पूर्व भी पैग़म्बर आए हैं जिनके पास स्पष्ट चमत्कार और निशानिया थीं और जो कुछ तुमने कहा वे ले आए, तो फिर तुमने उनकी हत्या क्यों की यदि तुम सच्चे हो। (3:183) यहूदियों का एक गुट पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर ईमान न लाने के लिए सदैव बहाने बनाता रहता था जिनमें से एक बहाने की ओर आयत में संकेत किया गया है। वे कहते थे हम तो उस पैग़म्बर पर ईमान लाएंगे जो किसी पशु को बलि करे और आकाश की बिजली उसे लोगों के सामने जला दे, जो उस बलि के स्वीकार होने की निशानी है जैसाकि हज़रत आदम के बेटों हाबील और क़ाबील के बारे में ईश्वर ने हाबील की बलि को आकाश की बिजली से जलाकर स्वीकार कर लिया तथा क़ाबील की बलि को स्वीकार नहीं किया। ईश्वर, यहूदियों के इस बहाने के उत्तर में कहता है कि प्रथम तो यह आवश्यकता नहीं है कि सभी पैग़म्बरों के चमत्कार एक दूसरे के समान हों बल्कि हर पैग़म्बर का कोई न कोई चमत्कार होना चाहिए। दूसरे जिन पैग़म्बरों ने इस प्रकार का चमत्कार दिखाया भी तो तुमने उन्हें स्वीकार नहीं किया बल्कि तुम लोगों के पूर्वजों ने उनकी हत्या करदी जिसकी पुष्टि तौरेत में भी की गई है। इस आयत से हमने सीखा कि सत्य को स्वीकार करने से बचने के लिए अपने कार्यों को धर्म तथा ईश्वर की ओर संबन्धित करके उनका औचित्य नहीं दर्शाना चाहिए क्योंकि यह अच्छा काम नहीं है। ईश्वर के मार्ग में पशुओं की बलि चढ़ाना एक प्राचीन परंपरा है और कभी कभी इसे पैग़म्बरों के चमत्कार के रूप में भी प्रयोग किया गया है।आइए अब सूरए आले इमरान की आयत नंबर १८४ की तिलावत सुनते हैं।فَإِنْ كَذَّبُوكَ فَقَدْ كُذِّبَ رُسُلٌ مِنْ قَبْلِكَ جَاءُوا بِالْبَيِّنَاتِ وَالزُّبُرِ وَالْكِتَابِ الْمُنِيرِ (184)हे पैग़म्बर! यदि (बहाने बनाने वाले) तुम्हें भी झुठला दें (तो दुखी मत हो क्योंकि) तमु से पहले भी जो पैग़म्बर चमत्कारों तत्वदर्शी लेखों और स्पष्ट करने वाली किताब के साथ आए थे, उनको भी झुठलाया गया था। (3:184) यह आयत पैग़म्बर को संबोधित करते हुए कहती है कि सत्य का इन्कार करना और उसे झुठलाना, सदा से ही विरोधियों की आदत रही है। यह न सोचो कि केवल तुम्हारे ही सामने एक गुट खड़े होकर तुम्हें झुठला रहा है बल्कि तुमसे पूर्व भी जो पैग़म्बर थे, यद्यपि उन्होंने अपनी सत्यता के प्रमाण में स्पष्ट तर्क व निशानियां प्रस्तुत की थीं परन्तु उन्हें भी झुठलाया गया। मूल रूप से विरोध व इन्कार, ईश्वर ने मनुष्य को जो चयन का अधिकार दिया है उसी से प्रभावित होता है। यदि सारे लोग पैग़म्बरों पर ईमान ले आते तो उनकी सत्यता के बारे में संदेह होता कि यह कैसा धर्म है जो हर प्रकार के अच्छे और बुरे विचारों के अनुकूल है। इस आयत से हमने यह सीखा कि पिछले लोगों के इतिहास का ज्ञान तथा सत्य व असत्य के बीच होने वाले संघर्ष की जानकारी मनुष्य में धैर्य व संयम की भावना को बढ़ा देती है और उसके मन को शांत करती है। पैग़म्बरों का आन्दोलन कथन व किताब के द्वारा एक सांस्कृतिक आन्दोलन था और विरोधियों से जेहाद बाद के चरण में तथा लोगों पर उनके शासन को रोकने के उद्देश्य से था।आइए अब सूरए आले इमरान की आयत संख्या १८५ की तिलावत सुनते हैं।كُلُّ نَفْسٍ ذَائِقَةُ الْمَوْتِ وَإِنَّمَا تُوَفَّوْنَ أُجُورَكُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فَمَنْ زُحْزِحَ عَنِ النَّارِ وَأُدْخِلَ الْجَنَّةَ فَقَدْ فَازَ وَمَا الْحَيَاةُ الدُّنْيَا إِلَّا مَتَاعُ الْغُرُورِ (185)हर कोई मृत्यु का स्वाद चखने वाला है और निःसन्देह प्रलय के दिन तुम्हें (तुम्हारे कर्मो का) बदला पूर्ण रूप से दे दिया जाएगा। तो जो कोई नरक से दूर रखा जाए और स्वर्ग में चला जाए तो निश्चित रूप से उसे कल्याण प्राप्त हो गया है और (जान लो कि) संसार का जीवन धोखे की वस्तु के अतिरिक्त कुछ नहीं है। (3:185) यह आयत पैग़म्बरों और उनके अनयाइयों को, जिन्हें सदैव ही विरोधियों की यातनाओं का सामना रहा है संबोधित करते हुए कहती है कि धैर्य रखों और प्रतिरोध करो तथा जानलो कि यह सब हठधर्मिता अस्थाई है और सभी मरने वाले हैं अतः प्रलय में अपने अंजाम के बारे में सोचते रहो कि जो कोई नरक से बच गया और स्वर्ग में चला गया वही सफल है। अतः इस नश्वर एवं अल्पकालीन संसार से मन न लगाओ कि इसकी चकाचौंध केवल एक धोखा है। इस आयत से हमने यह सीखा कि मृत्यु सबके लिए है चाहे वह सुधार करने वाला पैग़म्बर हो या बिगाड़ पैदा करने वाला व्यक्ति। न काफ़िर इस संसार में रहने वाला है और न ही मोमिन। सभी यहां आते हैं और कुछ समय के पश्चात वापस चले जाते हैं। मृत्यु अंत नहीं है बल्कि यह एक सराय से दूसरी सराय तक स्थानांतरण है। हर कोई इस स्थानांतरण का स्वाद चखेगा। अब कुछ को यह अच्छा लगता है जबकि कुछ को बुरा संसार में काफ़िरों की धन दौलत तुम्हें धोखा न देने पाए क्योंकि अनंत विभूति केवल प्रलय के स्वर्ग में मिलेगी न कि संसार में।आइए अब सूरए आले इमरन की आयत नंबर १८६ की तिलावत सुनते हैं।لَتُبْلَوُنَّ فِي أَمْوَالِكُمْ وَأَنْفُسِكُمْ وَلَتَسْمَعُنَّ مِنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِنْ قَبْلِكُمْ وَمِنَ الَّذِينَ أَشْرَكُوا أَذًى كَثِيرًا وَإِنْ تَصْبِرُوا وَتَتَّقُوا فَإِنَّ ذَلِكَ مِنْ عَزْمِ الْأُمُورِ (186)निःसन्देह, तुम्हारे धन व माल तथा जान द्वारा तुम्हारी परीक्षा ली जाएगी और जिन लोगों को तुमसे पूर्व किताब दी गई है और इसी प्रकार से जिन लोगों ने किसी को ईश्वर का समकक्ष बना दिया है उनकी ओर से तुम बहुत यातनाएं (झेलो और) सुनोगे। और जान लो कि यदि तुम संयम बरतो और केवल ईश्वर से डरो तो यह कर्मों की दृढ़ता की निशानी है। (3:186) इतिहास में वर्णित है कि जब मुसलमानों ने मक्के से मदीने की ओर पलायल किया तो अनेकेश्वरवादी उनके धन व संपत्ति पर अतिक्रमण करते थे अन्य मुसलमानों को मौखिक रूप से घाव लगाते थे। दूसरी ओर मदीने के यहूदी भी मुसलमनों को ताने देकर या मुसलिम महिलाओं का अनादर करके उन्हें यातनाएं दिया करते थे। यह कार्य इतना बढ़ गया था कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने इस अभियान के अगुआ की हत्या का आदेश दे दिया। यह आयत ईश्वर की एक महान परंपरा अर्थात परीक्षा की ओर संकेत करते हुए मुसलमानों से कहती है कि यह मत सोचो कि इस्लाम लाने से तुम्हें आराम प्राप्त हो जाएगा। बल्कि तुम्हें सदैव शत्रुओं की ओर से षड्यंत्रों और यातनाओं के लिए तैयार रहना चाहिए। यहां तक कि यदि तुम उन्हें उनकी स्थिति पर छोड़ दो तब भी वे नहीं मानेंगे और किसी न किसी रूप में अपने कुफ़्र व अपनी शत्रुता को प्रकट करते ही रहेंगे। इस आयत से हमने यह सीखा कि धन, संपत्ति तथा ज्ञान सदैव परीक्षा की कगार पर है। हमें इस प्रकार से जीवन व्यतीत करना चाहिए कि सदैव ईश्वर के मार्ग में जान व माल देने के लिए तैयार रहें। इस्लाम के शत्रु, इस्लाम व मुसलमानों को क्षति पहुंचाने में समन्वय रखते हैं अतः उनसे मुक़ाबले के लिए मुसलमानों को भी समन्वित होना चाहिए। धैर्य व ईश्वर से भय दोनों एक साथ सफलता का कारण बनते हैं परन्तु ज़िद्दी लोगों के ईश्वर से डर के बिना भी दृढ़ता व स्थिरता उतपन्न हो सकती है।