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    सूरए आले इमरान; आयतें १८७-१९० (कार्यक्रम 115)

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    आइये पहले सूरए आले इमरान की आयत नंबर 187 की तिलावत सुनें।وَإِذْ أَخَذَ اللَّهُ مِيثَاقَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ لَتُبَيِّنُنَّهُ لِلنَّاسِ وَلَا تَكْتُمُونَهُ فَنَبَذُوهُ وَرَاءَ ظُهُورِهِمْ وَاشْتَرَوْا بِهِ ثَمَنًا قَلِيلًا فَبِئْسَ مَا يَشْتَرُونَ (187)और जब ईश्वर ने (विद्वानों से और) जिन्हें (आसमानी) किताब दी गई थी, यह वचन लिया कि लोगों के लिए (किताब की आयतों को) स्पष्ट करो और उसे न छिपाओ तो उन्होंने उस वचन को पीठ पीछे डाल दिया (अर्थात उसकी परवाह नहीं की) और उसे सस्ते दामों बेच दिया तो उन्होंने कितनी बुरी वस्तु ख़रीदी। (3:187)हर जाति व समुदाय में आम लोग, जो साधारण स्तर के होते हैं, अपने जीवन के मार्ग और धार्मिक आचरण के चयन में अपने विद्वानों और नेताओं का अनुसरण करते हैं अतः भले विद्वान समाज के सुधार का भ्रष्ठ विद्वान समाज की भ्रष्टता का कारण बनते हैं।विद्वानों, विचारकों और धार्मिक वास्तविकताओं के ज्ञानियों पर ईश्वर ने जो दायित्व डाले हैं उनमें से एक लोगों को वास्तविकताओं से अवगत कराना है। विद्वान न केवल अपने को बल्कि समाज को भी सुधारने के उत्तरदायी हैं अतः ईश्वरीय निशानियों को छिपाना, जिन्हें केवल विद्वान ही समझ सकते हैं, क़ुरआन की दृष्टि में सबसे बड़े पापों में से एक है।जैसा कि देखा जा रहा है, आजकल ईसाइयों और यहूदियों के विद्वान तौरैत व इंजील में दर्ज पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के आगमन की शुभ सूचना के बारे में चुप्पी साधे हुए हैं और लोगों को वास्तविकता से अवगत नहीं कराते बल्कि वे अपने पद व स्थान की रक्षा के लिए आसमानी किताब की आयतों पर थोड़े से सांसारिक माल से समझौता करने पर तैयार हो जाते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि न केवल यह कि अनुचित बात बल्कि अनुचित मौन पर भी दंड दिया जाएगा। वास्तविकता को छिपाना ऐसा पाप है जिसका ख़तरा हर जाति के विद्वानों को लगा रहता है और इसके परिणाम कभी कभी शताब्दियों तक बाक़ी रहते हैं।विद्वानों व ज्ञानी लोगों के मार्गदर्शन व ज्ञान के प्रति ज़िम्मेदार हैं।संसार का मोह रखने वाले विद्वान, समाज की भलाई के स्थान पर उसके पतन या पथभ्रष्टता का कारण बनते हैं।आइये अब सूरए आले इमरान की आयत नंबर 188 की तिलावत सुनें।لَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ يَفْرَحُونَ بِمَا أَتَوْا وَيُحِبُّونَ أَنْ يُحْمَدُوا بِمَا لَمْ يَفْعَلُوا فَلَا تَحْسَبَنَّهُمْ بِمَفَازَةٍ مِنَ الْعَذَابِ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (188)कदापि यह न सोचो कि जो लोग अपने किए पर प्रसन्न होते हैं और यह चाहते हैं कि जो कुछ उन्होंने नहीं किया है उस पर उनकी प्रशंसा की जाए तो कदापि यह न सोचो कि उन्हें दंड से मुक्ति मिल जाएगी बल्कि उनके लिए कड़ा दंड है। (3:188)संसार में तीन प्रकार के लोग होते हैं। एक गुट ऐसे लोगों का है जो काम करते हैं और यह नहीं सोचते कि ईश्वर के अतिरिक्त कोई और जाने, यहां तक कि दान-दक्षिणा करते समय भी वे नहीं चाहते कि कोई उन्हें पहचाने। दूसरा गुट ऐसे लोगों का है जो अपनी प्रशंसा करवाने के लिए भले कर्म करते हैं, ऐसे लोग दिखावा करने वाले हैं। तीसरा गुट ऐसे लोगों का है जो बिना कुछ किए ही प्रशंसा प्राप्त करना चाहते हैं या दूसरों के कामों को अपने करवाना चाहते हैं। यह गुट जिसकी ओर आयत संकेत करती है, उन अनपढ़ लोगों की भांति है जो यह चाहते हैं कि लोग उन्हें विद्वान समझें या उन डरपोकों की भांति है जो स्वयं को वीर समझ कर प्रसन्न होते हैं। चूंकि इस प्रकार के व्यवहार का आधार धोखा व कपट होता है अतः ऐसे लोगों को कदापि कल्याण प्राप्त नहीं हो सकेगा।इस आयत से हमने सीखा कि बिना काम किए प्रशंसा की आशा रखना बेकार है जो मनुष्य के पतन का मार्ग प्रशस्त करता है।बिना कर्म के प्रशंसा की आशा रखने से अधिक ख़तरनाक, लोगों का यह दृष्टिकोण है कि वे सोचते हैं कि बड़ी-बड़ी उपाधियों वाले परंतु अंदर से ख़ाली लोग जो उन पर शासन करते हैं, मोक्ष व कल्याण प्राप्त कर लेंगे।हर प्रकार की चापलूसी वर्जित है क्योंकि इसके कारण बिना कर्म के प्रशंसा प्राप्त करने की भावना फैलती है।संभव है कि पापी अपने पाप पर लज्जित हो और तौबा कर ले परंतु घमंडी लोग तौबा भी नहीं करते अतः उनकी मुक्ति की कोई संभावना नहीं है।आइए अब सूरए आले इमरान की आयत नंबर 189 और 190 की तिलावत सुनें।وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاللَّهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (189) إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ لَآَيَاتٍ لِأُولِي الْأَلْبَابِ (190)आकाशों और धरती का शासन ईश्वर के लिए विशेष है और ईश्वर हर बात में सक्षम है। (3:189) निःसंदेह आकाशों और धरती की सृष्टि तथा रात-दिन के आने जाने में बुद्धिमानों के लिए (ईश्वर की स्पष्ट) निशानियां हैं। (3:190)क़ुरआन की विशेषताओं में से एक मनुष्य को सृष्टि व प्रकृति में विचार करने के लिए निमंत्रण देना है। यद्यपि हर वह व्यक्ति जो क़ुरआने मजीद पर विश्वास रखता है, वास्तव में ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करता है परंतु वह ईमान मूल्यवान है जो ज्ञान व ईश्वर की सही पहचान के आधार पर हो। एक मुसलमान व्यक्ति को न केवल धरती बल्कि आकाश के बारे में भी यह सोचना चाहिए और सृष्टि की आश्चर्यजनक व्यवस्था के बारे में भी विचार करना चाहिए।संसार व सृष्टि की सबसे सरल व आम बात, यहां तक कि रात व दिन के आने जाने को भी महत्वहीन नहीं समझना चाहिए बल्कि साल भर में घंटों का परिवर्तन व रात-दिन का सुव्यवस्थित ढंग से आना जाना भी मनुष्य के लिए ईश्वर को समझने का एक पाठ है। इस मार्ग से वह ईश्वर की अनंत शक्ति को भी समझ सकता है और यह भी जान सकता है कि इस संसार पर ईश्वर के अतिरिक्त किसी का भी शासन नहीं है।क़ुरआने मजीद की व्याख्या की पुस्तकों में वर्णित है कि एक रात पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम अपने घर में आराम कर रहे थे। अभी वे लेटे ही थे कि उठ खड़े हुए और वुज़ू करके नमाज़ पढ़ने लगे। नमाज़ में वे इतना रोए कि उनका वस्त्र और धरती आंसुओं से गीली हो गई। जब उनसे इतना अधिक रोने का कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा कि कल रात मुझ पर कुछ आयतें उतरीं जिनमें सृष्टि पर विचार का निमंत्रण दिया गया था। कितना बुरा हाल होगा उसका जो इन आयतों को पढ़े और विचार न करे। इसी कारण अत्यधिक सिफ़ारिश की गई है कि रात्रिकालीन नमाज़ से पूर्व इन आयतों को जो सूरए आले इमरान की 190 से 194 तक की आयतें हैं, पढ़ा जाए।इन आयतों से हमने सीखा कि धरती और उससे संबंधित मामले जैसे धन और पद इत्यादि हमें लुभाएं नहीं क्योंकि धरती अपनी पूरी महानता के बावजूद आकाशों के मुक़ाबले में कुछ भी नहीं है। धरती के एक टुकड़े पर राज कहां और पूरे ब्रह्मांड पर ईश्वर का अनंत शासन कहां?सृष्टि व उसके रहस्यों की पहचान, ईश्वर व उसकी शक्ति की गहरी पहचान की भूमिका है। भौतिक विज्ञान, ईश्वर की पहचान व लोगों के ईमान को सुदृढ़ बनाने में सहायक सिद्ध हो सकता है।ईश्वर की पहचान के लिए सृष्टि के बारे में विचार करना बुद्धिमत्ता की और बिना रचयिता की पहचान के सृष्टि से लाभ उठाना बुद्धिहीनता की निशानी है।