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    सूरए आले इमरान; आयतें १८-२२ (कार्यक्रम 83)

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    सूरए आले इमरान की आयत संख्या १८ इस प्रकार है। شَهِدَ اللَّهُ أَنَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ وَالْمَلَائِكَةُ وَأُولُو الْعِلْمِ قَائِمًا بِالْقِسْطِ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ (18) अल्लाह ने गवाही दी है कि उसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है और फ़रिश्तों तथा ज्ञानियों ने भी गवाही दी है। वह न्याय स्थापित करने वाला है, उसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है, वह प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है। (3:18) यह आयत पैग़म्बर तथा मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहती है कि ईश्वर का इन्कार करने वालों का इन्कार इस बात का कारण न बने कि वे अपने मार्ग के बारे मे संदेह में पड़ जाएं क्योंकि वास्तविक विद्वानों ने, कि जो तर्क वाले हैं, ईश्वर के एक होने की गवाही दी है। इसके अतिरिक्त सृष्टि की व्यवस्था, कि जो संतुलन पर आधारित है, स्वयं ईश्वर के एक होने का सबसे अच्छा प्रमाण है और अल्लाह ने इस सृष्टि और आकाशों, पृथ्वी, पहाड़ों, नदियों, पेड़-पौधों और पशुओं की रचना करके, कि जो एक व्यवस्था के अंतर्गत है, व्यवहारिक रूप से अपने एक होने की गवाही दी है। फ़िरश्ते भी, कि जो उसकी ओर से इस संसार की व्यवस्था चलाते हैं, उसके एक होने की गवाही देते हैं। इस आयत से हमने सीखा कि एकेश्वरवाद का सबसे अच्छा प्रमाण संसार की व्यवस्था और विभिन्न रचनाओं के मध्य दिखाई पड़ने वाला समन्वय व सम्पर्क है।ज्ञान का महत्व उस समय होता है जब वह मनुष्य को ईश्वर तक पहुंचा दे। इसी प्रकार ईमान का भी महत्व उस समय होगा जब वह ज्ञान पर आधारित हो।सूरए आले इमरान की आयत संख्या १९ और २० इस प्रकार है। إِنَّ الدِّينَ عِنْدَ اللَّهِ الْإِسْلَامُ وَمَا اخْتَلَفَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ إِلَّا مِنْ بَعْدِ مَا جَاءَهُمُ الْعِلْمُ بَغْيًا بَيْنَهُمْ وَمَنْ يَكْفُرْ بِآَيَاتِ اللَّهِ فَإِنَّ اللَّهَ سَرِيعُ الْحِسَابِ (19) فَإِنْ حَاجُّوكَ فَقُلْ أَسْلَمْتُ وَجْهِيَ لِلَّهِ وَمَنِ اتَّبَعَنِ وَقُلْ لِلَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ وَالْأُمِّيِّينَ أَأَسْلَمْتُمْ فَإِنْ أَسْلَمُوا فَقَدِ اهْتَدَوْا وَإِنْ تَوَلَّوْا فَإِنَّمَا عَلَيْكَ الْبَلَاغُ وَاللَّهُ بَصِيرٌ بِالْعِبَادِ (20) निःसन्देह, अल्लाह के निकट धर्म, केवल इस्लाम है और किताब वालों में मतभेद नहीं हुआ सिवाए इसके बाद कि जब उन्हें सत्य पर विश्वास हो गया था। उन्होंने ईर्ष्या व शत्रुता के कारण सत्य को स्वीकार नहीं किया और जो भी अल्लाह की निशानियों का इन्कार करेगा तो उसे जान लेना चाहिए कि अल्लाह जल्द ही हिसाब लेने वाला है। (3:19) तो हे पैग़म्बर, अगर वे तुम्हारे साथ वाद-विवाद पर तैयार हों तो कह दो कि मैंने स्वयं को अल्लाह के हवाले कर दिया है और उन लोगों ने भी, जो मेरा अनुसरण करते हैं। और किताब वालों और मक्कावासियों से कहो कि क्या तुमने अल्लाह के सामने शीश नवाया है? तो यदि वे मान जाएं तो फिर उन्हें मार्गदर्शन प्राप्त हो गया और अगर वे मुख घुमा लें तो तुम्हारा कर्तव्य केवल संदेश पहुंचाना है और अल्लाह स्वयं अपने बंदों को देखने वाला है। (3:20) हज़रत मूसा या हज़रत ईसा अलैहिमस्सलाम तथा अन्य पैग़म्बरों के काल में लोगों का कर्तव्य उन पर तथा उनके द्वारा लाई हुई किताब पर ईमान लाना था और क़ुरआन के उतरने के पश्चात उन किताबों का अनुसरण करने वालों को पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर ईमान लाना चाहिए था और उनके लाए हुए धर्म का अनुसरण करना चाहिए था किंतु धार्मिक तथा जातीय भेद-भाव इस बात का कारण बना कि उनमें से बहुतों ने इस्लाम को स्वीकार नहीं किया हालांकि उन्हें इस्लाम की सत्यता का भली भांति ज्ञान था। यह आयत ईश्वरीय किताबों का अनुसरण करने वालों से कहती है कि यदि तुम ईश्वर की आज्ञा का पालन करने वाले हो तो तुम्हें इस्लाम स्वीकार कर लेना चाहिए क्योंकि जिस अल्लाह ने हज़रत ईसा तथा मूसा को भेजा है उसी ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को भी भेजा है और तुम्हें आदेश दिया है कि उनका अनुसरण करो तो अब जबकि तुम्हें वास्तविकता का ज्ञान हो चुका है फिर यदि तुमने उनका इन्कार किया तो लोक-परलोक में ईश्वरीय प्रकोप की प्रतीक्षा करो क्योंकि जितना तुम सोचते हो उससे कहीं जल्दी ईश्वर, लोगों को उनके किये का फल देता है। इसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करके कहा जाता है कि काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों द्वारा ईमान लाने हेतु स्वयं को अधिक कठिनाई में मत डालो और उनके साथ अकारण वाद-विवाद न करो क्योंकि तुम्हारा कर्तव्य ईश्वरीय संदेश को लोगों तक पहुंचाना है ताकि लोगों को सत्य का ज्ञान हो जाए। इसीलिए जो चाहे स्वीकार करे और सही मार्ग पर आ जाए किंतु जो सत्य को पहचानने के बाद किसी कारणवश उसे स्वीकार करने पर तैयार नहीं है उसके साथ वार्ता या बहस लाभदायक नहीं होगी। उसे ईश्वर के ज़िम्मे छोड़ दो कि वह अपने दासों पर भली भांति दृष्टि रखे हुए है। इस आयत से हमें यह पाठ मिलता है कि बहुत से मतभेदों का स्रोत ईर्ष्या और भेदभाव हैं न कि अज्ञानता और वास्तविकता का ज्ञान न होना। ईश्वर के निकट एकमात्र स्वीकार्य धर्म इस्लाम है। इसीलिए अन्य ईश्वरीय धर्मों के मानने वाले यदि सही अर्थ में ईश्वर के आदेश का पालन करते हैं तो उन्हें भी ईश्वर के प्रिय धर्म को स्वीकार कर लेना चाहिए। अन्य धर्मों के अनुयाइयों विशेष कर हठधर्मियों के प्रति हमारा कर्तव्य मात्र यह है कि हम उन तक ईश्वरीय संदेश पहुंचा दें। किसी भी प्रकार के वाद-विवाद या झगड़े की आवश्यकता नहीं है। धर्म के चयन के मामले में लोग स्वतंत्र हैं। किसी को बलपूर्वक किसी भी धर्म को स्वीकार करने पर विवश नहीं करना चाहिए। अलबत्ता जो जैसा मार्ग अपने लिए चुनता है उसके परिणाम का भी वह स्वयं ही ज़िम्मेदार होता है।सूरए आले इमरान की आयत संख्या २१ और २२ इस प्रकार है। إِنَّ الَّذِينَ يَكْفُرُونَ بِآَيَاتِ اللَّهِ وَيَقْتُلُونَ النَّبِيِّينَ بِغَيْرِ حَقٍّ وَيَقْتُلُونَ الَّذِينَ يَأْمُرُونَ بِالْقِسْطِ مِنَ النَّاسِ فَبَشِّرْهُمْ بِعَذَابٍ أَلِيمٍ (21) أُولَئِكَ الَّذِينَ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ فِي الدُّنْيَا وَالْآَخِرَةِ وَمَا لَهُمْ مِنْ نَاصِرِينَ (22) निःसन्देह, जो लोग ईश्वरीय निशानियों को झुठलाते हैं और पैग़म्बरों को असत्य के लिए मार डालते हैं और लोगों में से ऐसे व्यक्तियों की भी हत्या करते हैं जो न्याय का आदेश देते हों तो उन्हें दुखदायी दण्ड का समाचार दे दो। (3:21) वे ऐसे लोग हैं जिनके कर्म लोक-परलोक में व्यर्थ कर दिये गए हैं और उनका कोई सहायक न होगा। (3:22) पिछली आयत के बाद कि जिसमें ईश्वर के इन्कार की भूमिकाओं अर्थात हठधर्मी व ईर्ष्या की ओर संकेत किया गया है। इस आयत में ईश्वर के इन्कार की भावना और सत्य पर पर्दा डालने के दुष्परिणामों का वर्णन किया गया है। सैद्धांतिक रूप से मनुष्य के कर्म उनके विचारों और विश्वासों से प्रेरित होते हैं जो वैचारिक रूप से सत्य को स्वीकार नहीं करते। वह न केवल यह कि स्वयं सत्य से प्रतिबद्ध नहीं होता बल्कि ऐसे लोगों का भी शत्रु होता है जो समाज में न्याय व सत्य का राज चाहते हैं और इस शत्रुता में इतना आगे बढ़ जाता है कि निर्दोष जनता के ख़ून से अपना हाथ रंग लेता है और न्यायप्रेमी व न्याय प्रचारक नेताओं की हत्या का प्रयास करता है या फिर उनकी हत्या से सहमत होता है और उनके मारे जाने पर प्रसन्न होता है। स्पष्ट है कि विचार और व्यवहार में सत्य का इस प्रकार से मुक़ाबला करना बनेगा कि ऐसे व्यक्ति से अगर कोई अच्छा काम हो भी गया तो ही इस प्रकार के दुष्कर्म के कारण उस अच्छे कर्म का भी उसे फल नहीं मिलेगा। ठीक उस सेवक की भांति जिसने दसियों वर्ष अपने स्वामी की सेवा की हो और उसके बाद अकारण ही उसके बेटे की हत्या कर दे। स्वाभाविक रूप से उसका यह अपराध इससे पूर्व की उसकी समस्त सेवाओं और अच्छाइयों को नष्ट कर देगा। इस आयत से हमें यह पाठ मिलता है कि ईश्वर का इन्कार और सत्य पर पर्दा डालना कभी ईश्वरीय दूत की हत्या का कारण भी बन जाता है। हमें सतर्क रहना चाहिए कि भृष्ट विचार हमारे भीतर घर न करने पाएं क्योंकि ख़तरनाक काम ग़लत विचारधारा का परिणाम होते हैं। सत्य की ओर बुलाना और न्याय की स्थापना के लिए उठ खड़े होना आवश्यक है भले ही इसके परिणाम में मनुष्य को शहीद होना पड़े। जैसा कि हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने सत्य के लिए अपनी और अपने परिजनों व साथियों की जानें न्योछावर कर दीं। कुछ पाप आकाश से गिरने वाली बिजली की भांति होते हैं कि जो मनुष्य के अच्छे कर्मों के बाग़ को एक ही क्षण में भस्म कर देते हैं और उसमें राख और पछतावे के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बच पाता।

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