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    सूरए आले इमरान; आयतें १-७ (कार्यक्रम 80)

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    सूरए बक़रह की आयतों की व्याख्या समाप्त हुई। अब हम उसके बाद वाले सूरे, अर्थात सूरए आले इमरान की आयतों पर चर्चा करने जा रहे हैं। आले इमरान, पवित्र क़ुरआन का तीसरा सूरा है। इस सूरे में २०० आयतें हैं और यह मदीने में उतरा है। आले इमरान का अर्थ है इमरान का वंश। इमरान, अल्लाह के पैग़म्बर हज़रत मूसा के पिता का नाम है। एक अन्य पैग़म्बर हज़रत ईसा की माता मरियम के पिता का नाम भी इमरान था। यहां पर पर इमरान के वंश से तात्पर्य हज़रत मूसा और हज़रत मरियम का वंश है। सूरए आले इमरान में हज़रत मरियम के जन्म और उनकी तथा उनके पुत्र हज़रत ईसा की उपासनाओं पर चर्चा की गई है। इसमें इमरान के वंश को श्रेष्ठ बताते हुए उसकी सराहना की गई है।सूरए आले इमरान की पहली और दूसरी आयतें इस प्रकार हैं।بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ الم (1) اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ (2)अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपालु और दया करने वाला है। अलिफ़ लाम मीम। (3:1) वह ईश्वर कि जिसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है। वह जीवित तथा सदैव रहने वाला है। (3:2)सूरए बक़रा की आयतों की व्याख्या के दौरान हमने अरबी भाषा की वर्णमाला के अक्षरों अलिफ़ लाम मीम के बारे में चर्चा की थी। क़ुरआन के २९ सूरों के आरंभ में आने वाले यह अक्षर, पवित्र क़ुरआन के उन रहस्यों में से हैं जिनके बारे में अल्लाह और उसके पैग़म्बर के अतिरिक्त किसी को कोई ज्ञान नहीं है। हो सकता है कि यह इस बात का संकेत हो कि यह ईश्वरीय चमत्कार क़ुरआन, इसी साधारण सी वर्णमाला से बना है। तो यदि किसी में क्षमता है तो इन्ही शब्दों की सहायता से वह क़ुरआन की भांति कोई किताब लिख दे। इसके बाद आने वाली आयत में अल्लाह की कुछ विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है। वह जो प्रत्येक गुण का स्वामी और हर प्रकार की बुराई और कमी से दूर है। वह अस्तित्व में ही नहीं बल्कि गुणों में भी अद्वितीय एवं अकेला है। हमारे विपरीत उसके ज्ञान तथा उसकी शक्ति की कोई सीमा नहीं है। उसका जीवन अनंत है। हम इससे पहले भी नहीं थे और इसके बाद भी नहीं रहेंगे किंतु ईश्वर सदैव से था और सदैव रहेगा। इस आधार पर उसके अतिरिक्त किसी भी वस्तु में पूज्य होने की योग्यता नहीं है। इन आयतों से हमने सीखा कि दूसरों के सामने उनके धन या पद के कारण झुकने के स्थान पर केवल उस ईश्वर की उपासना करें। लोगों के पास जो भी गुण हैं वह उसी के दिये हुए हैं तथा लोगों मे जो कुछ भी बुराई होती है ईश्वर उससे दूर है।सूरए आले इमरान की आयत क्रमांक 3 व 4 इस प्रकार है।نَزَّلَ عَلَيْكَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ مُصَدِّقًا لِمَا بَيْنَ يَدَيْهِ وَأَنْزَلَ التَّوْرَاةَ وَالْإِنْجِيلَ (3) مِنْ قَبْلُ هُدًى لِلنَّاسِ وَأَنْزَلَ الْفُرْقَانَ إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا بِآَيَاتِ اللَّهِ لَهُمْ عَذَابٌ شَدِيدٌ وَاللَّهُ عَزِيزٌ ذُو انْتِقَامٍ (4)उसने इस किताब को तुम पर सत्य के साथ उतारा कि जो अपने से पहले वाली किताबों की पुष्टि करती है और तौरेत और इंजील को उतारा (3:3) इससे पूर्व लोगों के मार्गदर्शन बना कर तथा सत्य व असत्य के बीच अंतर दर्शाने वाला बना कर उतारा। निःसन्देह, जो लोग अल्लाह की निशानियों का इन्कार करते हैं उनके लिए कठोर दण्ड है और अल्लाह सक्षम प्रतिशोध लेने वाला है। (3:4)पैग़म्बरे इस्लाम के काल में आसमानी किताबों के बहुत से अनुयायी अर्थात यहूदी और ईसाई, इस बात पर अचरच प्रकट करते थे कि अल्लाह ने तौरेत और इंजील के बाद एक और किताब भेजी है। वे इस बात पर विश्वास के लिए तैयार नहीं थे। यह आयतें उनका उत्तर देते हुए कहती हैं कि अल्लाह ने सदैव ही लोगों के मार्गदर्शन के लिए पैग़म्बरों को चुना है और उनमें से कुछ के साथ किताब और नया धर्म भी भेजा है। यह सारी किताबें और पैग़म्बर, एक दूसरे की पुष्टि करते हैं क्योंकि सबके सब एक ही ईश्वर द्वारा सत्य के साथ भेजे गए हैं। इस आधार पर अचरज की कोई बात नहीं है। जिस ईश्वर ने तौरेत और इंजील को हज़रत मूसा और हज़रत ईसा पर उतारा है उसी ने क़ुरआन को हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर उतारा है। अगर तुम्हें सत्य की खोज है तो फिर क़ुरआन की आयतों पर विश्वास करना होगा और अगर इन्कार करोगे तो फिर लोक-परलोक में ईश्वरीय दण्ड का पात्र बन जाओगे।पैग़म्बरों तथा आसमानी किताबों का लक्ष्य लोगों का एकता तथा सत्य की ओर मार्गदर्शन करना रहा है तो फिर ऐसा नहीं होना चाहिए कि स्वयं यह किताबें ही मतभेद का कारण बन जाएं। चूंकि सत्य को पहचानने में हमे कठिनाई होती है और कभी-कभी हम असमंजस में पड़ जाते हैं अतः ऐसी स्थिति में हमें क़ुरआन की सहायता लेनी चाहिए क्योंकि क़ुरआन, सत्य तथा असत्य की पहचान का उपयुक्त साधन है।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ५ तथा ६ इस प्रकार है।إِنَّ اللَّهَ لَا يَخْفَى عَلَيْهِ شَيْءٌ فِي الْأَرْضِ وَلَا فِي السَّمَاءِ (5) هُوَ الَّذِي يُصَوِّرُكُمْ فِي الْأَرْحَامِ كَيْفَ يَشَاءُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ (6)निःसन्देह, पृथ्वी और आकाश में कोई भी वस्तु अल्लाह से ढकी-छिपी नहीं है। (3:5) वही है जिसने तुम्हें मां के पेट से जैसा रूप चाहा दे दिया। उसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है और वह अपार क्षमता वाला तथा तत्वदर्शी है। (3:6)पाप का एक कारण अल्लाह को भूल जाना भी है। मनुष्य यह भूल जाता है कि वह ईश्वर के सामने है और जो कुछ भी कह रहा है या सुन रहा है या कर रहा है वह ईश्वर से छिपा नहीं है। न केवल मनुष्य के कर्म बल्कि पृथ्वी तथा आकाशों में जो कुछ भी है वह सब अल्लाह के सामने खुली हुई किताब के समान है। और कोई भी वस्तु अल्लाह से छिपी नहीं है। यहां तक कि उस समय भी जब हमारा अस्तित्व लोगों की नज़रों में छिपा हुआ था और हम मां के पेट में थे। तब भी वह हमें जानता था और जैसा उसने चाहा हमें बना दिया। यहां तक कि माता-पिता की पीढ़ियों से चली आने वाली विशेषताएं भी उसी के हाथ में हैं और कोई भी चीज़ उसकी शक्ति से बाहर नहीं है।रोचक बात यह है कि मां के पेट में जिस अल्लाह ने मनुष्य को रंग-रूप और अस्तित्व प्रदान किया वही नियमों को निर्धारित करके और किताबें भेजकर हमारे आचरण और अंतरात्मा को भी संवार देगा तथा समाज को सुव्यवस्थित कर देगा।इन आयतों से हमने यह सीखा कि प्राणियों, स्थानों, कालों और लोगों की भारी उपस्थिति कभी भी इस बात का कारण नहीं बन सकती कि कोई वस्तु अल्लाह से छिपी रह जाए। हालांकि अल्लाह हर काम की क्षमता रखता है किंतु बुद्धि के विपरीत कोई काम नहीं करता। उसकी इच्छाएं उसकी अपार बुद्धि के अनुसार हैं।आइए अब सूरए आले इमरान की आयत संख्या ७ की तिलावत सुनते हैं।هُوَ الَّذِي أَنْزَلَ عَلَيْكَ الْكِتَابَ مِنْهُ آَيَاتٌ مُحْكَمَاتٌ هُنَّ أُمُّ الْكِتَابِ وَأُخَرُ مُتَشَابِهَاتٌ فَأَمَّا الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِمْ زَيْغٌ فَيَتَّبِعُونَ مَا تَشَابَهَ مِنْهُ ابْتِغَاءَ الْفِتْنَةِ وَابْتِغَاءَ تَأْوِيلِهِ وَمَا يَعْلَمُ تَأْوِيلَهُ إِلَّا اللَّهُ وَالرَّاسِخُونَ فِي الْعِلْمِ يَقُولُونَ آَمَنَّا بِهِ كُلٌّ مِنْ عِنْدِ رَبِّنَا وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّا أُولُو الْأَلْبَابِ (7)वह वही है जिसने तुमपर किताब उतारी जिसकी कुछ आयतें स्पष्ट और ठोस हैं कि जो किताब की आधारशिला हैं और कुछ अन्य आयतें मिलती-जुलती हैं। तो जिन लोगों के दिलों में टेढ़ापन होता है वे बुराई तथा मनचाही व्याख्या के लिए मिलती-जुलती आयतों का अनुसरण करते हैं और क़ुरआन का सही ज्ञान अल्लाह तथा ज्ञान में डूबे हुए व्यक्तियों के अतिरिक्त किसी को नहीं है। वे कहते हैं कि हम अल्लाह के पास मौजूद सारी वस्तुओं पर ईमान ले आए और बुद्धिमानों के अतिरिक्त कोई भी सीख नहीं लेता। (3:7)यहां पर ठोस और मिलती-जुलती आयतों की ओर संकेत किया गया है। ठोस आयतों वह होती हैं जिनका अर्थ बिल्कुल स्पष्ट हो जैसे क़ुल हुवल्लाहो अहद अर्थात अल्लाह एक है। यही आयतें क़ुरआन की आधारशिला हैं। अर्थात यह अन्य आयतों की व्याख्या करने वाली हैं।इसके विपरीत मुतशाबेह या मिलती-जुलती आयतें वह होती हैं जिनके अर्थ जटिल होते हैं और एक ही आयत के कई कई अर्थ निकल सकते हैं। उदाहरण स्वरूप यह आयत कि यदुल्लाहे फ़ौक़ा अयदीहिम। इसका अर्थ है कि अल्लाह का हाथ उनके हाथों के ऊपर है। स्पष्ट है कि अल्लाह का तो शरीर ही नहीं है जो हाथ हो तो यहां पर हाथ से तात्पर्य शक्ति एवं क्षमता की ओर संकेत है। प्रायः अल्लाह ने इस संसार की बड़ी ही गूढ़ वास्तविकताओं का सरल और सादे शब्दों में क़ुरआन की आयतों के रूप में वर्णन किया है किंतु इसके बावजूद अल्लाह के गुणों और कार्यों की वास्तविकता को समझना किसी सामान्य व्यक्ति के लिए कठिन है और इस प्रकार के अर्थों को केवल अत्यंत ज्ञानी लोग ही समझ सकते है। लेकिन जो लोग दूसरों को भटकाने के प्रयास में रहते हैं वे लोग क़ुरआन की स्पष्ट तथा ठोस आयतों को छोड़कर इस प्रकार की कई अर्थों वाली आयतों का चयन करते हैं ताकि लोगों को वास्तविकता के प्रति शंका में डालकर अपने लक्ष्य तक पहुंच सकें। वे चाहते हैं कि आयतों की मनचाही व्याख्या करके अपने दृष्टिकोणों को आयतों के हवाले से बयान करें और इस प्रकार अपने भ्रष्ट विचारों की क़ुरआन से पुष्टि लें। जबकि अल्लाह आयत के अंत में कहता है कि केवल ज्ञान में डूबे हुए लोग ही ईश्वरीय आयतों की वास्तविकता से परिचित होते हैं। वे लोग ही इस प्रकार की आयतों की व्याख्या कर सकते हैं। इस प्रकार अपार ज्ञान के स्रोत से निकली हुई क़ुरआनी आयतों को ऐसे व्याख्या करने वाले की आवश्यकता है जिसमें इतना ज्ञान हो कि वह ईश्वरीय शब्दों की गहराई में जाने की क्षमता रखता हो।इस आयत से हमने सीखा कि पवित्र क़ुरआन की कुछ आयतों के कई अर्थ होते हैं जिसे केवल वास्तविक विद्वान ही समझ सकते हैं ताकि अगर कोई बात उनकी समझ में न भी आए तो वे उसका इन्कार या उसमे परिवर्तन न करें।कुछ लोग क़ुरआन के हवाले से अपने भ्रष्ट विचारों को समाज में प्रचलित कर देते हैं। ऐसे लोगों से सदा ही सतर्क रहना चाहिए। पानी उसके मुख्य स्रोत से लेना चाहिए। मुख्य स्रोत पैग़म्बर और उनके परिजन के कथन हैं। बुराई या अशांति फैलाने का अर्थ केवल लड़ाई करना ही नहीं होता बल्कि सबसे बड़ी बुराई तथा अशांति धार्मिक वास्तविकताओं में फेर-बदल करना तथा पवित्र क़ुरआन की आयतों की मनचाही व्याख्या करना है।