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    सूरए आले इमरान; आयतें २८-३२ (कार्यक्रम 85)

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    सूरए आले इमरान की आयत संख्या २८ तथा २९ इस प्रकार है। لَا يَتَّخِذِ الْمُؤْمِنُونَ الْكَافِرِينَ أَوْلِيَاءَ مِنْ دُونِ الْمُؤْمِنِينَ وَمَنْ يَفْعَلْ ذَلِكَ فَلَيْسَ مِنَ اللَّهِ فِي شَيْءٍ إِلَّا أَنْ تَتَّقُوا مِنْهُمْ تُقَاةً وَيُحَذِّرُكُمُ اللَّهُ نَفْسَهُ وَإِلَى اللَّهِ الْمَصِيرُ (28) قُلْ إِنْ تُخْفُوا مَا فِي صُدُورِكُمْ أَوْ تُبْدُوهُ يَعْلَمْهُ اللَّهُ وَيَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَاللَّهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (29)

    ईमान वालों को मोमिनों के स्थान पर काफ़िरों से मित्रता नहीं करनी चाहिए और जिसने भी एसा किया तो ईश्वर के समीप उसे कोई लाभ नहीं मिलेगा, सिवाए इसके कि तुम उनसे तक़य्या करो अर्थात उनके ख़तरे से स्वयं की रक्षा के लिए उनके साथ मेल-जोल रखो और ईश्वर तुम्हें (अपना आज्ञापालन न करने के कारण) स्वयं से डराता है और जान लो कि सभी को उसी की ओर वापस जाना है। (3:28) हे पैग़म्बरः मुसलमानों से कह दो कि जो कुछ तुम्हारे हृदय में है उसे तुम छिपाओ या स्पष्ट करो, ईश्वर उसे जानता है, और वह हर उस वस्तु को जानता है जो धरती या आकाशों में है और ईश्वर हर काम में सक्षम है। (3:29) इन आयतों में इस बात का वर्णन किया गया है कि मुसलमानों का आपसी और काफ़िरों के साथ संबंध कैसा होना चाहिए। आयत कहती है कि दूसरों के साथ मोमिन का संबंध ईमान के आधार पर होना चाहिए क्योंकि धार्मिक संबंध, रिश्तेदारी, सामुदायिक व देशीय संबंधों से अधिक महत्वपूर्ण होता है। इस आधार पर सभी मोमिनों को चाहे वे संसार के किसी भी क्षेत्र से हो, आपसी संबंधों को मज़बूत बनाने तथा आपस में एकता और सहायता उत्पन्न करने का प्रयास करते रहना चाहिए और इस बात की अनुमति नहीं देनी चाहिए कि काफ़िर उनको अपने नियंत्रण में ले लें। अलबत्ता जिस स्थान पर कुफ़्र और अनेकेश्वरवाद का शासन हो और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी न हो उस स्थान पर मोमिन को अपने विश्वासों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने के बजाए, कि जो उसके तथा अन्य मोमिनों के विनाश का कारण बन सकता हो, अपने भीतर अपने विश्वासों को सुरक्षित रखते हुए अस्थाई रूप से शत्रु के साथ मेल-जोल रखना चाहिए।

    स्पष्ट है कि इस प्रकार का व्यवहार वास्तव में धर्म की सुरक्षा के लिए है अतः ऐसे स्थान पर जहां स्वयं धर्म की ख़तरे में हो, किसी से भी डरे बिना, हर वस्तु का बलिदान कर देना चाहिए। जिस प्रकार से पैग़म्बरे इस्लाम के नाती इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने यज़ीद के मुक़ाबले में संघर्ष किया। हालांकि वे जानते थे कि वे और उनके साथी शहीद हो जाएंगे और उनके परिवार के बच्चे और महिलाओं को बंदी बना लिया जाएगा। यह आयत आगे चलकर कहती है कि कहीं ऐसा न हो कि तक़य्ये के बहाने तुम शत्रु के साथ मिल जाओ और उसकी सत्ता को स्वीकार कर लो क्योंकि ईश्वर तुम्हारे हृदय की बातों से परिचित है और वह जानता है कि तुमने किस उद्देश्य से काफ़िरों के साथ संपर्क बना रखा है। इन आयतों से हमने यह सीखा कि हर उस कार्य को स्वीकार करना वर्जित है जो मोमिनों पर काफ़िरों के प्रभुत्व का कारण बनता हो। मोमिनों को अपना आपसी संबंध इतना सुदृढ़ बनाना चाहिए कि शत्रु के प्रभाव के लिए कोई स्थान न बचे। काफ़िरों के ख़तरों से सुरक्षित रहने के लिए अपने धार्मिक विश्वास को छिपाने या उनमें मेल-जोल रखने में कोई बुराई नहीं है परन्तु शर्त यह है कि इस कार्य से धर्म ख़तरे में न पड़े।आले इमरान की आयत संख्या ३० इस प्रकार है।
    يَوْمَ تَجِدُ كُلُّ نَفْسٍ مَا عَمِلَتْ مِنْ خَيْرٍ مُحْضَرًا وَمَا عَمِلَتْ مِنْ سُوءٍ تَوَدُّ لَوْ أَنَّ بَيْنَهَا وَبَيْنَهُ أَمَدًا بَعِيدًا وَيُحَذِّرُكُمُ اللَّهُ نَفْسَهُ وَاللَّهُ رَءُوفٌ بِالْعِبَادِ (30)

    (प्रलय) वह दिन है जब हर व्यक्ति अपने हर अच्छे कर्म को तैयार पाएगा और उसने जो भी बुरा कर्म किया होगा उसके बारे में कामना करेगा कि काश उसके और उस बुरे कर्म के बीच लंबा अंतर होता। ईश्वर तुम्हें अपनी आज्ञा का पालन न करने की ओर से डराता है और वह अपने बंदों के प्रति कृपाशील है। (3:30) यह आयत सभी मोमिनों को सचेत करती है कि तुम्हारे सारे ही कार्य चाहे वे अच्छे हों या बुरे, इस संसार में समाप्त नहीं होते, बल्कि ईश्वर और फ़रिश्तों के पास अंकित होते रहते हैं। यही कर्म प्रलय के दिन तुम्हारी आखों के समक्ष साक्षात्कार रूप में उपस्थित होंगे अतः तुम लोग ईश्वर के कोप से डरो और बुरे कर्मों को छोड़ दो क्योंकि प्रलय के दिन तुम्हारे बुरे कर्म इतने विकृत रूप से तुम्हारे समक्ष आएंगे कि तुम स्वयं ही उनसे घृणा करोगे और उनकी दुर्गंध से पीड़ित हो जाओगे और यह कामना करोगे कि काश तुम्हारे तथा तुम्हारे इन कर्मों के बीच भारी अंतर होता। इस आयत से हमने सीखा कि ऐसे अनेक कार्य जिनसे हम संसार में प्रेम करते हैं, प्रलय में हमारी घृणा के पात्र होंगे अतः हमें अपने भविष्य के विचार में रहना चाहिए। ईश्वर की चेतावनियों का स्रोत उसका प्रेम और उसकी दया है। चूंकि वह हमसे प्रेम करता है अतः ख़तरों से वह हमें सचेत करता रहता है।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ३१ तथा ३२ इस प्रकार है।
    قُلْ إِنْ كُنْتُمْ تُحِبُّونَ اللَّهَ فَاتَّبِعُونِي يُحْبِبْكُمُ اللَّهُ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ (31) قُلْ أَطِيعُوا اللَّهَ وَالرَّسُولَ فَإِنْ تَوَلَّوْا فَإِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْكَافِرِينَ (32)

    (हे पैग़म्बर! मुसलमानों से) कह दीजिए कि यदि तुम ईश्वर से प्रेम करते हो तो मेरा अनुसरण करो ताकि ईश्वर भी तुमसे प्रेम करे और तुम्हारे पापों को क्षमा कर दे। निःसन्देह, ईश्वर अत्यंत क्षमाशील और दयावान है। (3:31) हे पैग़म्बर! फिर कह दीजिए कि मुसलमानो! ईश्वर और पैग़म्बर की आज्ञा का पालन करो। फिर उन्होंने यदि अवहेलना की तो जान लो कि ईश्वर काफ़िरों को पसंद नहीं करता। (3:32) धर्म की एक मुसीबत बड़े-बड़े दावे करना है। कुछ लोग जो ईश्वरीय आदेशों का पालन नहीं करना चाहते, विभिन्न बहानों द्वारा ईश्वरीय आदेशों के पालन से बचना चाहते हैं। वे लोग अपने आलस्य का औचित्य दर्शाने के लिए कहते हैं कि मनुष्य को हृदय में ईश्वर व उसके पैग़म्बरों आदि के साथ प्रेम रखना चाहिए और यह विदित कर्म जो लोगों को धोखा देने और दिखावे का कारण हैं, आवश्यक नहीं हैं। हृदय महत्वपूर्ण है न कि कर्म। यह लोग जो बुद्धिजीवियों और धार्मिकों के भेस में इस प्रकार की बातें करते हैं उनका ध्यान इस बात पर नहीं है कि वास्वत मे वे स्वयं को धोखा दे रहे हैं क्यों ईश्वर से प्रेम की अभिव्यक्ति उसके और उसके पैग़म्बरों के आज्ञापालन के बिना केवल एक दावा है और कोई भी इस दावे को स्वीकार नहीं करेगा। दूसरी ओर हमारे प्रति ईश्वर का प्रेम और उसकी दया, हमारे द्वारा उसके आज्ञापालन पर निर्भर है। ईश्वर उसी से प्रेम करता है जो उसके बताए हुए क़ानूनों का पालन करता है। एसी दशा में ईश्वर उसके पिछले पापों को क्षमा करके उसको अपनी असीम क्षमा व दया का पात्र बना लेता है। आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा है? मनुष्य एसे स्थान तक पहुंच सकता है कि उसकी प्रसन्नता, ईश्वर की प्रसन्नता और उसका अनुसरण ईश्वर का अनुसरण बन जाए। जैसाकि इस आयत में पैग़म्बरे इस्लाम के अनुसरण को ईश्वर का अनुसरण बताया गया है। हार्दिक प्रेम का दावा, उपासना और व्यवहारिक अनुसरण के बिना निर्थक है। हर दावे को व्यावहारिक रूप में सिद्ध होना चाहिए। ईश्वर के कथन की ही भांति पैग़म्बर के कथन और व्यवहार को मानना भी हमारे लिए आवश्यक है और उनकी आज्ञा का पालन न करना कुफ़्र के समान है।