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    सूरए आले इमरान; आयतें ३३-३७ (कार्यक्रम 86)

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    सूरए आले इमरान की आयत संख्या ३३ तथा ३४ इस प्रकार है। إِنَّ اللَّهَ اصْطَفَى آَدَمَ وَنُوحًا وَآَلَ إِبْرَاهِيمَ وَآَلَ عِمْرَانَ عَلَى الْعَالَمِينَ (33) ذُرِّيَّةً بَعْضُهَا مِنْ بَعْضٍ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ34 निःसन्देह ईश्वर ने आदम, नूह और इब्राहीम तथा इमरान के परिवार को संसार में से चुन लिया है। (3:33) ऐसा वंश जो (चुने हुए पिताओं द्वारा संसार में आया है और पवित्रता तथा विशेषताओं में एक समान है और) कुछ अन्य, कुछ दूसरों से हैं, और ईश्वर सुनने तथा जानने वाला है। (3:34) ईश्वर ने लोगों के सही मार्गदर्शन के लिए कुछ लोगों को अपने धर्म प्रचार हेतु चुन लिया है। उनका यह चयन, जन्मजात भी हो सकता है और अच्छे आचरण तथा विशिष्टता के कारण भी। अर्थात ईश्वर ने इस दृष्टि से कि उसका महत्वपूर्ण संदेश लोगों तक भलि-भांति पहुंच जाए, कुछ लोगों की सृष्टि को अन्य लोगों पर वरीयता दी है ताकि लोगों के मार्गदर्शन के कार्य में उन्हें अपने ईमान व प्रयास के अतिरिक्त व्यक्तितत्व की दृष्टि से अन्य लोगों पर एक विशिष्टता मिल जाए। अलबत्ता स्पष्ट सी बात है कि सृष्टि में दी गई यह विशिष्टता उन्हें सत्य के मार्ग के चयन पर विवश नहीं करती बल्कि वे अपनी मर्ज़ी और अपने चयन के इस मार्ग को स्वीकार करते हैं और इस मार्ग में प्रयासरत रहते हैं तथा इसी मात्रा में उनके अत्तरदायित्व में वृद्धि होती रहती है। इन आयतों में पैग़म्बरों की एक महत्वपूर्ण विशिष्टता अर्थात पवित्र व एकेश्वरवादी परिवार में जन्म की ओर संकेत करते हुए यह कहा गया है कि न केवल हज़रत इब्राहीम बल्कि उनका वंश भी जिसमें हज़रत ईसा मसीह, हज़रत मूसा तथा हज़रत मुहम्मद भी हैं, ईश्वर द्वारा चुन लिया गया है और लोगों के मार्गदर्शन का दायित्व उनपर है। इन आयतों से हमने सीखा कि सारे मनुष्य एक स्तर के नहीं हैं। ईश्वर ने उनकी तत्वदर्शिता के आधार पर कुछ मनुष्यों को मार्गदर्शन के लिए, अन्य लोगों का प्रतीक बनाया है। बच्चों तक पिता की परिपूर्णता और विशेषताओं के स्थानांतरण में विरासत की महत्वपूर्ण भूमिका है।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ३५ और ३६ की इस प्रकार है। إِذْ قَالَتِ امْرَأَةُ عِمْرَانَ رَبِّ إِنِّي نَذَرْتُ لَكَ مَا فِي بَطْنِي مُحَرَّرًا فَتَقَبَّلْ مِنِّي إِنَّكَ أَنْتَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ (35) فَلَمَّا وَضَعَتْهَا قَالَتْ رَبِّ إِنِّي وَضَعْتُهَا أُنْثَى وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا وَضَعَتْ وَلَيْسَ الذَّكَرُ كَالْأُنْثَى وَإِنِّي سَمَّيْتُهَا مَرْيَمَ وَإِنِّي أُعِيذُهَا بِكَ وَذُرِّيَّتَهَا مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ36 (हे पैग़म्बर या करो उस समय को) जब इमरान की पत्नी ने कहा, प्रभुवर! जो बच्चा मेरे गर्भ में है उसे मैंने तेरे लिए समर्पित कर दिया है ताकि वह (तेरे उपासनागृह की देखभाल करे और भौतिक आनंदों से) स्वतंत्र रहे अतः तू मुझ से स्वीकार कर कि निःसन्देह तू बड़ा सुनने और जानने वाला है। (3:35) और जब उसकी प्रसूति हुई तो उसने कहा, “प्रभुवर! मैने बेटी को जन्म दिया है (जो तेरे घर की दासी नहीं हो सकती।”) जबकि ईश्वर उसके बारे में अधिक जानने वाला है और वह जानता है कि जिस बेटे की वह कामना कर रही थी वह इस बेटी के समान नहीं है और इमरान की पत्नी ने कहा, प्रभुवर! मैंने इसका नाम मरयम रखा और मैं तुझसे शरण मांगती हूं इसके और इसके वंश के लिए धुत्कारे हुए शैतान से। (3:36) ३३वीं आयत में इमरान के वंश की ओर संकेत करने के पश्चात यह आयतें आरंभ में इमरान की बेटी मरयम और फिर उनके पुत्र ईसा मसीह के जन्म के बारे में वर्णन कर रही है और इसी कारण इस सूरे का नाम सूरए आले इमरान अर्थात इमरान का वंश रखा गया है। इतिहास में वर्णित है कि इमरान और ज़करिया, बनी इस्राईल के दो महान पैग़म्बर थे। इन दोनों का विवाह दो बहनों से हुआ था परन्तु इनमें से किसी को भी संतान नहीं हो रही थी। यहां तक कि इमरान की पत्नी ने ईश्वर से प्रतिज्ञा की कि यदि ईश्वर उन्हें संतान दे तो वे उसको बैतुल मुक़द्दस का सेवक बनाएंगी और ईश्वर के मार्ग में स्वतंत्र कर देंगी। उनकी प्रार्थना पूरी हुई परन्तु जन्म बेटी ने लिया। यह बात उनकी चिंता का विषय बन गई क्योंकि इससे पूर्व कभी भी किसी लड़की को बैतुलमुक़द्दस की सेवा के लिए स्वीकार नहीं किया गया था। इस स्थान पर क़ुरआन कहता है कि ईश्वर तत्वदर्शिता के आधार पर संतान देता है और उसे इस बात का अधिक ज्ञान होता है कि किसको कौन सी संतान दी जा रही है अतः यह संतान यद्यपि लड़की है परन्तु उस बेटे से बेहतर है जिसकी कामना इसकी मां कर रही थी। इस लड़की को अनेक विशेषताएं प्राप्त होने वाली थीं। इन विशेषताओं में से एक हज़रत ईसा मसीह की माता बनने का सौभाग्य था। इन आयतों से हमने यह सीखा कि दूरदर्शी लोग, संतान के जन्म से पूर्व ही उसके सही जीवन मार्ग के विचार में रहते हैं और उसे धर्म तथा समाज सेवा के लिए समर्पित कर देते हैं। मस्जिद की सेवा करना इतना महत्वपूर्ण और मूल्यवान कार्य है कि इतिहास के बड़े-बड़े लोग अपने बच्चों को इस पवित्र कार्य के लिए समर्पित कर दिया करते थे। अपने बच्चों के प्रशिक्षण के लिए केवल अपनी गतिविधियों पर ही भरोसा नहीं करना चाहिए बल्कि ईश्वर से भी प्रार्थना करनी चाहिए कि वो उन्हें पथभ्रष्टता और शैतानी बहकावे से सुरक्षित रखे।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ३७ इस प्रकार है। فَتَقَبَّلَهَا رَبُّهَا بِقَبُولٍ حَسَنٍ وَأَنْبَتَهَا نَبَاتًا حَسَنًا وَكَفَّلَهَا زَكَرِيَّا كُلَّمَا دَخَلَ عَلَيْهَا زَكَرِيَّا الْمِحْرَابَ وَجَدَ عِنْدَهَا رِزْقًا قَالَ يَا مَرْيَمُ أَنَّى لَكِ هَذَا قَالَتْ هُوَ مِنْ عِنْدِ اللَّهِ إِنَّ اللَّهَ يَرْزُقُ مَنْ يَشَاءُ بِغَيْرِ حِسَابٍ37) तो उसके पालनहार ने उसे अच्छे ढंग से स्वीकार कर लिया और उसका बड़ा अच्छा प्रशिक्षण किया और उसकी अभिभावकता, ज़करिया को दी। जब भी हज़रत ज़करिया उसके अर्थात हज़रत मरयम के नमाज़ पढ़ने के स्थान पर जाते तो वहां पर खाद्य सामग्री पाते। उन्होंने पूछा हे मरयम तुम्हारा यह आहार किसकी ओर से है तो मरयम ने कहाः ईश्वर की ओर से कि निःसन्देह, वह जिसे चाहता है बेहिसाब रोज़ी देता है। (3:37) जैसा कि पिछली आयतों में कहा गया है कि हज़रत मरयम की माता ने ईश्वर से प्रतिज्ञा की थी कि वे अपनी संतान को बैतुल मुक़द्दस का सेवक बनाएंगी और इसी कारण उनकी इच्छा थी कि उनके यहां पुत्र हो ताकि उनकी प्रतिज्ञा पूरी हो सके परन्तु ईश्वर ने उन्हें संदेश दिया कि वे बेटी को भी बैतुल मुक़द्दस की सेविका के रूप में स्वीकार करेगा। हज़रत मरयम के पिता, उनके जन्म से पूर्व ही इस नश्वर संसार से चले गए थे अतः उनकी माता उन्हें बैतुल मुक़द्दस में लाईं और यहूदी विद्वानों से कहा कि यह शिशु बैतुल मुक़द्दस का उपहार है। तुममें से कोई भी इसकी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ले। हज़रत ज़करिया ने उन बच्ची का दायित्व स्वीकार कर लिया। हज़रत ज़करिया की अभिभावकता में हज़रत मरयम बड़ी हुईं। ईश्वर की उपासना में वे इतनी लीन रहा करती थीं कि उन्हें अपने लिए भोजन जुटाने तक का विचार नहीं आता था। इसीलिए उनके पास स्वर्ग से ईश्वर की ओर से भोजन आता था। जब भी हज़रत ज़करिया उनके पास उपासना स्थल में जाते तो हज़रत मरयम का विशेष भोजन उनके समीप होता था। इस आयत से हमने सीखा कि यदि ईश्वर के लिए काम किया जाए तो वह दिन-प्रतिदिन उसमें वृद्धि करता है। आध्यात्मिक परिपूर्णता में महिला ऐसे स्थान तक पहुंच सकती है कि ईश्वरीय पैग़म्बर भी चकित रह जाएं। हमें ईश्वर की उपासना और उसके आज्ञापालन के संबंध में अपना कर्तव्य ठीक ढंग से निभाना चाहिए। ईश्वर भी बंदों को रोज़ी देने का अपना कर्तव्य बहुत ही अच्छे ढंग से निभाता है।