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    सूरए आले इमरान; आयतें ३८-४३ (कार्यक्रम 87)

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    सूरए आले इमरान की आयत संख्या ३८ तथा ३९ इस प्रकार है। هُنَالِكَ دَعَا زَكَرِيَّا رَبَّهُ قَالَ رَبِّ هَبْ لِي مِنْ لَدُنْكَ ذُرِّيَّةً طَيِّبَةً إِنَّكَ سَمِيعُ الدُّعَاءِ (38) فَنَادَتْهُ الْمَلَائِكَةُ وَهُوَ قَائِمٌ يُصَلِّي فِي الْمِحْرَابِ أَنَّ اللَّهَ يُبَشِّرُكَ بِيَحْيَى مُصَدِّقًا بِكَلِمَةٍ مِنَ اللَّهِ وَسَيِّدًا وَحَصُورًا وَنَبِيًّا مِنَ الصَّالِحِينَ 39 जब ज़करिया ने (मरयम के पास स्वर्ग का भोजन देखा तो उन्होंने) अपने पालनहार से प्रार्थना की (और) कहा, प्रभुवर मुझे (मरयम जैसी) पवित्र संतान दे, निःसन्देह, तू ही प्रार्थना सुनने वाला है। (3:38) तो जब वे मेहराब में खड़े होकर नमाज़ पढ़ रहे थे तो फ़िरश्तों ने उन्हें पुकारा कि ईश्वर तुम्हें यहया (नाम के पुत्र) की शुभ सूचना देता है जो (भविष्य में) ईश्वर की निशानी (ईसा मसीह) की पुष्टि करेगा, लोगों का सरदार होगा, धर्म में अत्यंत पवित्र और भले पैग़म्बरों में से होगा। (3:39) पिछले कार्यक्रम में आपने सुना कि हज़रत मरयम की माता ने उन्हें बैतुल मुक़द्दस की सेवा के लिए समर्पित कर दिया और वे अपना अधिक समय ईश्वर की उपासना में बिताती थीं। वे ईश्वर की उपासना में इतना लीन हो जाती थीं कि उन्हें खाने पीने का कोई विचार ही नहीं रहता था। जब भी हज़रत ज़करिया उनके उपासना स्थल में जाते तो देखते कि उनके पास स्वर्ग का खाना रखा हुआ है। एक बार जब हज़रत ज़करिया ने यह देखा तो ईश्वर से प्रार्थना की कि जिस प्रकार उसने बांझ होने के बावजूद हज़रत मरयम की माता को ऐसी पवित्र संतान दी उसी प्रकार वह उनकी पत्नी को भी मरयम जैसी संतान दे। हज़रत ज़करिया की यह प्रार्थना स्वीकार हुई और जब वे अपने उपासना स्थल में नमाज़ पढ़ने में व्यस्त थे तो फ़रिश्तों ने आकर उन्हें शुभ सूचना दी कि शीघ्र ही उन्हें यहया नामक पुत्र प्रदान किया जाएगा जिसमें कई विशेषताएं होंगी। प्रथम यह कि वह अपने समय के पैग़म्बर अर्थात हज़रत ईसा मसीह पर ईमान लाएगा जबकि वह स्वयं ईसा मसीह से बड़ा होगा और लोगों में भलाई और पवित्रता के लिए विख्यात होगा और उसका यही कार्य हज़रत ईसा पर लोगों के अधिक ईमान का कारण बनेगा। दूसरे यह कि उसके शिष्टाचार और अच्छे कर्मों के कारण लोग उसे अपना सरदार मानेंगे। तीसरे यह कि वह सांसारिक व भौतिक आनंदों से दूर रहेगा और संसार से दूषित नहीं होगा और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इन विशेषताओं के कारण ईश्वर उसे अपने पैग़म्बर बनाएगा। इस आयत से हमें यह पता चलता है कि संतान का मूल्य उसकी पवित्रता और भलाई से है न कि उसके लड़का या लड़की होने से। इस घटना में ईश्वर ने इमरान को बेटी और ज़करिया को बेटा दिया परन्तु दोनों इतिहास में पवित्र लोगों में शामिल हुए।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ४० और ४१ इस प्रकार है। قَالَ رَبِّ أَنَّى يَكُونُ لِي غُلَامٌ وَقَدْ بَلَغَنِيَ الْكِبَرُ وَامْرَأَتِي عَاقِرٌ قَالَ كَذَلِكَ اللَّهُ يَفْعَلُ مَا يَشَاءُ (40) قَالَ رَبِّ اجْعَلْ لِي آَيَةً قَالَ آَيَتُكَ أَلَّا تُكَلِّمَ النَّاسَ ثَلَاثَةَ أَيَّامٍ إِلَّا رَمْزًا وَاذْكُرْ رَبَّكَ كَثِيرًا وَسَبِّحْ بِالْعَشِيِّ وَالْإِبْكَارِ 41 (ज़करिया ने यह शुभ सूचना सुनकर कहा) प्रभुवर! किस प्रकार मेरे यहां पुत्र हो सकता है जबकि मुझ पर बुढ़ापा आ चुका है और मेरी पत्नी बांझ है? तो ईश्वर ने कहा कि ऐसे ही ईश्वर जो चाहता है कर देता है। (3:40) ज़करिया ने कहा प्रभुवर! मेरे लिए कोई निशानी निर्धारित कर दे। ईश्वर ने कहा, तुम्हारी निशानी यह है कि तुम लोगों से तीन दिन तक बात नहीं कर सकोगे सिवाए संकेत के। और तुम अपने पालनहार को बहुत याद करो तथा रात और भोर समय उसका गुणगान करो। (3:41) यद्यपि हज़रत ज़करिया ने स्वयं ईश्वर से प्रार्थना की थी कि वे उन्हें संतान दे परन्तु जब उन्होंने अपने लिए पुत्र की शुभ सूचना सुनी तो वे आश्चर्य चकित रह गए क्योंकि उनकी पत्नी युवा अवस्था से ही बांझ थीं जो कि बच्चे को जन्म देने का समय होता है और इस समय तो वे स्वयं हज़रत ज़करिया की भांति वृद्ध हो चुकी थीं और उनमें गर्भ धारण करने की कोई निशानी नहीं थी। यह एकदम स्वाभाविक सी बात है कि जब कोई भी मनुष्य प्रकृति के नियम के विरुद्ध कोई बात देखे या सुने तो वह आश्चर्य चकित रह जाता है। उसका हृदय इसे स्वीकार करने के स्थान पर उसे देखने की इच्छा करता है। इसी कारण हज़रत ज़करिया ने ईश्वर से इच्छा प्रकट की थी कि वह उन्हें अपनी असीम शक्ति का एक उदाहरण दिखाए। ईश्वर ने भी उनके लिए एक निशानी निर्धारित कर दी। ईश्वरीय चमत्कार के कारण हज़रत ज़करिया, जो पूर्ण रूप से स्वस्थ थे और उन्हें बात करने में कोई कठिनाई नहीं थी, तीन दिनों तक बोलने की क्षमता खो बैठे। वे संकेतों और होंठ हिलाने के माध्यम से ही अपनी बात दूसरों तक पहुंचा सकते थे। तीन दिनों के भीतर जब भी वे ईश्वर का गुणगान करना चाहते थे तो उनकी ज़बान खुल जाती थी और वे ईश्वर का गुणगान करने लगते थे। इन आयतों से हमने यह सीखा कि ईश्वर का इरादा हर चीज़ से बड़ा होता है। यदि वह चाहे तो बाप का बुढ़ापा और मां का बांझपन बच्चे के जन्म में रुकावट नहीं बन सकता। ईश्वर हर काम करने में सक्षम है। यदि वह चाहे तो जीभ को बात-चीत का साधन बनाए और यदि चाहे तो जीभ से यह क्षमता छीन ले।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ४२ और ४३ इस प्रकार है। وَإِذْ قَالَتِ الْمَلَائِكَةُ يَا مَرْيَمُ إِنَّ اللَّهَ اصْطَفَاكِ وَطَهَّرَكِ وَاصْطَفَاكِ عَلَى نِسَاءِ الْعَالَمِينَ (42) يَا مَرْيَمُ اقْنُتِي لِرَبِّكِ وَاسْجُدِي وَارْكَعِي مَعَ الرَّاكِعِينَ 43 (हे पैग़म्बर! याद करो उस समय को) जब फ़रिश्तों ने कहा कि हे मरियम! ईश्वर ने तुम्हारा चयन किया और तुम्हें पवित्र किया और सारे संसार की महिलाओं पर तुम्हें प्राथमिकता दी। (3:42) तो हे मरियम! अपने पालनहार के समक्ष झुक जाओ, उसका सजदा करो और रूकू करने वालों के साथ रूकू करो। (3:43) हज़रत मरयम की पवित्रता, नमाज़ और ईश्वर की निष्ठापूर्वक उपासना इस बात का कारण बनी कि ईश्वर उनका चयन करे और उन्हें अन्य महिलाओं से ऊंचा स्थान दे। उनका स्थान इतना ऊंचा था कि फ़रिश्ते उनसे बात किया करते थे और ईश्वर की शुभ सूचनाएं या आदेश उन तक सीधे पहुंचाया करते थे। उन्हें इस बात के लिए चुन लिया गया था कि हज़रत ईसा मसीह जैसे पैग़म्बर उनकी ही कोख से जन्म लें तथा उनकी गोद में पलें। फ़रिश्तों ने हज़रत मरयम से कहा कि ईश्वर की इस कृपा और विभूति के धन्यवाद के लिए उसके प्रति अपना झुकाव जारी रखो और अन्य नमाज़ पढ़ने वालों के साथ जमाअत में सजदे और रूकू किया करो। इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर किसी का भी चयन अकारण नहीं करता बल्कि ईश्वर का चयन क्षमता और योग्यता के आधार पर हुआ करता है। हज़रत मरयम, जिन्होंने काफ़ी समय तक निष्ठापूर्वक उपासना की वे इसी प्रकार के स्थान के योग्य बनीं। फ़रिश्ते पैग़म्बरों के अतिरिक्त अन्य लोगों के साथ ही बात कर सकते हैं अलबत्ता इसके लिए शर्त यह है कि उसे भी इसके योग्य होना चाहिए। नमाज़े जमाअत में महिलाओं की उपस्थिति सराहनीय है अलबत्ता इस शर्त के साथ कि वे मरयम जैसी हों।