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    सूरए आले इमरान; आयतें ४४-४७ (कार्यक्रम 88)

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    सूरए आलेइमरान की आयत संख्या ४४ इस प्रकार है।ذَلِكَ مِنْ أَنْبَاءِ الْغَيْبِ نُوحِيهِ إِلَيْكَ وَمَا كُنْتَ لَدَيْهِمْ إِذْ يُلْقُونَ أَقْلَامَهُمْ أَيُّهُمْ يَكْفُلُ مَرْيَمَ وَمَا كُنْتَ لَدَيْهِمْ إِذْ يَخْتَصِمُونَ (44)(हे पैग़म्बर! जो कुछ हमने मरयम के जन्म के बारे में कहा वह) ग़ैब के समाचार अर्थात ईश्वर के विशेष ज्ञान पर आधारित हैं जो हम तुम्हें वहि (विशेष संदेश) द्वारा बता रहे हैं। और तुम उनके पास नहीं थे जब यहूदियों के बड़े-बड़े मुखिया मरयम की अभिभावक्ता प्राप्त करने के लिए अपना-अपना क़लम गिरा रहे थे ताकि स्पष्ट हो जाए कि कौन मरयम का अभिभावक होगा? और तुम उनके पास नहीं थे जब वे इस विशिष्टता को प्राप्त करने के लिए आपस में भिड़ रहे थे। (3:44) मक्के के अनेकेश्वरवादी, क़ुरआने मजीद के ईश्वरीय संदेश और ईश्वरीय वाणी होने का इन्कार करने के लिए कहते थे कि क़ुरआन एक मनगढ़ंत पुस्तक से अधिक से कुछ नहीं है और मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) ने इसे यहूदियों के बड़े-बूढ़ों से सुना है या प्राचीन किताबों में पढ़ा है। इसके उत्तर में ईश्वर कहता है कि क़ुरआन में आने वाली अनके घटनाएं ग़ैब अर्थात ईश्वर के गोपनीय ज्ञान पर आधारित हैं जिन्हें कोई नहीं जानता और पैग़म्बर भी ईश्वरीय वहि द्वारा उनसे अवगत होते हैं। जैसाकि हज़रत मरयम की माता की प्रतिज्ञा के बारे में ईश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं जानता था या हज़रत मरयम की अभिभावक्ता का मामला तुम्हें नहीं मालूम था। यह सक ग़ैब की बाते हैं जो वहि द्वारा पैग़ंम्बर के ज्ञान में आती हैं। हज़रत मरयम की अभिभावकता के बारे में हमने गत कार्यक्रमों में कहा था कि उनकी माता ने ईश्वर से प्रतिज्ञा की थी कि यदि उनके संतान हुई तो वे उसे बैतुल मुक़द्दस का सेवक बनाएंगी। जब वे हज़रत मरयम को लेकर बैतुल मुक़द्दस गईं तो उस पवित्र स्थान के सेवकों के बीच इस उत्तरदायित्व को लेकर प्रतिस्पर्धा होने लगी क्योंकि हज़रत मरयम के माता और पिता बनी इस्राईल के अत्यंत आदरणीय परिवारों में से थे और हर कोई चाहता था कि यह सौभाग्य उसे प्राप्त हो। ईश्वर ने तुम्हें आदेश दिया कि अपने-अपने क़लम पानी में गिराएं। जिसका क़लम पानी पर तैरने लगे वही अभिभावक बनेगा।इस आयत से हमने सीखा कि पवित्र क़ुरआन, ईश्वर की वाणी है और उसका संदेश है न कि दूसरी पुस्तकों से उतारी हुई घटनाओं का संग्रह।प्रतिस्पर्धा, पवित्र व आध्यात्मिक उत्तरदायित्वों के लिए होनी चाहिए न कि सांसारिक पदों की प्राप्ति के लिए।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ४५ इस प्रकार है।إِذْ قَالَتِ الْمَلَائِكَةُ يَا مَرْيَمُ إِنَّ اللَّهَ يُبَشِّرُكِ بِكَلِمَةٍ مِنْهُ اسْمُهُ الْمَسِيحُ عِيسَى ابْنُ مَرْيَمَ وَجِيهًا فِي الدُّنْيَا وَالْآَخِرَةِ وَمِنَ الْمُقَرَّبِينَ (45)(हे पैग़म्बर! याद करो उस समय को) जब फ़रिश्तों ने कहा, हे मरयम! निःसन्देह, ईश्वर तुम्हें अपनी महान निशानियों की शुभ सूचना देता है जिसका नाम मसीह, ईसा इब्ने मरयम होगा, जो लोक-परलोक में सम्मानीय और ईश्वर के निकट लोगों में से होगा। (3:45) मरयम वह कन्या हैं जो अपनी माता की प्रतिज्ञा द्वारा मस्जिद की सेविका बनीं और ईश्वर की उपासना व आराधना में उन्होंने अपनी आयु बिता दी। उनमें यह योग्यता पैदा हो गई थी कि ईश्वर उन्हें ऐसा पुत्र देता जो लोगों की दृष्टि में भी सम्मानीय होता और ईश्वर के पास भी उसके निकटतम बंदों में होता। ईसाइयों के विश्वास के विपरीत हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम न तो ईश्वर हैं और न ही ईश्वर के पुत्र। वे हज़रत मरयम के पुत्र और ईश्वर की सृष्टि एवं रचना हैं। अलबत्ता वे ऐसी सृष्टि हैं जो ईश्वर की शक्ति, महानता और रचना की निशानी है। इसी कारण ईश्वर ने उन्हें “कलमा” शब्द द्वारा परिचित करवाया है जिसका अर्थ होता है निशानी। जैसा कि सूरए कह्फ़ की १०९वीं आयत में ईश्वर की सभी रचनाओं को कलेमात अर्थात निशानियां कहा गया है। इस आयत से हमने यह सीखा कि फ़रिश्ते, पैग़म्बरों के अतिरिक्त ईश्वर के भले बंदों से भी बात-चीत कर सकते हैं। वह चाहे पुरुष हो या महिला। यद्यपि हज़रत ईसा मसीह का जन्म बिना पिता के हुआ है परन्तु वे ईश्वर के पुत्र नहीं हैं बल्कि हज़रत मरयम के पुत्र हैं। इसका कारण यह है कि वे ९ महीनों तक अपनी माता के गर्भ में रहे।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ४६ इस प्रकार है।وَيُكَلِّمُ النَّاسَ فِي الْمَهْدِ وَكَهْلًا وَمِنَ الصَّالِحِينَ (46)(हे मरयम! हमने तुम्हें जिस पुत्र की शुभ सूचना दी है) वह पालने में, बड़े लोगों के समान अन्य लोगों से बातें करेगा और वह भले लोगों में से होगा। (3:46) हज़रत मरयम ने जब पुत्र की शुभसूचना सुनी तो वे चिन्तित हो गईं। वे यह सोच कर चिंतित हो रही थीं कि लोग उन पर लांछन लगाएंगे क्योंकि उनका विवाह नहीं हुआ था अतः फ़रिश्तों ने उनसे कहा कि ईश्वर तुम्हारी पवित्रता की रक्षा करने और उसे लोगों के समक्ष सिद्ध करने के लिए ऐसा करेगा कि शिशु बड़े लोगों की भांति बोलने लगे और वह तुम पर लगाए गए हर प्रकार के लांछन को नकार देगा। वह प्रौढ़ों की भांति इस प्रकार स्पष्ट व खुले शब्दों में बात करेगा कि सभी लोग आश्चर्यचकित रह जाएंगे और उसके जीवन की सृष्टि में ईश्वरीय चमत्कार को देखेंगे। इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की शक्ति में संदेह नहीं करना चाहिए। जो बिना पिता के मरयम को पुत्र दे सकता है वह पालने में शिशु को बोलने योग्य भी कर सकता है। यदि मां पवित्र और भली हो तो, भलाई और सौभाग्य के लक्षण संतान में भी दिखाई देने लगते हैं।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ४७ इस प्रकार है।قَالَتْ رَبِّ أَنَّى يَكُونُ لِي وَلَدٌ وَلَمْ يَمْسَسْنِي بَشَرٌ قَالَ كَذَلِكِ اللَّهُ يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ إِذَا قَضَى أَمْرًا فَإِنَّمَا يَقُولُ لَهُ كُنْ فَيَكُونُ (47)मरयम ने कहा, प्रभुवर! किस प्रकार मेरे बच्चा हो सकता है जबकि किसी पुरुष ने मुझे छुआ तक नहीं है? उत्तर में ईश्वर ने कहा, वह जिसकी चाहता है इसी प्रकार से सृष्टि कर देता है। जब भी वह किसी बात का इरादा करता है तो उससे कहता है कि हो जा तो वह हो जाती है। (3:47) ईश्वर की ओर से अपने लिए मां बनने के समाचार के पश्चात हज़रत मरयम के मस्तिष्क में यह प्रश्न आया कि किस प्रकार से संभव है कि मैं बिना पति के मां बन जाऊं क्योंकि इस संसार में उपस्थित हर अस्तित्व को सृष्टि के लिए कुछ कारणों की आवश्यकता होती है। इस स्वाभाविक प्रश्न के उत्तर में ईश्वर ने फ़रिश्तों द्वारा हज़रत मरयम को सूचना दी कि प्रकृति तथा सृष्टि की रचना भी तो उसी ने की है और सृष्टि पर भी उसी का आदेश चलता है। उसकी विवेकपूर्ण शक्ति ऐसी है कि जब वह चाहे तो बिना प्राकृतिक कारणों के भी वस्तुओं और जीवों की सृष्टि कर सकता है। आयत के अंत में ईश्वर द्वारा वस्तुओं की सृष्टि के बारे में एक मूल सिद्धांत की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि जैसे ही ईश्वर किसी वस्तु की सृष्टि का इरादा करता है, वह वस्तु अस्तित्व में आ जाती है तथा उसे समय बीतने या प्राकृतिक मार्गों से गुज़रने की आवश्यकता नहीं पड़ती, ठीक उस व्यक्ति की भांति जो किसी वस्तु को बनाना चाहे और उसके “हो जा” कहने से वह वस्तु अस्तित्व में आ जाए। इस आयत से हमने सीखा कि सृष्टि के संबंध में ईश्वर का हाथ खुला हुआ है। प्राकृतिक या अप्राकृतिक मार्गों से सृष्टि करना उसके लिए एक समान है।