islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए आले इमरान; आयतें ४८-५३ (कार्यक्रम 89)

    सूरए आले इमरान; आयतें ४८-५३ (कार्यक्रम 89)

    Rate this post

    आइए पहले सूरए आले इमरान की आयत संख्या ४८ तथा ४९ की तिलावत सुनें।وَيُعَلِّمُهُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَالتَّوْرَاةَ وَالْإِنْجِيلَ (48) وَرَسُولًا إِلَى بَنِي إِسْرَائِيلَ أَنِّي قَدْ جِئْتُكُمْ بِآَيَةٍ مِنْ رَبِّكُمْ أَنِّي أَخْلُقُ لَكُمْ مِنَ الطِّينِ كَهَيْئَةِ الطَّيْرِ فَأَنْفُخُ فِيهِ فَيَكُونُ طَيْرًا بِإِذْنِ اللَّهِ وَأُبْرِئُ الْأَكْمَهَ وَالْأَبْرَصَ وَأُحْيِي الْمَوْتَى بِإِذْنِ اللَّهِ وَأُنَبِّئُكُمْ بِمَا تَأْكُلُونَ وَمَا تَدَّخِرُونَ فِي بُيُوتِكُمْ إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَةً لَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ (49)(और फ़रिश्तों ने मरयम से अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा) और ईश्वर उसे किताब और तत्वदर्शिता तथा तौरेत व इंजील का ज्ञान देगा। (3:48) और बनी इस्राईल की ओर पैग़म्बर बनाकर भेजेगा। (फिर ईसा मसीह ने बनी इस्राईल को आमंत्रित किया और कहा कि निश्चित रूप से) मैं तुम्हारे पास तुम्हारे पालनहार की ओर से निशानी लेकर आया हूं। मैं तुम्हारे लिए मिट्टी से चिड़ियों की आकृति जैसी वस्तु बनाता हूं और फिर उसमें फूंक मारता हूं तो ईश्वर की आज्ञा से वह सचमुच की चिड़िया बन जाती है और मैं ईश्वर की आज्ञा से अंधे तथा कोढ़ी लोगों को अच्छा कर देता हूं तथा मुर्दे को जीवित करता हूं और तुम्हें बता सकता हूं जो कुछ तुम खाते हो और जो कुछ घरों में एकत्रित करते हो। निःसन्देह इसमें तुम्हारे लिए बड़ी निशानी है यदि तुम ईमान वाले हो। (3:49) पिछले कार्यक्रमों में हमने कहा था कि हज़रत ईसा मसीह ने जन्म के पश्चात पालने में ही लोगों से बात की और अपनी मां की पवित्रता की गवाही दी। इन आयतों में हज़रत ईसा मसीह की कुछ अन्य विशेषताओं का उल्लेख किया गया है। जो पैग़म्बर समाज में मार्गदर्शन का दायित्व संभालना चाहता है उसमें कई विशेषताएं होनी चाहिए कि जिनमें से एक ज्ञान व शिक्षा है अतः पैग़म्बरों की शिक्षा और उनका प्रशिक्षण, ईश्वर द्वारा होता है ताकि उनकी शिक्षा-दीक्षा हर प्रकार की त्रुटि से दूर रहे और दूसरे यह कि उन विदित ज्ञानों के अतिरिक्त जो सभी लोगों के पास होते हैं उन्हें ईश्वर के गोपनीय ज्ञान तथा अतीत व भविष्य की बातों की भी जानकारी रहे। परन्तु केवल जानकारी ही काफ़ी नहीं है बल्कि हर पैग़म्बर को कुछ चमत्कारों द्वारा अपनी पैग़म्बरी अर्थात ईश्वरीय प्रतिनिधित्व को सिद्ध करना होता है ताकि लोग पूर्ण रूप से निश्चिंत होकर उसकी बातें सुनें और उसके आदेशों का पालन करें। यद्यपि हज़रत ईसा मसीह का अस्तित्व स्वयं चमत्कार था क्योंकि हज़रत मरयम ने ईश्वरीय संकल्प के आधार पर, बिना पति के उन्हें जन्म दिया था और उन्होंने जन्म के तत्काल बाद ही पालने में लोगों से बात की परन्तु ईश्वर की ओर से बनी इस्राईल के लिए भेजे गए एक पैग़म्बर के रूप में हज़रत ईसा ने उन्हें कुछ चमत्कार भी दिखाए ताकि वे उन पर ईमान ले आएं। वे मिट्टी से जीवित पक्षी बना लेते, कोढ़ियों को पलक झपकते में ठीक कर देते, मरे हुए को जीवित कर देते और लोगों को, जो कुछ उनके घरों में हुआ, उसकी सूचना देते थे। यह सब कार्य ईश्वर की अनुमति और उसकी इच्छा से होते थे क्योंकि जीवों की सृष्टि या अनदेखी बातों का ज्ञान ईश्वर से ही विशेष है। ईश्वर जिसके बारे में चाहे, वही यह काम कर सकता है। परन्तु जो लोग हज़रत ईसा मसीह पर ईमान लाए उन्होंने हज़रत ईसा के जन्म की विशेष स्थिति और उनके द्वारा दिखाए गए इन चमत्कारों के कारण उन्हें, ईश्वर के पुत्र का शीर्षक दे दिया जबकि वे मरयम के पुत्र थे न कि ईश्वर के। हज़रत ईसा के बारे में जो कुछ हुआ या जो कुछ उनके हाथों से हुआ वह सब ईश्वर की शक्ति और उसकी इच्छा से हुआ था न कि हज़रत ईसा मसीह की शक्ति से। इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय प्रतिनिधि, ईश्वर की शक्ति और इच्छा से सृष्टि और प्राकृति में परिवर्तन ला सकता है। यदि ईश्वर के प्रिय और भले बंदे संसार में मरे हुए लोगों को जीवित कर सकते हैं तो फिर प्रलय के दिन ईश्वर द्वारा मरे हुए लोगों को जीवित करना असंभव कार्य नहीं है। ईश्वरीय प्रतिनिधियों के बारे में अतिशयोक्ति नहीं करनी चाहिए और उन्हें मानवता से ऊपर नहीं मानना चाहिए क्योंकि यह एकेश्वरवाद के सिद्धांत से पथभ्रष्टता के समान होगा।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ५० और ५१ इस प्रकार है।وَمُصَدِّقًا لِمَا بَيْنَ يَدَيَّ مِنَ التَّوْرَاةِ وَلِأُحِلَّ لَكُمْ بَعْضَ الَّذِي حُرِّمَ عَلَيْكُمْ وَجِئْتُكُمْ بِآَيَةٍ مِنْ رَبِّكُمْ فَاتَّقُوا اللَّهَ وَأَطِيعُونِ (50) إِنَّ اللَّهَ رَبِّي وَرَبُّكُمْ فَاعْبُدُوهُ هَذَا صِرَاطٌ مُسْتَقِيمٌ (51)(ईसा मसीह ने कहा) और मैं इस तौरेत की पुष्टि करने वाला हूं जो मेरे सामने है। कुछ चीज़े जो तुम्हारे लिए वर्जित थीं उनको मैं तुम्हारे लिए हलाल अर्थात वैध करूंगा और मैं तुम्हारे पालनहार की ओर से तुम्हारे लिए निशानी लाया हूं तो ईश्वर से डरो और मेरा अनुसरण करो। (3:50) निःसन्देह, ईश्वर मेरा और तुम्हारा पालनहार है अतः उसी की उपासना करो कि यही सीधा मार्ग है। (3:51) बनी इस्राईल का पैग़म्बर होने के नाते हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम, आसमानी किताब के रूप में उनके लिए तौरेत लाए थे अतः इस आयत में हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम लोगों को सूचित करते हैं कि मैं भी मूसा के ही ईश्वर की ओर से आया हूं और उनकी किताब की भी पुष्टि करता हूं। मैं तौरेत के कुछ आदेशों को, जो तुम्हारे पापों के दण्ड स्वरूप दिये गए थे, इस शर्त के साथ तुम्हारे लिए समाप्त कर दूंगा कि तुम ईश्वर से डरो और अशिष्ट कर्म न करो तथा मेरे आदेशों का पालन करो कि जो ईश्वरीय धर्म है। इसके पश्चात हज़रत ईसा मसीह स्वयं को ईश्वर का बंदा बताते हुए कहते हैं कि ईश्वर, मेरा और तुम्हारा पालनहार है। हम सबको उसकी उपासना करनी चाहिए। हमें उसी के मार्ग पर चलना चाहिए जो सीधा व संतुलित मार्ग है। इन आयतों से हमने सीखा कि सभी ईश्वरीय पैग़म्बर एक दूसरे को स्वीकार करते थे और अपने से पहले वाले पैग़म्बर के धर्म और उसकी किताब की पुष्टि करते थे। पैग़म्बर भेजना सदैव ही ईश्वरीय परंपरा रही है। यह परंपरा किसी विशेष स्थान या समय से संबन्धित नहीं है।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ५२ और ५३ इस प्रकार है।فَلَمَّا أَحَسَّ عِيسَى مِنْهُمُ الْكُفْرَ قَالَ مَنْ أَنْصَارِي إِلَى اللَّهِ قَالَ الْحَوَارِيُّونَ نَحْنُ أَنْصَارُ اللَّهِ آَمَنَّا بِاللَّهِ وَاشْهَدْ بِأَنَّا مُسْلِمُونَ (52) رَبَّنَا آَمَنَّا بِمَا أَنْزَلْتَ وَاتَّبَعْنَا الرَّسُولَ فَاكْتُبْنَا مَعَ الشَّاهِدِينَ (53)तो जब ईसा ने बनी इस्राईल की ओर से कुफ़्र का आभास किया तो कहा, ईश्वर के मार्ग में मेरे सहायक कौन हैं? हवारियों ने (जो उनके विशेष शिष्य थे) कहा, हम ईश्वर के (धर्म) के सहायक हैं। हम ईश्वर पर ईमान लाए हैं और हे ईसा! गवाही दे दो कि हम ईश्वर के प्रति समर्पित हैं। (3:52) प्रभुवरः जो कुछ तूने उतारा है हम उस पर ईमान लाए और तेरे पैग़म्बर का अनुसरण किया अतः हमें उन लोगों की पंक्ति में रख जिन्होंने (हज़रत ईसा की पैग़म्बरी की) गवाही दी। (3:53) हज़रत ईसा के बारे में ढेरों ईश्वरीय निशानियां देखने के बाजवूद, बनी इस्राईल के अनेक लोग उन पर ईमान नहीं लाए और उनके पैग़म्बर होने का इन्कार करते रहे। केवल कुछ लोग ही हज़रत ईसा मसीह पर ईमान लाए और वे उनका समर्थन करते रहे। पवित्र क़ुरआन ने इन लोगों को “हवारी” का नाम दिया है जिसका अर्थ होता है ऐसे लोग जो जनता के ग़लत मार्ग को छोड़कर सत्य के मार्ग से जुड़ गए हों। इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान वाले तथा धर्म के प्रति वफ़ादार लोगों को पहचान कर उन्हें व्यवस्थित करना तथा एक केन्द्र पर लाना धार्मिक नेताओं का एक कर्तव्य है। पैग़म्बर लोगों को ईश्वर के लिए चाहते हैं न कि अपने स्वार्थ कि लिए, जैसा कि हज़रत ईसा मसीह ने कहा कि कौन लोग ईश्वरीय धर्म के सहायक हैं? ईमान के पश्चात समर्पण का चरण आता है अर्थात ईश्वर पर ईमान रखने वाले को ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर के आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करना चाहिए।