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    सूरए आले इमरान; आयतें ५४-६० (कार्यक्रम 90)

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    सूरए आले इमरान की आयत संख्या ५४ तथा ५५ इस प्रकार है।وَمَكَرُوا وَمَكَرَ اللَّهُ وَاللَّهُ خَيْرُ الْمَاكِرِينَ (54) إِذْ قَالَ اللَّهُ يَا عِيسَى إِنِّي مُتَوَفِّيكَ وَرَافِعُكَ إِلَيَّ وَمُطَهِّرُكَ مِنَ الَّذِينَ كَفَرُوا وَجَاعِلُ الَّذِينَ اتَّبَعُوكَ فَوْقَ الَّذِينَ كَفَرُوا إِلَى يَوْمِ الْقِيَامَةِ ثُمَّ إِلَيَّ مَرْجِعُكُمْ فَأَحْكُمُ بَيْنَكُمْ فِيمَا كُنْتُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ (55)(ईसा मसीह के शत्रुओं ने उनकी हत्या की) योजना बनाई और ईश्वर ने भी (उन्हें बचाने की) युक्ति की और ईश्वर सबसे अच्छा युक्ति करने वाला है। (3:54) जब ईश्वर ने कहा, हे ईसा! मैं तुम्हें (यहूदियों) के चंगुल से छुड़ाने वाला और अपनी ओर ऊपर लाने वाला हूं और तुम्हें ऐसे लोगों से पवित्र करने वाला हूं जिन्होंने इन्कार किया तथा मैं तुम्हारा अनुसरण करने वालों को, तुम्हारा इन्कार करने वालों पर प्रलय तक के लिए वरीयता देने वाला हूं। तो जान लो कि तुम सबकी वापसी मेरी ही ओर है और मैं उन बातों का फ़ैसला करूंगा जिसमें तुम्हारे बीच मतभेद था। (3:55) पिछले कार्यक्रमों में हमने कहा था कि हज़रत ईसा मसीह की ओर से अनेक ईश्वरीय चमत्कार प्रस्तुत किये जाने के बावजूद कुछ लोगों ने उनका इन्कार किया और उनकी बातों को स्वीकार नहीं किया। इन आयतों में उनकी ओर से हज़रत ईसा की हत्या के षड्यंत्र की सूचना देते हुए कहा गया है कि काफ़िरों के मुखिया, इस पैग़म्बर की आवाज़ को दबाने और उनकी हत्या के लिए योजनाएं बना रहे हैं। उन लोगों ने हज़रत ईसा और उनके साथियों की गिरफ़्तारी पर बड़ा भारी इनाम रखा और इस प्रकार उन्हें मारने की भूमिका समतल की परन्तु ईश्वर ने उनके षड्यंत्रों को विफल बनाते हुए हज़रत ईसा मसीह को बचा लिया। ईसाइयों के विश्वास के अनुसार यहूदियों ने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को सूली पर लटका दिया, यहां तक कि उनकी मृत्यु हो गई। उसके पश्चात उन्हें दफ़न कर दिया गया और फिर ईश्वर ने उन्हें मरे हुए लोगों के बीच से निकालकर आकाशों तक पहुंचा दिया। परन्तु क़ुरआन की आयतों, विशेषकर सूरए निसा की १५७वीं आयत से ऐसा प्रतीत होता है कि यहूदियों ने हज़रत ईसा के स्थान पर उनकी ही जैसी सूरत वाले एक अन्य व्यक्ति को सूली पर लटका कर मार दिया था और ईश्वर ने अपनी शक्ति से हज़रत ईसा को उस वातावरण से निकाल कर आकाशों तक पहुंचा दिया जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को भी अल्पावधि के लिए मेराज पर ले जाया गया था और वे आकाशों की बातों से अवगत हुए थे। आगे चलकर यह आयत ईसाइयों को शुभ सूचना देती है कि ईसा मसीह का अनुसरण करने वालों को सदैव उनके धर्म का इन्कार करने वालों अर्थात यहूदियों पर वरीयता प्राप्त रहेगी और यह पवित्र क़ुरआन कह एक भविष्यवाणी है जो १४०० वर्षों से लेकर अब तक सिद्ध होती आई है। इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर का इरादा और उसकी इच्छा मनुष्य की हर युक्ति और कोशिश से ऊपर है अतः हमें ईश्वरीय इरादे के समक्ष बहाना नहीं बनाना चाहिए। पैग़म्बरों का अनुसरण, विजय और वरियता प्राप्त कोने का कारण है जबकि कुफ़्र, पतन और अंत का कारण बनता है।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ५६, ५७ तथा ५८ इस प्रकार है।فَأَمَّا الَّذِينَ كَفَرُوا فَأُعَذِّبُهُمْ عَذَابًا شَدِيدًا فِي الدُّنْيَا وَالْآَخِرَةِ وَمَا لَهُمْ مِنْ نَاصِرِينَ (56) وَأَمَّا الَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ فَيُوَفِّيهِمْ أُجُورَهُمْ وَاللَّهُ لَا يُحِبُّ الظَّالِمِينَ (57) ذَلِكَ نَتْلُوهُ عَليْكَ مِنَ الْآَيَاتِ وَالذِّكْرِ الْحَكِيمِ (58)तो काफ़िर हो जाने वाले गुट को मैं लोक व परलोक में कड़ा दण्ड दूंगा और कोई उनका सहायक नहीं होगा। (3:56) परन्तु जो लोग ईमान लाए और भले कर्म करते रहे, ईश्वर उन्हें उनका बदला बिना किसी कमी के देगा और वह अत्याचारियों को पसंद नहीं करता। (3:57) हे पैग़म्बर! हम तुम्हारे लिए जिस चीज़ की तिलावत करते हैं वह ईश्वरीय आयतें और तत्वदर्शी नसीहतें हैं। (3:58) हज़रत ईसा मसीह की हत्या का षडयंत्र रचने के कारण ईश्वर ने बनी इस्राईल को एक भारी संकट और अभिशाप में फंसा दिया। इतिहास में वर्णित है कि लगभग ४० वर्षों तक रोम का एक शासन उन पर राज करता रहा और उसने उनके हज़ारों लोगों की हत्या कराई या उन्हें कै़द कर दिया, यहां तक कि उसने कुछ क़ैदियों को भूखे दरिन्दों के सामने फिंकवा दिया अलबत्ता ईश्वर किसी पर भी अत्याचार नहीं करता बल्कि उसका बदला स्वयं हमारे कर्मों के आधार पर होता है। कुफ़्र, शत्रुता, द्वेष और हठधर्मी का परिणाम अत्याचारियों के चुंगल में फंसने और सौभाग्य व कल्याण के मार्ग से दूर हो जाने के अतिरिक्त कुछ अन्य नहीं होता। जैसा कि ईमान और भले कर्मों का संसार व प्रलय में भौतिक व आध्यात्मिक विभूतियों के अतिरिक्त कुछ और बदला नहीं हो सकता। इन आयतों से हमने सीखा कि यद्यपि ईश्वरीय परंपरा, कर्मों का बदला प्रलय तक के लिए रोके रखने की है परन्तु कभी-कभी वह इस संसार में भी दण्ड देता है। ईश्वरीय कोप से संसार की कोई भी शक्ति नहीं बचा सकती अतः हमें अपने कार्यों के परिणामों के बारे में विचार करना चाहिए। सूरए आले इमरान की आयत संख्या ५९ तथा ६० इस प्रकार है।إِنَّ مَثَلَ عِيسَى عِنْدَ اللَّهِ كَمَثَلِ آَدَمَ خَلَقَهُ مِنْ تُرَابٍ ثُمَّ قَالَ لَهُ كُنْ فَيَكُونُ (59) الْحَقُّ مِنْ رَبِّكَ فَلَا تَكُنْ مِنَ الْمُمْتَرِينَ (60)निःसन्देह, ईश्वर के समीप ईसा (की सृष्टि) का उदाहरण, आदम (की सृष्टि) की भांति है। ईश्वर ने उसे मिट्टी से बनाया फिर उससे कहा कि हो जा तो वह हो गया। (3:59) हे पैग़म्बर! सत्य वही है जो तुम्हारे पालनहार की ओर से है अतः संदेह करने वालों में से न हो जाना। (3:60) मदीना नगर के यहूदियों का एक गुट पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की सेवा में पहुंचा। अपनी बात-चीत में उस गुट के लोगों ने पैग़म्बर से, बिना पिता के हज़रत ईसा मसीह के जन्म को, उनके ईश्वर होने का प्रमाण बताया। उस समय ईश्वर की ओर से यह आयत आई जिसमें उत्तर में कहा गया कि यदि बिना पिता के हज़रत ईसा का जन्म उनके ईश्वर होने का प्रमाण है तो हज़रत आदम की सृष्टि तो इससे भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे तो बिना माता-पिता के पैदा हुए थे तो तुम लोग उन्हें ईश्वर या ईश्वर का पुत्र क्यो नहीं कहते? इसके पश्चात ईश्वर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और अन्य मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहता है कि सत्य और ठोस बात, ईश्वर की बात है कि जो सभी वास्तविकताओं का स्रोत है और उन्हें पूर्ण रूप से जानता है। दूसरे लोगों की बातों के विपरीत जो अज्ञान व ग़लती के आधार पर बात करते हैं या साम्प्रदायिक्ता या स्वार्थ के कारण। अतः केवल ईश्वर की बात पर ध्यान दो और दूसरों की बातें ईश्वरीय वाणी में तुम्हारे संदेह का कारण न बनें। इन आयतों से हमने सीखा कि कुछ पैग़म्बरों की सृष्टि में जो चमत्कार हुए है या उनके हाथों से जो चमत्कार हुए हैं वे ईश्वर की शक्ति के चिन्ह हैं न कि मनुष्यों के ईश्वर होने के। सत्य व सत्यता केवल ईश्वरीय क़ानूनों में ही मिलती है अतः यदि हमें सत्य की खोज है तो हमें ईश्वरीय क़ानूनों का अनुसरण करना चाहिए।