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    सूरए आले इमरान; आयतें ६१-६४ (कार्यक्रम 91)

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    सूरए आले इमरान की आयत संख्या ६१ इस प्रकार है।فَمَنْ حَاجَّكَ فِيهِ مِنْ بَعْدِ مَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْا نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَأَبْنَاءَكُمْ وَنِسَاءَنَا وَنِسَاءَكُمْ وَأَنْفُسَنَا وَأَنْفُسَكُمْ ثُمَّ نَبْتَهِلْ فَنَجْعَلْ لَعْنَةَ اللَّهِ عَلَى الْكَاذِبِينَ (61)तो (हे पैग़म्बर) जो कोई भी (ईश्वरीय संदेश वहि द्वारा) तुम्हारे पास आने वाले ज्ञान के पश्चात तुमसे (ईसा मसीह के बारे में) बहस और विवाद करे तो उससे कह दो कि हम अपने पुत्रों को लाएं और तुम अपने पुत्रों को, हम अपनी स्त्रियों को लाएं, तुम अपनी स्त्रियों को लाओ, हम अपने आत्मीय लोगों को और तुम अपने आत्मीय लोगों को लाओ तो फिर हम ईश्वर के समक्ष प्रार्थना करें और एक-दूसरे को अभिशाप करें तथा झूठ बोलने वालों के लिए ईश्वरीय लानत अर्थात अभिशाप निर्धारित करें। (3:61) इतिहास में वर्णित है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने यमन के नजरान क्षेत्र में इस्लाम के प्रचार के लिए एक गुट भेजा था। इसके जवाब में नजरान के ईसाइयों ने पैग़म्बर से वार्ता के लिए एक गुट मदीना नगर भेजा। उस गुट ने हज़रत ईसा मसीह के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम की बातें स्वीकार नहीं कीं। ईश्वर के आदेश पर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम उनसे मुबाहेला करने अर्थात सत्य की पहचना के लिए एक दूसरे पर ईश्वर की ओर से लानत भेजने के लिए तैयार हुए। आपने उन ईसाइयों से कहा कि तुम अपने बच्चों, स्त्रियों और सबसे अधिक आत्मीय लोगों का एक गुट लाओ और हम भी ऐसा ही करेंगे उसके पश्चात एक स्थान पर एकत्रित होकर ईश्वर से प्रार्थना करेंगे कि हम दोनों में से जो भी गुट सत्य पर नहीं है उसे तू अपनी दया व कृपा से दूर कर दे और उसे इसी समय दंडित कर। नजरान के ईसाइयों ने जब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का यह प्रस्ताव सुना तो उनसे इस बारे में निर्णय करने हेतु आपस में परामर्श करने के लिए कुछ समय मांगा। ईसाइयत के बड़े-बड़े महत्वपूर्ण लोगों ने उनसे कहा कि यह प्रस्ताव स्वीकार कर लो किंतु यदि तुम यह देखो कि पैग़म्बरे इस्लाम भारी भीड़ लाने के स्थान पर अपने प्रियजनों का एक छोटा सा गुट ला रहे हैं तो फिर उनसे मुबाहेला न करना बल्कि किसी भी प्रकार से उनसे संधि कर लेना। मुबाहेला के निए निश्चित किया गया दिन आ गया। ईसाइयों ने देखा कि पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम अपने साथ केवल चार लोगों को ही लाए हैं। उनकी पुत्री फ़ातेमा, उनके दामाद अली इब्ने अबी तालिब और उन दोनों के दो पुत्र हसन और हुसैन। ईसाई गुट के नेता ने कहा कि मैं ऐसे चेहरों को देख रहा हूं जो यदि प्रार्थना करें तो पहाड़ अपने स्थान से हट जाएं और यदि हमें शाप दें तो हमसे से एक व्यक्ति भी बाक़ी नहीं बचेगा। अतः ईसाइयों ने मुबाहेला करने से इन्कार कर दिया। इस आयत से हमने सीखा कि प्रश्न का ठोस तथा तर्कपूर्ण उत्तर देना चाहिए परन्तु सत्य के मुक़ाबले में हठधर्मी, शत्रुता और द्वेष का उत्तर ईश्वरीय कोप के अतिरिक्त कुछ नहीं होता है। हम यदि ईश्वरीय धर्म में आस्था रखते हैं तो हमें डट कर खड़े रहना चाहिए और जानना चाहिए कि असत्य पर होने के कारण शत्रु अवश्य पीछे हटेगा। पैग़म्बर के परिजनों की प्रार्थना भी, पैग़म्बर की भी भांति अवश्य ही स्वीकार होती है। पैग़म्बर ने अपने व्यवहार द्वारा हज़रत हसन और हजरत हुसैन को अपने पुत्र और हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपनी आत्मा बताया। अपनी सामान्य योग्यताओं को प्रयोग करने के पश्चात ईश्वर से सहायता मांगनी चाहिए। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने पहले प्रचार और वार्ता की और उसके बाद मुबाहेला तथा प्रार्थना के लिए हाथ उठाए।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ६२ तथा ६३ इस प्रकार है।إِنَّ هَذَا لَهُوَ الْقَصَصُ الْحَقُّ وَمَا مِنْ إِلَهٍ إِلَّا اللَّهُ وَإِنَّ اللَّهَ لَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ (62) فَإِنْ تَوَلَّوْا فَإِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ بِالْمُفْسِدِينَ (63)निःसन्देह (ईसा मसीह के जीवन) की सच्ची कहानी यही है और ईश्वर के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है और निःसन्देह, ईश्वर प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है। (3:62) फिर यदि वे लोग सत्य की ओर से मुंह मोड़ लें तो जान लो कि ईश्वर बुरे कर्म करने वालों को भलि भांति जानने वाला है। (3:63) मुबाहेला की घटना के पश्चात ईश्वर अपने पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से कहता है कि ईसा मसीह के बारे में हमने जो कुछ तुम्हें बताया है वही उनके जीवन की सच्ची कहानी है जिसे ईश्वर के अतिरिक्त कोई भी पूर्ण रूप से नहीं जानता। और जो लोग ईसा मसीह के बारे में यह सोचते हैं कि वे ईश्वर के पुत्र हैं तो यह झूठ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है क्योंकि ईश्वर के अतरिक्त कोई भी पूज्य नहीं है तो जो लोग सत्य स्वीकार नहीं करते वे जान लें कि ईश्वर उनके कर्मों को और उनको दिये जाने वाले दण्ड से भलि भांति अवगत है। लोगों के बीच जो कहानियां प्रचलित हैं वे मूल रूप से दो ही प्रकार की होती हैं। प्रथम एसी कहानियां जो पूर्ण रूप से काल्पनिक होती हैं तथा उनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं होता है। ऐसी कहानियां केवल एक कहानीकार की काल्पनिक शक्ति का ही परिणाम होती हैं। दूसरी वे कहानियां हैं जो इतिहास के आधार पर लिखी गई हैं किंतु उन्हें रोचक बनाने के लिए कुछ झूठी बातें भी उनमें मिला दी गई हैं। पवित्र क़ुरआन के क़िस्से वास्तविकता के आधार पर हैं न कि कल्पना के आधार पर और दूसरे यह सारे क़िस्से सत्य हैं और इन्हें वास्तविकता स्पष्ट करने के लिए बयान किया गया है अतः इनमें कमी-बेशी नहीं है। इन आयतों से हमे यह पता चलता है कि यदि क़ुरआन न होता तो हम हज़रत ईसा मसीह और अनेक पैग़म्बरों तथा राष्ट्रों के वास्तविक स्वरूप से अवगत नहीं हो पाते। सत्य को स्वीकार न करना और उससे द्वेष रखना, बुराई का एक उदाहरण है जो मनुष्य तथा समाज को पतन की ओर ले जाता है। इस बात पर यदि हम ध्यान दें ध्यान दें कि ईश्वर हमारे सभी कर्मों को देख रहा है तो हम अपने कार्यों के प्रति सचेत हो जाएंगे। सूरए आले इमरान की आयत संख्या ६४ इस प्रकार है।قُلْ يَا أَهْلَ الْكِتَابِ تَعَالَوْا إِلَى كَلِمَةٍ سَوَاءٍ بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمْ أَلَّا نَعْبُدَ إِلَّا اللَّهَ وَلَا نُشْرِكَ بِهِ شَيْئًا وَلَا يَتَّخِذَ بَعْضُنَا بَعْضًا أَرْبَابًا مِنْ دُونِ اللَّهِ فَإِنْ تَوَلَّوْا فَقُولُوا اشْهَدُوا بِأَنَّا مُسْلِمُونَ (64)(हे पैग़म्बर!) कह दो कि हे (आसमानी) किताब वालो! उस बात की ओर आओ जो हमारे और तुम्हारे बीच समान रूप से मान्य है। यह कि हम ईश्वर के अतिरिक्त किसी और की उपासना न करें और किसी को उसका समकक्ष न ठहराएं और हम में से कुछ, कुछ दूसरों को ईश्वर के स्थान पर पालनहार न मानें। तो यदि उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार न किया तो (हे मुसलमानो!) कह दो कि गवाह रहो कि हम मुस्लिम और ईश्वर के प्रति समर्पित हैं। (3:64) पिछली आयतों में क़ुरआन ने पहले तो ईसाइयों को तर्क के आधार पर इस्लाम स्वीकार करने का निमंत्रण दिया था परन्तु जब उन्होंने स्वीकार नहीं किया तो उन्हें मुबाहेला करने को कहा गया लेकिन वे लोग मुबाहेला करने के लिए भी तैयार नहीं हुए। इस आयत में ईश्वर अपने पैग़म्बर से कहता है कि उनसे कहो कि यदि तुम इस्लाम स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो तो आओ कम से कम अपनी संयुक्त आस्थाओं और विश्वासों पर हम एकता कर लें और कुफ़ तथा अनेकेश्वरवाद का मुक़ाबला मिलकर करें। यद्यपि तुम तस्लीस अर्थात तीन ईश्वरों पर विश्वास रखते हो परन्तु उनमें तुम एकेश्वरवाद से कोई अंतर नहीं देखते अतः तुम तस्लीस में एकता को मानते हो अतः आओ और एक संयुक्त विश्वास के रूप में एकेश्वरवाद को आधार मान कर हम एकत्रित हो जाएं और उसे ग़लत व्याख्यानों से दूर रखें जिनका परिणाम अनेकेश्वरवाद है। ईसाइयों के कुछ विद्वान ईश्वर द्वारा हराम या हलाल बातों का आदेश अपनी ओर से परिवर्तित कर देते थे, जबकि इसका अधिकार तो केवल ईश्वर को ही है। अतः क़ुरआन कहता है कि आओ ऐसे लोगों का अनुसरण न करो जो क़ानून बनाने में स्वयं को ईश्वर का शरीक या समकक्ष समझते हैं। अंत में यह आयत मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहती है कि यदि तुमने ईश्वरीय धर्म वालों को एकता का आहृवान किया और उन्होंने उसे स्वीकार न किया तो तुम लोग ढ़ीले मत पड़ जाओ और दृढ़तापूर्वक घोषणा करो कि हम केवल ईश्वर के प्रति समर्पित हैं और तुम्हारा इन्कार ईश्वर की उपासना में हम पर कोई प्रभाव नहीं डालेगा। इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआन हमें संयुक्त विश्वासों के आधार पर ईश्वरीय किताब रखने वालों से एकता का निमंत्रण देता है अतः मुसलमानों के बीच किसी भी प्रकार का मतभेद उत्पन्न करना इस्लाम तथा क़ुरआन के विरुद्ध है। सभी मनुष्य बराबर हैं और किसी को भी दूसरे पर शासन करने का अधिकार प्राप्त नहीं है सिवाए ईश्वर के आदेश के। आसमानी किताब वालों को इस्लाम का निमंत्रण देने में मुसलमानों को पहल करनी चाहिए और इस मार्ग में यदि वे अपने सही लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते तो कुछ थोड़े ही लक्ष्य प्राप्त करने के प्रयास में उन्हें कमी नहीं करनी चाहिए।