islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए आले इमरान; आयतें ६५-७१ (कार्यक्रम 92)

    सूरए आले इमरान; आयतें ६५-७१ (कार्यक्रम 92)

    Rate this post

    सूरए आले इमरान की आयत संख्या ६५ तथा ६६ इस प्रकार है।يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تُحَاجُّونَ فِي إِبْرَاهِيمَ وَمَا أُنْزِلَتِ التَّوْرَاةُ وَالْإِنْجِيلُ إِلَّا مِنْ بَعْدِهِ أَفَلَا تَعْقِلُونَ (65) هَا أَنْتُمْ هَؤُلَاءِ حَاجَجْتُمْ فِيمَا لَكُمْ بِهِ عِلْمٌ فَلِمَ تُحَاجُّونَ فِيمَا لَيْسَ لَكُمْ بِهِ عِلْمٌ وَاللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ (66)हे (आसमानी) किताब के मानने वालो! तुम लोग इब्राहीम के बारे में क्यों विवाद करते हो? (और उन्हें अपनी-अपनी किताब का अनुसरणकर्ता कहते हो) जबकि तुम जानते हो कि तौरेत और इंजील उनके बाद उतारी गई हैं, क्या तुम चिन्तन नहीं करते? (3:65) तुम वही लोग तो हो कि (हज़रत ईसा और) जो कुछ (उनके जन्म व जीवन से संबंधित था उसके बारे में) ज्ञान होने के बावजूद तुमने आपस में विवाद किया। तो अब (इब्राहीम और) उस चीज़ के बारे में क्यों लड़ते हो जिसके बारे में तुम्हें ज्ञान नहीं है जबकि ईश्वर जानता है और तुम नहीं जानते। (3:66) पूरे इतिहास में सदैव ही ईश्वरीय धर्मों के मानने वालों के बीच अपनी सत्यता को लेकर विवाद और झगड़ा रहा है। यद्यपि सारे पैग़म्बर एक ही ईश्वर की ओर से आए हैं और उनकी किताबें एक दूसरे से समन्वित हैं परन्तु जातीय या धार्मिक साम्प्रदायिकता इस बात का कारण बनी है कि कुछ ईमान वाले, तर्क द्वारा लोगों को ईश्वरीय धर्म की ओर आमंत्रित करने के स्थान पर निराधार और बेकार बातों पर लड़ें-झगड़ें। हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम के आने के पश्चात, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के अनुयाइयों का कर्तव्य था कि वे उनका अनुसरण करें परन्तु उन्होंने घमण्ड और सामंप्रादायिक्ता के आधार पर इस बात को स्वीकार नहीं किया। यहां तक कि उन्होंने हज़रत इब्राहीम को भी जो हज़रत मूसा से पूर्व थे, अपने धर्म का अनुयायी बताया जबकि इतिहास की दृष्टि से यह बात कदापि स्वीकार्य नहीं है अतः ईश्वर इसाइयों और यहूदियों को संबोधित करते हुए कहता है कि तुम्हारे इस धार्मिक विवाद का स्रोत जातीय द्वेष व हठधर्मी है क्योंकि तुमने ईसा मसीह के जीवन व जन्म के बारे में ज्ञान रखने के बाद भी एक दूसरे से बहस की और अब तुम हज़रत इब्राहीम के बारे में बहस कर रहे हो जिनके धर्म के बारे में तुम्हें कुछ भी पता नहीं है। जब तुम ज्ञान व स्पष्ट बातों से सहमत नहीं हो सकते तो ऐसे मामले में क्यों पड़ते हो जिसके बारे में तुम्हें कुछ भी पता नहीं है। इन आयतों से हमने सीखा कि धर्म की सत्यता, तर्क व बौद्धिक प्रमाणों द्वारा सिद्ध करनी चाहिए न कि उसके व्यक्ति विशेष से संबन्धित होने या अन्य धर्मों से प्राचीन होने के आधार पर। वह बहस और वार्ता लाभदाय है जो सत्य तक पहुंचने के उद्देश्य से हो अन्यथा वह मतभेद का कारण बनती है। सूरए आले इमरान की आयत संख्या ६७ और ६८ आयत इस प्रकार है।مَا كَانَ إِبْرَاهِيمُ يَهُودِيًّا وَلَا نَصْرَانِيًّا وَلَكِنْ كَانَ حَنِيفًا مُسْلِمًا وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِكِينَ (67) إِنَّ أَوْلَى النَّاسِ بِإِبْرَاهِيمَ لَلَّذِينَ اتَّبَعُوهُ وَهَذَا النَّبِيُّ وَالَّذِينَ آَمَنُوا وَاللَّهُ وَلِيُّ الْمُؤْمِنِينَ (68)इब्राहीम न तो यहूदी थे और न ही ईसाई बल्कि वे तो सत्यप्रेमी और ईश्वर के प्रति समर्पित रहने वाले थे तथा कदापि अनेकेश्वरवादी न थे। (3:67) निःसन्देह हज़रत इब्राहीम के सबसे अधिक निकट वे लोग हैं जिन्होंने उनका अनुसरण किया और यह पैग़म्बर तथा ईमान वाले लोग। और ईश्वर ईमान लाने वालों का संरक्षक तथा मित्र है। (3:68) इस आयत में हज़रत इब्राहीम को सत्यप्रेमी तथा वास्तविकता का खोजी बताया गया है जो हर प्रकार के अनेकेश्वरवाद से दूर तथा ईश्वर के प्रति समर्पित है। इस प्रकार से यह आयत इस बात की ओर संकेत करती है कि ईसा तथा मूसा के अनुयाइयों तुम लोग भी धार्मिक सांप्रदायिक्ता के स्थान पर सत्य और वास्तिवक्ता की खोज में रहो और केवल स्य के प्रति समर्पति न रहो। तुम्हारे बीच मतभेद का स्रोत अंहकार है न कि ईश्वर की उपासना, यह सबसे बड़ा अनेकेश्वरवाद है। तुम स्वयं को यदि हज़रत इब्राहीम के समीप करना चाहते हो ताकि उनकी लोकप्रियता से अपने धर्म का प्रचार कर सको तो जान लो कि धर्म का पालन केवल ज़बान और दावे से नहीं होता। हज़रत इब्राहीम से सबसे निकट व्यक्ति वह है जो उनकी प्रिय पद्धति का अनुसरण करे और उसे व्यावहारिक बनाए। जैसे कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम व उनके साथी थे। उन्होंने हज़रत इब्राहीम को अपने धर्म का अनुसरणकर्ता समझने के बजाए स्वयं को उनका अनुयाई बताया। वैचारिक तथा धार्मिक रिश्ते, जातीय और सांसारिक रिश्तों पर वरीयता रखते हैं। एकसमान विचार रखने वाले लोगों का चाहे आपस में कोई रिश्ता न हो परन्तु फिर भी वे आपस में उन लोगों के मुक़ाबले अधिक समीप हैं जो रिश्तेदार तो होते हैं परन्तु समान विचार व विश्वास नहीं रखते। नेता व अनुयायी का एक ही जाति से होना आवश्यक नहीं है। ईमान का आधार, विचारधारा है न कि भाषा व जाति। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने सलमान फ़ारसी के बारे में, जो अरब मूल के नहीं थे, कहा है कि सलमान हम में से हैं।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ६९, ७० तथा ७१ इस प्रकार है।وَدَّتْ طَائِفَةٌ مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ لَوْ يُضِلُّونَكُمْ وَمَا يُضِلُّونَ إِلَّا أَنْفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ (69) يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَكْفُرُونَ بِآَيَاتِ اللَّهِ وَأَنْتُمْ تَشْهَدُونَ (70) يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَلْبِسُونَ الْحَقَّ بِالْبَاطِلِ وَتَكْتُمُونَ الْحَقَّ وَأَنْتُمْ تَعْلَمُونَ (71)आसमानी किताब वालों का एक गुट इच्छा करता है कि काश तुम लोगों को पथभ्रष्ट कर सकता। जबकि वे अपने आप के अतिरिक्त किसी और को भटका नहीं रहे हैं परन्तु वे (यह बात) नहीं समझते हैं। (3:69) (हे पैग़म्बर! उन लोगों से कह दो) हे किताब वालों, क्यों ईश्वर की आयतों (तथा पैग़म्बरे इस्लाम के ईश्वरीय दूत होने की निशानियों) का इन्कार करते हो जबकि तुम स्वयं (उसके सही होने की) गवाही देते हो। (3:70) हे किताब वालो! क्यों जान-बूझ कर सत्य को असत्य से गड-मड करते हो और जानने के बावजूद सत्य को छिपाते हो? (3:71) यह आयतें धर्म और सत्य के शत्रुओं के मन और सोच पर से पर्दा उठाते हुए कहती हैं कि जो लोग स्वयं को ईश्वर का उपासक व ईश्वरीय किताब रखने वाला कहते हैं उनका एक गुट यह इच्छा रखता है कि तुम मुसलमानों को भी अपनी ही भांति पथभ्रष्ट कर दें। वे लोग यह जानने के बाद भी कि उन्हें पैग़म्बरे इस्लाम के आने के पश्चात, कि जिनकी निशानियों को स्वयं उन्होंने तौरेत तथा इंजील में पढ़ा है, उनपर ईमान लाकर इस्लाम को स्वीकार करना चाहिए परन्तु जातीय व धार्मिक द्वेष इस बात का कारण बनता है कि वे केवल न यह कि असत्य पर बाक़ी रहते हैं बल्कि उन वास्तविकताओं को भी छिपाते हैं जनका उन्हें ज्ञान है या उन्हें इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कि लोग उनके असत्य की ओर न जाएं। अतः यह आयत मुसलमानों के लिए एक चेतावनी है कि अन्य धर्म के लोगों के साथ संपर्क में वे उनके साथ न मिल जाएं तथा मुसलमानों को पथभ्रष्ट करने के उनके कार्यक्रमों व उद्देश्यों से अवगत रहें। इन आयतों से हमने सीखा कि शत्रु की पहचान व उसके षड्यंत्रों का ज्ञान संभावित ख़तरों से बचे रहने का कारण बनता है। हमें सदैव सतर्क रहना चाहिए तथा अपने युवाओं को पथभ्रष्ट लोगों से मिलने से रोकना चाहिए। जो लोग दूसरों को पथभ्रष्ट करने का प्रयास करते हैं वे सबसे पहले अपनी पथभ्रष्टता में सहायता करते हैं क्योंकि द्वेष, कपट और छल का परिणाम, पथभ्रष्टता के अतिरिक्त कुछ नहीं निकलता। ईमान वाले व्यक्ति को सदैव असत्य से सत्य को अलग पहचानने का प्रयास करना चाहिए ताकि शत्रु, मामले को उसके लिए संदिग्ध बनाकर अपनी इच्छाएं पूरी न कर सके।