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    सूरए आले इमरान; आयतें ७७-८२ (कार्यक्रम 94)

    सूरए आले इमरान; आयतें ७७-८२ (कार्यक्रम 94)
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    सूरए आले इमरान की आयत संख्या ७७ इस प्रकार है।إِنَّ الَّذِينَ يَشْتَرُونَ بِعَهْدِ اللَّهِ وَأَيْمَانِهِمْ ثَمَنًا قَلِيلًا أُولَئِكَ لَا خَلَاقَ لَهُمْ فِي الْآَخِرَةِ وَلَا يُكَلِّمُهُمُ اللَّهُ وَلَا يَنْظُرُ إِلَيْهِمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَلَا يُزَكِّيهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (77)निःसन्देह, जो लोग ईश्वरीय प्रतिज्ञा और अपनी सौगंधों को सस्ते दामों में बेच देते हैं उनको प्रलय के दिन कोई लाभ नहीं होगा और उस दिन ईश्वर न उनसे बात करेगा और न उनपर (दया व कृपा) की दृष्टि डालेगा और उन्हें (पापों के मैल) से पवित्र नहीं करेगा और उनके लिए कड़ा दण्ड है। (3:77) ईश्वर ने मनुष्य के कल्याण के लिए उसका दो प्रकार से मार्गदर्शन किया है। एक स्वाभाविक प्रवृत्ति द्वारा जो स्वयं उसके भीतर से प्रवाहित होती है और उसे भले तथा बुरे में अंतर सिखाती है। दूसरे वहि अर्थात ईश्वरीय संबोधन द्वारा जिसका स्रोत ईश्वर का अनंत ज्ञान है और जो धर्म तथा धार्मिक आदेशों के रूप में क़दम-क़दम पर परिपूर्णता की ओर मनुष्य का मार्गदर्शन करती है। धर्म व प्रवृत्ति के ये आदेश ईश्वरीय वचन हैं जिनपर बुद्धि ने हस्ताक्षर किये हैं और उसने मनुष्य को इस वचन के पालन पर प्रतिबद्ध किया है परन्तु मनुष्य के एक गुट ने अपना वचन तोड़ दिया और संसार की प्राप्ति के लिए अपनी इच्छाओं को ईश्वरीय इच्छा पर प्राथमिक्ता दी। स्वभाविक है कि इस अनुचित व्यवहार के परिणाम भी सामने आएंगे जिनमें सबसे महत्वपूर्ण उस दिन ईश्वर की विशेष कृपा से वंचित होना है जिस दिन सब उसकी कृपा के मोहताज होंगे। इस आयत से हमने सीखा कि प्रतिज्ञा व वचन का तोड़ना धर्म से बाहर निकाल जाने तथा नरक की आग में जलने का कारण है। अमानतदारी ईश्वरीय प्रतिज्ञा है। पिछली आयतों में लोगों की अमानतों की बात कही गई थी। यह आयत अमानत की सुरक्षा को ईश्वर की ऐसी प्रतिज्ञा बताती है जिसका पालन करना सभी का कर्तव्य है।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ७८ इस प्रकार है।وَإِنَّ مِنْهُمْ لَفَرِيقًا يَلْوُونَ أَلْسِنَتَهُمْ بِالْكِتَابِ لِتَحْسَبُوهُ مِنَ الْكِتَابِ وَمَا هُوَ مِنَ الْكِتَابِ وَيَقُولُونَ هُوَ مِنْ عِنْدِ اللَّهِ وَمَا هُوَ مِنْ عِنْدِ اللَّهِ وَيَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ وَهُمْ يَعْلَمُونَ (78)और आसमानी किताब वालों में से एक गुट ऐसा भी है जो (अपने हाथ की लिखी) किताब पढ़ते समय अपनी जीभ को ऐसे फिराता है कि तुम लोग यह समझने लगते हो कि यह आसमानी किताब में से है जबकि वह आसमानी किताब में से नहीं है। (यहां तक कि वे स्पष्ट रूप से) कहते हैं (जो कुछ हम पढ़ रहे हैं) वह ईश्वर की ओर से है जबकि वह ईश्वर को ओर से नहीं है और वे ईश्वर पर झूठ बांध रहे हैं जबकि वे (स्वयं वास्तविकता को) जानते हैं। (3:78) जैसा कि हमने विगत कार्यक्रमों में कहा था कि पूरे इतिहास में लोगों की पथभ्रष्टता का एक कारण ऐसे धार्मिक विद्वान रहे हैं जो कभी तो अपने समाजिक व धार्मिक स्थान की सुरक्षा के लिए और कभी ईर्ष्या तथा हठधर्मी के कारण लोगों को सत्य से अवगत कराने पर तैयार नहीं हुए बल्कि सत्य छिपाने से बढ़कर उन्होंने सत्य में फेर-बदल भी कर दिया और अपने विचारों व विश्वासों को धर्म का नाम देकर जनता के समक्ष प्रस्तुत किया। क़ुरआन मुसलमानों को ऐसे लोगों के ख़तरों की ओर से सचते करता है ताकि वे लोगों के दिखावे के रूप में या उनकी मीठी-मीठी बातों से धोखा न खा जाएं और यह जान लें कि बहुत से लोग धर्म के नाम पर ही ईश्वर पर बड़े से बड़ा आरोप लगा सकते हैं। इस आयत से हमने सीखा कि हर बात पर ध्यान नहीं देना चाहिए। हो सकता है कि कोई सुन्दर कथन, जिसे मनुष्य क़ुरआन समझ रहा हो वह क़ुरआन से बिल्कुल ही विपरीत हो। हमें जानना चाहिए कि कुछ लोग धर्म के नाम पर धर्म को ही क्षति पहुंचाते हैं। ईश्वर से न डरने वाले विद्वानों के ख़तरे की ओर से निश्चेत नहीं रहना चाहिए। वे लोगों को बहकाने और पथभ्रष्ट करने के अतिरिक्त ईश्वर पर झूठ बांधते हैं और अपनी बातों को ईश्वरीय कथन बताते हैं।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ७९ और ८० इस प्रकार है।مَا كَانَ لِبَشَرٍ أَنْ يُؤْتِيَهُ اللَّهُ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ ثُمَّ يَقُولَ لِلنَّاسِ كُونُوا عِبَادًا لِي مِنْ دُونِ اللَّهِ وَلَكِنْ كُونُوا رَبَّانِيِّينَ بِمَا كُنْتُمْ تُعَلِّمُونَ الْكِتَابَ وَبِمَا كُنْتُمْ تَدْرُسُونَ (79) وَلَا يَأْمُرَكُمْ أَنْ تَتَّخِذُوا الْمَلَائِكَةَ وَالنَّبِيِّينَ أَرْبَابًا أَيَأْمُرُكُمْ بِالْكُفْرِ بَعْدَ إِذْ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ (80)(हे आसमानी किताब रखने वालों के विद्वानों! क्या तुम नहीं जानते कि) किसी भी मनुष्य (और पैग़म्बर) को यह अधिकार नहीं है कि चूंकि ईश्वर ने उसे किताब तथा पैग़म्बरी दी है तो वह लोगों से कहे कि मेरे बंदे बनो न कि ईश्वर के। इस आधार पर तुम जो दूसरों को ईश्वरीय किताब सिखाते थे और स्वयं भी उसको पढ़ते थे तो तुमको ईश्वरीय (विद्वान) होना चाहिए (न यह कि तुम स्वयं को लोगों का स्वामी समझ लो। कोई भी पैग़म्बर इसकी अनुमति नहीं देता) (3:79) और आदेश नहीं देता कि फ़रिश्तों और अन्य पैग़म्बरों को अपना स्वामी बना लो। क्या यह संभव है कि (कोई पैग़म्बर) तुम्हें मुस्लिम होने के पश्चात कुफ़्र का आदेश दे? (3:80) पिछली आयतों में पथभ्रष्ट विद्वानों की ओर से सचेत करने के पश्चात इन दो आयतों में ईश्वर उन्हें संबोधित करते हुए कहता है कि ईश्वर की ओर से किताब लाने वाले पैग़म्बर भी, जिन्हें तत्वदर्शिता के आधार पर शासन का अधिकार है अपनी ओर लोगों को नहीं बुला सकते बल्कि उन्हें लोगों को ईश्वर तथा उसकी बंदगी की ओर बुलाना चाहिए, तो तुम जो केवल पैग़म्बरों के अनुयाई और आसमानी किताबों के शिक्षक हो, किस प्रकार स्वयं को ईश्वरीय आदेशों से फेर-बदल की अनुमति देते हो? और वह भी इस प्रकार कि मानो तुम स्वयं को लोगों का स्वामी और प्रभु समझते हो। ईश्वरीय किताब से अधिक परिचित होने और सदैव लोगों को उसकी शिक्षा देने के नाते तुम विद्वानों से आशा है कि तुम अन्य लोगों से अधिक उसके आदेशों पर कार्यबद्ध रहोगे और ईश्वरीय विद्वान बनो। किसी भी मनुष्य को ईश्वर के रूप में स्वीकार करना या उसके नाम पर कोई क़ानून बनाना या उनमें फेर-बदल करना, कुफ़्र के समान है और किसी भी पैग़म्बर ने स्वयं को या फ़रिश्तों तक ने स्वयं को यह अधिकार नहीं दिया है तो किस प्रकार से तुम ईश्वरीय किताब रखने वाले विद्वानों ने स्वयं को एक प्रकार का ईश्वर दर्शाया है और किस प्रकार तुम अपने व्यक्तिगत विश्वासों को धर्म के नाम पर लोगों में प्रचलित करते हो या धर्म के आदेशों में परिवर्तित करत हो। इन आयतों से हमने यह सीखा कि अपनी स्थिति, लोकप्रियता और पद से किसी भी प्रकार का अनुचित लाभ उठाना वर्जित है। यहां तक कि पैग़म्बरों को भी अपनी उच्च स्थिति से लाभ उठाने का अधिकार नहीं है। केवल ईश्वरीय विद्वानों को ही क़ुरआन की व्याख्या का अधिकार है और ईश्वरीय विद्वान बनने का मार्ग क़ुरआन से परिचित होना और उसको पढ़ना तथा पढ़ाना है। ईश्वरीय पैग़म्बरों तथा ईश्वर के प्रिय बंदों के बारे में किसी भी प्रकार का अतिवाद और उन्हें उनकी वास्तविक सीमा से आगे बढ़ाना वर्जित है। वे ईश्वर के बंदे हैं जो ईश्वर की उपासना और बंदगी द्वारा परिपूर्णता के उच्च चरणों तक पहुंचे हैं परन्तु वे कदापि ईश्वर नहीं हैं। कुफ़्र का अर्थ केवल ईश्वर का इन्कार नहीं है बल्कि ईश्वरीय क़ानूनों के विरूद्ध कोई भी क़ानून बनाने में मनुष्य की किसी भी प्रकार की भूमिका की स्वीकार करना, ईश्वर के स्वामित्व के इन्कार के समान है और स्वयं यह ईश्वर का इन्कार है।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ८१ और ८२ इस प्रकार है।وَإِذْ أَخَذَ اللَّهُ مِيثَاقَ النَّبِيِّينَ لَمَا آَتَيْتُكُمْ مِنْ كِتَابٍ وَحِكْمَةٍ ثُمَّ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مُصَدِّقٌ لِمَا مَعَكُمْ لَتُؤْمِنُنَّ بِهِ وَلَتَنْصُرُنَّهُ قَالَ أَأَقْرَرْتُمْ وَأَخَذْتُمْ عَلَى ذَلِكُمْ إِصْرِي قَالُوا أَقْرَرْنَا قَالَ فَاشْهَدُوا وَأَنَا مَعَكُمْ مِنَ الشَّاهِدِينَ (81) فَمَنْ تَوَلَّى بَعْدَ ذَلِكَ فَأُولَئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ (82)और जब ईश्वर ने (पहले वाले) पैग़म्बरों से प्रतिज्ञा ली कि जब भी मैं तुम्हें (आसमानी) किताब और तत्वदर्शिता दूं और फिर तुम्हारे पास (मेरी ओर से भेजा हुआ) रसूल आए जो उन चीज़ों की पुष्टि करने वाला हो जो तुम्हारे पास हैं तो उनपर ईमान लाओ और उसकी सहायता करो। ईश्वर ने कहा क्या तुम मेरे इस भारी बोझ को स्वीकार करते हो और मानते हो? (सब ने) कहा हां, हमने स्वीकार किया तो ईश्वर ने कहा कि फिर मेरी इस प्रतिज्ञा के गवाह रहो और मैं भी तुम्हारे साथ गवाहों में से हूं । (3:81) तो जिन्होंने इसके बाद मुंह मोड़ा तो निःसन्देह, वही लोग व्यभिचारी हैं। (3:82) पैग़म्बरे इस्लाम व उनके परिजनों के कथनों तथा क़ुरआन की व्याख्याओं में कहा गया है कि ईश्वर ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम व हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम जैसे पहले वाले पैग़म्बरों से वचन लिया था कि वे लोगों को पैग़म्बरे इस्लाम के आने की शुभ सूचना देंगे तथा उनकी विशेषताओं का उल्लेख करके लोगों के उनपर ईमान लाने की भूमि समतल करेंगे क्योंकि सारे पैग़म्बर एक ही ईश्वर की ओर से आए हैं तथा उनकी आसमानी किताबें एक दूसरे की पुष्टि व समर्थन करती हैं तो नए पैग़म्बर के आने के पश्चात पुराने पैग़म्बर के अनुयाइयों को उसपर ईमान लाना चाहिए और शत्रुओं के मुक़ाबले मे उसकी सहायता करनी चाहिए। यद्यपि पैग़म्बरे इस्लाम के समय में अन्य पैग़म्बर मौजूद नहीं थे जो उन पर ईमान लाते परन्तु महत्वपूर्ण बात इस काम के लिए उनकी तत्परता है। जैसाकि ईश्वर के मार्ग में युद्ध पर जाने वाले शहादत के लिए तैयार रहते हैं हालांकि यह भी संभव है कि वे शहीद न हों। दूसरे शब्दों में ईश्वर के आदेश के सामने झुकना महत्वपूर्ण है चाहे उस आदेश के पालन का अवसर न मिल सके। इन आयतों से हमने यह सीखा कि ईश्वरीय संदेश पहुंचाने में, पैग़म्बरों के बीच अंतर, शिक्षा देने के संबंध में एक विद्यालय के शिक्षकों के बीच अंतर की भांति है। उन सबका लक्ष्य एक ही है और प्रत्येक शिक्षक अपने छात्र को पढ़ाई जारी रखने के लिए अगले शिक्षक से परिचित कराता है। केवल ईमान ही पर्याप्त नहीं है। धर्म तथा धार्मिक नेताओं की सहायता और उनका समर्थन भी आवश्यक है। जब सारे ही पैग़म्बर एक दूसरे को स्वीकार करते हैं तो फिर इस बात का कोई औचित्य तथा तर्क नहीं है कि ईश्वरीय धर्म के अनुयाई, इतनी अधिक और अनुचित सांप्रदायिकता दिखाएं।