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    सूरए आले इमरान; आयतें ८३-८९ (कार्यक्रम 95)

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    सूरए आले इमरान की आयत संख्या ८३ इस प्रकार है।أَفَغَيْرَ دِينِ اللَّهِ يَبْغُونَ وَلَهُ أَسْلَمَ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ طَوْعًا وَكَرْهًا وَإِلَيْهِ يُرْجَعُونَ (83)तो क्या वे ईश्वरीय धर्म के अतिरिक्त (कोई धर्म) खोजते हैं? जबकि जो कुछ भी आकाशों तथा धरती में है, चाहते हुए और न चाहते हुए, उसके सामने सिर झुकाए हुए है। और (सभी) उसी की ओर पलटाए जाएंगे। (3:83) ईश्वर ने जिन वस्तुओं की सृष्टि की है वे दो प्रकार की हैं। एक गुट स्वयं ही अपने अधिकार और इरादे के साथ काम करता है और अपने मार्ग के पालन में स्वतंत्र है जैसे कि मनुष्य। दूसरा गुट ईश्वरीय सृष्टि की आवश्यकता के अनुसार बिना अधिकार और इरादे के बुद्धि के अधीन रहता है और उसमें कोई भी भावना नहीं होती जैसे फ़रिश्ते। यह आयत कहती है कि प्रकृति और उसमें मौजूद सभी विभिन्न वस्तुएं, सृष्टि के संबंध में ईश्वरीय क़ानूनों के समक्ष नतमस्तक हैं चाहे उन्हें स्वयं का अधिकार प्राप्त हो या न हो। तो जब ऐसा है और तुम सब सृष्टि में उसकी इच्छा के अधीन हो तो क़ानून बनाने में क्यों मानवीय विचारधाराओं को स्वीकार करते हो और ईश्वरीय क़ानून से निश्चेत हो जाते हो? मूल रूप से क्या सृष्टिकर्ता के अतिरिक्त किसी को सृष्टि के लिए क़ानून बनाने का अधिकार है? और क्या यह बात उचित है कि लोग अपने रचयिता के क़ानून को छोड़कर किसी अन्य की ओर जाएं। इस आयत से हम सीखते हैं कि अपनी पूरी महानता और वैभव के साथ पूरी प्रकृति ईश्वर के समक्ष नतमस्तक है। यदि हम ईश्वर के समक्ष नतमस्तक न हुए तो प्रकृति में एक भद्दे पैवंद की भांति दिखाई देंगे। प्रकृति और हमारा अंत ईश्वर के हाथ में है तो क्यों न हम स्वयं अपनी इच्छा और अधिकार से उसकी ओर जाएं। धर्म की वास्तविकता, ईश्वर के सामने पूर्ण रूप से नतमस्तक रहना है। ईश्वर की इच्छा के आगे ईमान वाले व्यक्ति की कोई इच्छा नहीं होती।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ८४ और ८५ इस प्रकार है। قُلْ آَمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنْزِلَ عَلَيْنَا وَمَا أُنْزِلَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَإِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ وَالْأَسْبَاطِ وَمَا أُوتِيَ مُوسَى وَعِيسَى وَالنَّبِيُّونَ مِنْ رَبِّهِمْ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِنْهُمْ وَنَحْنُ لَهُ مُسْلِمُونَ (84) وَمَنْ يَبْتَغِ غَيْرَ الْإِسْلَامِ دِينًا فَلَنْ يُقْبَلَ مِنْهُ وَهُوَ فِي الْآَخِرَةِ مِنَ الْخَاسِرِينَ (85)(हे पैग़म्बर!) कह दो कि हम ईश्वर पर और जो कुछ हम पर उतरा है और जो कुछ इब्राहीम, इस्माईल, इसहाक़, याक़ूब और अस्बात अर्थात याक़ूब के वंश के पैग़म्बरों पर उतरा है और जो कुछ मूसा, ईसा तथा अन्य पैग़म्बरों को उनके पालनहार की ओर से दिया गया है सब पर ईमान लाए। हम उनमें से किसी के बीच कोई अंतर नहीं समझते हैं और हम सब उसके (आदेश के) आगे सिर झुकाने वाले हैं। (3:84) और जो कोई भी इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म में चला गया तो उससे कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा और वह प्रलय के दिन घाटा उठाने वालों में से होगा। (3:85) इस आयत में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम व अन्य मोमिनों से कहा गया है कि वे पिछले पैग़म्बरों तथा उनकी किताबों के बारे में अपने ईमान की घोषणा करें तथा ईश्वरीय आदेशों के समक्ष नतमस्तक होने पर बल दें क्योंकि वे सभी एक ईश्वर की ओर से आए हैं, वहीं ईश्वर जिसने सृष्टि के आरंभ से ही कल्याण की ओर मनुष्य के मार्दर्शन के लिए सदैव अपनी ओर से पैग़म्बर भेजे हैं। स्वाभाविक है कि हर पैग़म्बर के आने के पश्चात उससे पहले वाले पैग़म्बर की शिक्षाओं पर बाक़ी रहना मानवीय मार्गदर्शन की प्राप्ति व परिपूर्णता में बाधा है और पैग़म्बरों ने एक विद्यालय के शिक्षकों की भांति मनुष्य को विभिन्न क्लासों में पढ़ाकर आगे की ओर बढ़ाया है। ईश्वर के अन्तिम पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लललाहो अलैहे व आलेही व सल्लम हैं जिन्होंने अपनी शिक्षाओं को इस्लामी विचारधारा के अंतर्गत पेशा किया। स्पष्ट सी बात है उनके आने के पश्चात पिछले पैग़म्बरों के अनुयाइयों का यह कर्तव्य है कि उनका अनुसरण करें और यदि कोई अन्य धर्म पर बाक़ी रहता है तो उससे स्वीकार नहीं किया जाएगा। इन आयतों से हमने यह सीखा कि सभी पैग़म्बरों का लक्ष्य एक ही था चाहे समय व स्थान के अनुसार निमंत्रण देने की उनकी पद्धतियां विभिन्न रही हों। सबसे अच्छा तथा परिपूर्ण धर्म होते हुए किसी अन्य धर्म को स्वीकार करना घाटा है।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ८६ तथा ८७ इस प्रकार है।كَيْفَ يَهْدِي اللَّهُ قَوْمًا كَفَرُوا بَعْدَ إِيمَانِهِمْ وَشَهِدُوا أَنَّ الرَّسُولَ حَقٌّ وَجَاءَهُمُ الْبَيِّنَاتُ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ (86) أُولَئِكَ جَزَاؤُهُمْ أَنَّ عَلَيْهِمْ لَعْنَةَ اللَّهِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ (87)ईश्वर किस प्रकार मार्गदर्शन करे उस गुट का जो ईमान लाने के पश्चात काफ़िर हो गया। और उन्होंने आरंभ में पैग़म्बरे इस्लाम की सत्यता की गवाही दी और स्पष्ट तर्क व निशानियां उनके पास आईं थीं। निःसन्देह ईश्वर अत्याचारी गुट का मार्गदर्शन नहीं करता। (3:86) (जो लोग धर्मभ्रष्ट हो गए) उनका बदला यह है कि ईश्वर, फ़रिश्तों और सभी लोगों की लानत अर्थात धिक्कार उन पर है। (3:87) मोमिनों को जो ख़तरे लगे रहते हैं उनमें से एक ईमान से पलट जाना है। इतिहास से पता चलता है कि बहुत से लोग ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर पर ईमान लाए परन्तु उनमें से कुछ लोग सत्य को पहचानने और इस्लाम की सत्यता को जानने के बावजूद, सत्य के मार्ग से विचलित हो कर काफ़िर बन गए। स्पष्ट है कि सत्य को समझने और उन पर ईमान न लाने वाले तथा सत्य को समझने परन्तु शत्रुता व द्वेष या ग़लत इच्छाओं के कारण उस पर ईमान न लाने वाले के मध्य भारी अंतर है और दूसरे प्रकार का व्यक्ति स्वयं अपने ऊपर अत्याचार करने के कारण, ईश्वर की विशेष कृपा व दया से वंचित रह जाता है जो कि केवल मोमिनों के लिए है। न केवल ईश्वर बल्कि फ़रिश्ते और सत्य प्रेमी लोग भी ऐसे लोगों पर धिक्कार करते हैं और स्वयं को उनसे अलग बताते हैं जो पैग़म्बरों के फ़रिश्तों के परिश्रमों और ईश्वरीय मार्गदर्शन के साधनों को व्यर्थ कर देते हैं। इन आयतों से हमने सीखा कि केवल प्राथमिक ईमान ही पर्याप्त नहीं है। अपनी आयु के अंत तक ईमान को बचाना आवश्यक है क्योंकि मनुष्य को सदैव ही धर्मभ्रष्टता का ख़तरा लगा रहता है। ईश्वरीय मार्गदर्शन से लाभान्वित होना और वंचित रहना स्वयं हमारे हाथ मं है। ईश्वर किसी पर अत्याचार नहीं करता। हम स्वयं ही सत्य की ओर से मुंह मोड़कर अपने आप पर अत्याचार करते हैं। लोगों को धर्मभ्रष्ट लोगों की वैचारिक भ्रष्टता के विरूद्ध प्रतिक्रिया दिखानी चाहिए और उनसे अपनी दूरी की घोषणा करनी चाहिए।सूरए आले इमरान की आयत संख्या ८८ और ८९ इस प्रकार है।خَالِدِينَ فِيهَا لَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ الْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنْظَرُونَ (88) إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا مِنْ بَعْدِ ذَلِكَ وَأَصْلَحُوا فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (89)उनपर सदैव ईश्वरीय धिक्कार रहेगी, न उनसे दंड कम किया जाएगा और न उन्हें मोहलत दी जाएगी। (3:88) सिवाए उन लोगों के जो धर्म भ्रष्टता के पश्चात अपने कुफ़्र से तौबा अर्थात पश्चाता कर लें और (अपने विचारों और विश्वासों को) सुधार लें तो निःसन्देह, ईश्वर अत्यंत क्षमाशील और दयावान है। (3:89) जो लोग सत्य को समझने, परखने और पहचानने के पश्चात, ईमान से फिर जाएं उनके लिए कड़ा दण्ड है। संसार में भी वे सत्यप्रेमियों की धिक्कार के पात्र बने रहते हैं और प्रलय में भी उन्हें कड़ा ईश्वरीय दण्ड भोगना होगा। यह लोग दण्ड में किसी भी प्रकार की कमी या देरी के योग्य नहीं हैं और ईश्वरीय दया से दूर हैं। अलबत्ता तौबा और पश्चाताप का द्वार कभी बंद नहीं है यहां तक कि ऐसे लोग भी यदि वास्तव में अपने कार्य से लज्जित हो जाएं तथा अपने चरित्र व विचारों को सुधार लें तो वे ईश्वरीय क्षमा के पात्र बन जाएंगे और ईश्वरीय दया उनके पास पलट आएगी। इन आयतों से हमने सीखा कि तौबा केवल ज़बान से नहीं होती है। वास्तविक तौबा अपने पिछले ग़लत कर्मों और विचारों में सुधार है। ईश्वर न केवल यह कि पापी की तौबा को स्वीकार कर लेता है और उसे क्षमा कर देता है बल्कि तौबा करने वाले को पसंद भी करता है।