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    सूरए आले इमरान; आयतें ८-१३ (कार्यक्रम 81)

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    सूरए आले इमरान की आयत संख्या ८ तथा ९ इस प्रकार है।رَبَّنَا لَا تُزِغْ قُلُوبَنَا بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنَا وَهَبْ لَنَا مِنْ لَدُنْكَ رَحْمَةً إِنَّكَ أَنْتَ الْوَهَّابُ (8) رَبَّنَا إِنَّكَ جَامِعُ النَّاسِ لِيَوْمٍ لَا رَيْبَ فِيهِ إِنَّ اللَّهَ لَا يُخْلِفُ الْمِيعَادَ (9)(ज्ञान में डूबे हुए लोग कहते हैं कि) हे हमारे पालनहार! हमारे दिलों को मार्गदर्शन के बाद असत्य की ओर न झुकाना और हमे अपनी ओर से कृपा प्रदान कर निःस्नेदह, तू बहुत बड़ा दानी है। (3:8) हे अल्लाह तू उस दिन सबको इकट्ठा करने वाला है जिस के बारे में कोई शंका नहीं है। निःसंदेह, अल्लाह वचन नहीं तोड़ता। (3:9)इससे पहले हमने कहा था कि क़ुरआनी आयतों के बारे में विद्धानों की दो श्रेणियां हैं। एक वह है जो स्वयं भ्रष्ट हैं और क़ुरआन के अर्थों को बदलना चाहते हैं ताकि अपनी बातों को क़ुरआन के हवाले से कह सकें और दूसरा वर्ग उन लोगों का है जिनके पास वास्वतिक ज्ञान है। यह वर्ग क्योंकि अल्लाह के आदेशों का पूर्णतयः पालन करता है इस लिए वह क़ुरआन की आयतों के अर्थों में कोई परिवर्तन किये बिना ही आयतों की वास्तविकता तक पहुंच जाता है और आवश्यकता पड़ने पर उसका वर्णन भी करता है।क्योंकि मनुष्य को सदैव ही पथभ्रष्टता का ख़तरा रहता है इसी लिए इन आयतों में, ज्ञान में डूबे हुए लोग ज्ञान और ईमान रखने के बावजूद अल्लाह से प्रार्थना करते हैं कि उनके दिलों को हर प्रकार की बुराइयों और पथभ्रष्टता से पवित्र कर दे ताकि पहला गुट जिस विपदा का शिकार हुआ है वे उसका शिकार न होने पाएं।वे सदैव ही प्रलय को अपने सामने पाते हैं और अकारण ही किसी बात पर अल्लाह का हवाला नहीं देते। क्योंकि उन्हें इस बात का ज्ञान होता है कि वे जो कुछ भी कहेंगे उसका उत्तर ईश्वरीय न्यायालय में देना ही होगा। एसे न्यायालय में जहां पर केवल न्याय की बात होगी, क्योंकि वचन या तो भूल से, कमज़ोरी से, पछतावे से या फिर भय से तोड़ा जाता है और ईश्वर इन समस्त त्रुटियों से दूर है।इन आयतों से हमने सीखा कि अपने ज्ञान तथा ईमान पर घमण्ड नहीं करना चाहिए। क्योंकि बहुत से विद्वान सेवा के स्थान पर समाज के साथ ग़द्दारी करते हैं और बहुत से ईश्वर पर विश्वास रखने वाले विद्वान, अन्तिम समय में नास्तिक होकर इस दुनिया से उठते हैं। वास्तविक ज्ञान का चिन्ह, ईश्वर की ओर ध्यान देना, उसके आगे स्वयं को कुछ न समझना और केवल उसी से सहायता मांगना है।सूरए आले इमरान की आयत संख्या १०, ११ तथा १२ इस प्रकार है।إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا لَنْ تُغْنِيَ عَنْهُمْ أَمْوَالُهُمْ وَلَا أَوْلَادُهُمْ مِنَ اللَّهِ شَيْئًا وَأُولَئِكَ هُمْ وَقُودُ النَّارِ (10) كَدَأْبِ آَلِ فِرْعَوْنَ وَالَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ كَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا فَأَخَذَهُمُ اللَّهُ بِذُنُوبِهِمْ وَاللَّهُ شَدِيدُ الْعِقَابِ (11) قُلْ لِلَّذِينَ كَفَرُوا سَتُغْلَبُونَ وَتُحْشَرُونَ إِلَى جَهَنَّمَ وَبِئْسَ الْمِهَادُ (12)जिन लोगों ने अल्लाह का इन्कार किया उनका धन-दौलत और उनकी संतान उन्हें अल्लाह के मुक़ाबले कोई लाभ नहीं पहुंचा सकतीं और वह नर्क की आग का ईंधन है। (3:10) जैसा कि फ़िरऔन के अनुयाइयों और उनसे पहले वालों के साथ हुआ। उन्होंने हमारी निशानियों को झुठलाया तो अल्लाह ने उन्हें उनके किये की सज़ा दे दी, और अल्लाह कड़ा दण्ड देने वाला है। (3:11) जो लोग इन्कार करते हैं उनसे कह दो कि तुम्हे जल्द ही पराजित करके नरक की ओर हांक दिया जाएगा और वह कितनी बुरी जगह है। (3:12)इन आयतों में अल्लाह, पैग़म्बर और मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहता है कि अल्लाह का इन्कार करने वालों की संतान, दौलत और परिवार तुम्हें प्रभावित न करे। यह सब कुछ इस संसार के लिए है और परलोक में यह वस्तुएं उन्हें कोई लाभ नहीं पहुंचाएंगी, क्योंकि उनका शरीर स्वयं ही नरक का ईंधन होगा तो फिर कौन सी वस्तु उन्हें उस आग से सुरक्षित रख सकती है।फिर अल्लाह मुसलमानों को चेतावनी देता है कि वे यह न सोचें कि केवल उन्हीं के काल में कुछ एसे लोग पाए जाते हैं जो अल्लाह का इन्कार करते हैं और लड़ने के लिए खड़े हो गए हैं बल्कि पूरे इतिहास में विभिन्न समुदायों ने सत्य के सामने इसी प्रकार का व्यवहार अपनाया है किंतु वे सत्य को कोई हानि न पहुंचा सके बल्कि स्वयं उन्हीं का नाश हो गया। यहां तक वह फ़िरऔन जो अत्यंत शक्तिशाली था अल्लाह के आक्रोश के आगे एक क्षण भी न टिक सका। अंत में इस आयत में यह भविष्यवाणी की गई है कि मक्के के काफ़िर जल्द ही तुम्हारे हाथों पराजित होंगे और उन्हें उनके किये की सज़ा मिल जाएगी।इन आयतों से हमें पाठ मिलता है कि अपने धन-दौलत और संतान से अधिक आशाएं नहीं बांधनी चाहिए। ईश्वर का इन्कार करने वाले इन सब वस्तुओं को सबकुछ समझ बैठते हैं। नास्तिक विचार और बुरे कर्म, मनुष्य की प्रवृत्ति को बदल कर रख देते हैं यहां तक कि मनुष्य ईंधन की श्रेणी में आकर नरक की आग सुलगाने के काम आने योग्य हो जाता है। पाप का फल बुरा होता है लेकिन उससे बुरा यह है कि पाप, मनुष्य के स्वभाव का भाग बन जाए। ऐसी स्थिति में उसका अंत बहुत ही भयानक होगा। असत्य को पराजित होना है और अंततः सत्य की ही विजय होती है।सूरए आले इमरान की आयत संख्या १३ इस प्रकार है।قَدْ كَانَ لَكُمْ آَيَةٌ فِي فِئَتَيْنِ الْتَقَتَا فِئَةٌ تُقَاتِلُ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَأُخْرَى كَافِرَةٌ يَرَوْنَهُمْ مِثْلَيْهِمْ رَأْيَ الْعَيْنِ وَاللَّهُ يُؤَيِّدُ بِنَصْرِهِ مَنْ يَشَاءُ إِنَّ فِي ذَلِكَ لَعِبْرَةً لِأُولِي الْأَبْصَارِ (13)निःसन्देह, तुम्हारे लिए उन दो गुटों में से कि जो एक दूसरे के सामने आए पाठ निहित है कि एक गुट अल्लाह की राह में लड़ रहा था और दूसरा असत्य के मार्ग में। वे मोमिनों को दुगना देखते थे और अल्लाह जिसे चाहता है सहायता प्रदान करता है। इसमें देखने वालों के लिए पाठ है। (3:13)पैग़म्बरे इस्लाम तथा मुसलमानों को १३ वर्षों तक मक्के में यातनाएं दी गईं। यहां तक कि शत्रुओं ने एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम की हत्या का षड्यंत्र रचा जिसके पश्चात अल्लाह के आदेश से पैग़म्बर तथा मुसलमानों ने मक्के से मदीने की ओर पलायन किया।मक्के से पलायन के दूसरे वर्ष बद्र नामक क्षेत्र में एक युद्ध हुआ जिसमें मुसलमानों की संख्या मात्र ३१३ थी जबकि शत्रुओं की संख्या एक हज़ार थी। शत्रुओं की अधिक संख्या होने के बावजूद युद्ध में ७० शत्रु मारे गए तथा ७० अन्य को बंदी बना लिया गया। यह आयत इस युद्ध में ईश्वरीय सहायता की ओर संकेत करती है। आयत कहती है कि अल्लाह ने तुम्हें उनकी दृष्टि में कई गुना बढ़ा कर दिखाया, यहां तक कि उनमें आतंक व्याप्त हो गया। इसी लिए तुम्हारे सामने टिकना उनके लिए संभव नहीं रहा। आयत के आरंह तथा इसके अंत में इसी बात पर बल दिया जाता है कि बद्र के युद्ध में ईश्वरीय सहायता और सत्य की सेना की असत्य की सेना पर विजय को तुम्हारे लिए पाठ होना चाहिए कि मोर्चे पर कम संख्या तुम्हारी चिंता का कारण न बने। तुम अपने कर्तव्य का पालन करो तो अल्लाह तुम्हारी सहायता करेगा।इस आयत से हमें पाठ मिलता है कि इस्लाम में युद्ध अल्लाह के लिए तथा धर्म की रक्षा के उद्देश्य से किया जाता है। इस्लाम में युद्ध शक्ति प्रदर्शन या देशों पर अधिकार के लिए नहीं किया जाता।ईश्वरीय सहायता का एक साधन, शत्रु के दिल में भय उत्पन्न करना भी होता है जिसके कारण शत्रु मुसलमानों की संख्या को कई गुना अधिक देखकर उनके मुक़ाबले से पीछे हट जाता है।हमारे आस-पास की घटनाएं हमारे लिए पाठ होती हैं किंतु उनसे केवल खुली आखों वाले ही पाठ ले पाते हैं।(