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    सूरए आले इमरान; आयतें ९५-९९ (कार्यक्रम 97)

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    आइए पहले सूरए आले इमरान की आयत संख्या ९५ की तिलावत सुनते हैं।قُلْ صَدَقَ اللَّهُ فَاتَّبِعُوا مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِكِينَ (95)(हे पैग़म्बर, आसमानी किताब वालों से) कह दो (कि अब जबकि स्पष्ट हो गया है कि) ईश्वर ने सच कहा है तो इब्राहीम के धर्म का अनुसरण करो जो सत्यवादी थे और कभी भी अनेकेश्वरवादियों में से न हुए। (3:95) पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि यहूदियों ने कुछ खाद्य सामग्रियों को स्वयं पर हराम अर्थात वर्जित कर लिया था और इसे वे ईश्वरीय आदेश बताया करते थे। पैग़म्बरे इस्लाम ने उनसे कहा कि यदि तुम सच बोल रहे हो तो इन वस्तुओं के वर्जित होने का आदेश तौरेत में दिखाओ। यह आयत उन्हें याद दिलाती है कि तुम जो स्वयं को हज़रत इब्राहीम के धर्म के अनुयायी बताते हो, तो तुम्हें व्यवहार में भी हज़रत इब्राहीम की भांति सत्य की पहचान और उसके अनुसरण के प्रयास में रहना चाहिए। यही ईश्वरीय किताब का आदेश है। ऐसा न हो कि तुम लोग अपने पूर्वजों की संस्कृति एवं परंपरा के प्रति अपनी अनुचित इच्छाओं के पालन या समाज में प्रचलित ग़लत प्रथाओं के पालन के प्रयास में रहो कि यह वास्तव में एक प्रकार का अनेकेश्वरवाद है। इस आयत से हमने सीखा कि सत्य की खोज और सत्य का अनुसरण, इतिहास में महान लोगों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता रही है। हमें भी ऐसे लोगों से प्रेरणा लेने और उनको अपना आदर्श बनाने का प्रयास करना चाहिए। ईश्वरीय क़ानूनों के समक्ष किसी भी क़ानून या परंपरा को स्वीकार करना, क़ानून बनाने के मामले में ईश्वर के साथ किसी अन्य को जोड़ने की भांति है।आइए अब सूरए आले इमरान की आयत संख्या ९६ और ९७ की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ أَوَّلَ بَيْتٍ وُضِعَ لِلنَّاسِ لَلَّذِي بِبَكَّةَ مُبَارَكًا وَهُدًى لِلْعَالَمِينَ (96) فِيهِ آَيَاتٌ بَيِّنَاتٌ مَقَامُ إِبْرَاهِيمَ وَمَنْ دَخَلَهُ كَانَ آَمِنًا وَلِلَّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا وَمَنْ كَفَرَ فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ (97)निःसन्देह, लोगों (की उपासना) के लिए जो पहला घर बनाया गया वही है जो मक्का नगर की धरती पर है (ऐसा घर) जो पूरे संसार के लिए विभूति और मार्गदर्शन (का कारण) है। (3:96) उस घर में इब्राहीम के स्थान (जैसी) स्पष्ट निशानियां हैं और जो भी उस घर में प्रविष्ट हो गया वह सुरक्षित है। लोगों पर ईश्वरीय कर्तव्य है कि जिस किसी में भी उस घर तक पहुंचने की क्षमता हो वह इस घर का हज करे और जो कोई इन्कार करे तो निःसन्देह, ईश्वर पूरे संसार के आवश्यकतामुक्त है। (3:97) मुसलमानों पर यहूदियों की ओर से जो आपत्तियां की जाती थीं उनमें से एक यह थी कि बैतुलमुक़द्दस का निर्माण हज़रत ईसा मसीह के जन्म से लगभग एक हज़ार वर्ष पूर्व हज़रत सुलैमान के हाथों हुआ था तो तुम लोगों ने काबे को क़िबला क्यों बना लिया जबकि वह अधिक पुराना नहीं है। इसके उत्तर में क़ुरआने मजीद कहता है कि काबा वह पहला स्थान है जो लोगों की उपासना के लिए बनाया गया है और वह प्रत्येक उपासनागृह से अधिक पुराना है। पैग़म्बरे इस्लाम तथा उनके परिजनों के कथनानुसार काबे की नीव हज़रत आदम ने रखी थी और सभी पैग़म्बरों ने उसके दर्शन किये हैं। इस ऐतिहासिक इमारत का पुनर्निर्माण हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने किया और इसकी ज़ियारत के लिए विशेष नियम निर्धारित किये।काबा न केवल क़िबला है, जिसकी ओर मुख करके मुसलमान प्रतिदिन पांच बार नमाज़ पढ़ते हैं बल्कि वह ईश्वरीय शक्ति की एक निशानी भी है जिसके समीप प्रतिवर्ष पूरे संसार के मुसलमान एकत्रित होते हैं और जिस किसी में भी आर्थिक तथा शारीरिक क्षमता हो उसे अपने जीवन में कम से कम एक बार इस वार्षिक सम्मेलन अर्थात हज में अवश्य उपस्थित होना चाहिए।काबे की दीवारों को ऊंचा उठाते समय हज़रत इब्राहीम एक ऊंचे पत्थर पर खड़े हो जाया करते थे। हर काल में लोगों ने उस पत्थर का भी आदर किया और इस समय वह काबे के समीप मक़ामे इब्राहीम अर्थात इब्राहीम के स्थान के रूप में सुरक्षित है। काबे का पुनर्निर्माण भी हज़रत ईसा और हज़रत मूसा से शताब्दियों पूर्व हुआ था और इस बीच बाढ़ तथा विध्वंस जैसे कई परिवर्तन भी हुए किंतु आज भी काबे के समीप इस पत्थर का बाक़ी रहना स्वयं एक स्पष्ट ईश्वरीय निशानी है जिसे ईश्वरीय घर के दर्शन अर्थात काबे की ज़ियारत को जाने वालों के लिए शिक्षा सामग्री बनना चाहिए।आज हम इस काबे के समीप मक़ामे इब्राहीम की ज़ियारत करते हैं और एक दिन ऐसा आएगा जब धरती पर ईश्वर की अन्तिम निशानी और उसके अन्तिम प्रतिनिधि इमाम महदी अलैहिस्सलाम, काबे की दीवार से टेक लगाकर मानवता के कल्याण का नारा लगाएंगे और अपने विश्वव्यापी आन्दोलन द्वारा संसार में न्याय स्थापित करेंगे।दूसरी ओर मक्का और काबा, ईश्वर की ओर से घोषित सुरक्षित क्षेत्र हैं जहां पर कीड़ों-मकोड़ों और घास-फूस को भी सुरक्षा प्राप्त है। किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह वहां पर कोई पौधा तोड़े या किसी पक्षी का शिकार करे। इस्लामी शिक्षाओं में मिलता है कि यदि कोई अपराधी मस्जिदुल हराम में प्रविष्ट हो जाए तो उसे बाहर नहीं निकाला जा सकता, हां उसे खाने पीने की दृष्टि से कठिनाई में डालकर स्वयं बाहर निकलने पर विवश किया जा सकता है।इन आयतों से हमने यह सीखा कि यदि आज विभिन्न राष्ट्रों के प्रतिनिधियों के एकत्रित होने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ नामक संस्था बनाई गई है तो ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में भी काबे को लोगों के घर के रूप में बनाया है कि जो उपासना का भी स्थान है और सभी जातियों व संप्रदायों के प्रतिनिधियों के एकत्रित होने का स्थल भी। ईश्वरीय कर्तव्यों का पालन हर एक की क्षमता पर निर्भर है। ईश्वर ने सभी वस्तुओं को एक समान कर्तव्य दिये हैं और हर किसी के कंधों पर उसकी आर्थिक व शारीरिक क्षमताओं के अनुसार भार डाला है। ईश्वरीय कर्तव्यों के पालन का लाभ स्वयं हमें होता है और ईश्वर को हमारी उपासनाओं या कर्तव्य पालन की कोई आवश्यक्ता नहीं है जैसा कि उसे हमारे अस्तित्व की भी कोई आवश्यकता नहीं है।आइए अब सूरए आले इमरान की आयत संख्या ९८ और ९९ की तिलावत सुनते हैं।قُلْ يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَكْفُرُونَ بِآَيَاتِ اللَّهِ وَاللَّهُ شَهِيدٌ عَلَى مَا تَعْمَلُونَ (98) قُلْ يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَصُدُّونَ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ مَنْ آَمَنَ تَبْغُونَهَا عِوَجًا وَأَنْتُمْ شُهَدَاءُ وَمَا اللَّهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ (99)(हे पैग़म्बर) कह दो कि है (आसमानी) किताब (रखने) वालों, तुम क्यों ईश्वरीय निशानियों का इन्कार करते हो जबकि ईश्वर तुम्हारे कर्मों का साक्षी है। (3:98) कह दो कि हे (आसमानी) किताब (रखने) वालों, जो लोग ईमान ला चुके हैं तुम उन्हें ईश्वर के मार्ग (पर चलने) से क्यों रोकते हो और उस (सीधे मार्ग) में पथभ्रष्टता उत्पन्न करने का प्रयास करते हो, जबकि तुम स्वयं गवाह हो (कि उनका ही मार्ग सही है) और जान लो कि जो कुछ तुम करते हो, ईश्वर उससे निश्चेत नहीं है। (3:99) इस्लाम के उदय से अरब में यद्यपि अधिकांश ईश्वरीय धर्म के अनुयायी, यहूदी थे और तौरेत तथा इंजील की भविष्यवाणियों के आधार पर वे अन्तिम ईश्वरीय पैग़म्बर की प्रतीक्षा कर रहे थे परन्तु पैग़म्बरे इस्लाम के मदीना नगर पहुंचने पर बहुत से यहूदियों और ईसाइयों ने उन पर ईमान लाने के स्थान पर उनकी किताब अर्थात पवित्र क़ुरआन का ही इन्कार कर दिया और मुसलमानों का साथ देने के बजाए वे शत्रुओं से जा मिले। वे लोग न केवल यह कि स्वयं ईमान नहीं लाते थे बल्कि दूसरों के ईमान लाने में भी बाधाएं डालाते थे। वे इस्लाम की छवि को इतना बिगाड़ कर प्रस्तुत करते थे कि किसी को भी उसमें रूचि न हो और कोई भी पैग़म्बरे इस्लाम पर ईमान न लाए। इन आयतों में ईश्वर अपने पैग़म्बर से कहता है कि उन लोगों से कह दो कि क्या तुम यह नहीं जानते कि ईश्वर तुम्हारी गुप्त गतिविधियों से परिचित है और वह कभी भी तुम्हारे कर्मों की ओर से निश्चेत नहीं रहता, तो तुम ईश्वर के मार्ग में क्यों रोड़े अटकाते हो और मोमिनों को पथभ्रष्ट करने का प्रयास करते हो? इन आयतों से हमने यह सीखा कि यदि हम ईश्वर को अपने कार्यों का साक्षी मानें तो फिर हम बहुत से कार्य नहीं करेंगे। ईश्वर के ज्ञान व विश्वास, मनुष्य को बहुत से पापों से रोकने का सबसे अच्छा मार्ग है। ईश्वरीय धर्म के बहुत से शत्रु उसके सत्य और अपने मार्ग के ग़लत होने से अवगत हैं किंतु फिर भी लोगों को भटकाने का प्रयास करते हैं क्योंकि वे सांसारिक हितों की प्राप्ति को हर चीज़ पर वरीयता देते हैं।