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    सूरए इब्राहीम, आयतें 1-3, (कार्यक्रम 419)

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    सूरए रअद की समीक्षा समाप्त हुई और अब हम सूरए इब्राहीम की समीक्षा आरंभ कर रहे हैं। इस सूरे की अधिकांश आयतें मक्का नगर में उतरी हैं और चूंकि इस सूरे में ईश्वरीय दूत हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बारे में, जिन से यहूदी, ईसाई तथा इस्लाम धर्म को संबधित बताया गया है, चर्चा की गयी है इस लिए इस सूरे का नाम सूरए इब्राहीम रखा गया। अलबत्ता इस सूरे में अन्य ईश्वरीय दूतों के उपदेशों, शुभसूचनाओं तथा हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की कुछ प्रार्थनाओं का भी उल्लेख किया गया है। तो आइये सबसे पहले इस सूरे की पहली आयत की तिलावत सुनें।بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ الر كِتَابٌ أَنْزَلْنَاهُ إِلَيْكَ لِتُخْرِجَ النَّاسَ مِنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ بِإِذْنِ رَبِّهِمْ إِلَى صِرَاطِ الْعَزِيزِ الْحَمِيدِ (1)ईश्वर के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। अलिफ़ लाम रा। (हे पैग़म्बर!) यह वह किताब है जिसे हमने आपके पास भेजा है ताकि आप लोगों के पालनहार की अनुमति से उन्हें अंधकारों से निकाल कर प्रकाश और सराहनीय व प्रतिष्ठित ईश्वर के मार्ग की ओर ले जाएं। (14:1)जैसा कि क़ुरआने मजीद की विभिन्न आयतों से पता चलता है, ईश्वरीय दूतों और ईश्वरीय ग्रंथों का उद्देश्य लोगों को आतंरिक व शैतानी इच्छाओं से स्वतंत्र करना तथा समाज पर राज करने वाले अत्याचारियों से बचाना है। इसी प्रकार लोगों को अंधविश्वासों व ग़लत धारणाओं व ग़लत सामाजिक परंपराओं से बाहर निकालना भी ईश्वरीय दूतों के अभियान का भाग है। यदि ये उद्देश्य पूरे हो जाएं तो एक ईश्वर की उपासना की भूमिका प्रशस्त हो जाएगी और मनुष्य अंधकारों से निकल कर ईश्वरीय प्रकाश तक पहुंच जाएंगे। यहां पर एक रोचक बात यह है कि पूरे कुरआन मजीद में अंधकार के लिए अरबी का जो शब्द प्रयोग किया गया वह बहुवचन है किंतु प्रकाश के लिए अरबी का जो शब्द प्रयोग किया गया है वह हर स्थान पर एकवचन है। संभवतः इस का कारण यह हो कि अनेकेश्वरवाद, कुफ़्र तथा मिथ्याचार जैसे ग़लत मार्ग बहुत अधिक हैं किंतु सत्य का मार्ग केवल एक ही है और वह ईश्वर का मार्ग है जिसकी ओर ईश्वरीय दूतों ने मानवजाति का मार्गदर्शन किया है। इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय ग्रंथ का आना ही पर्याप्त नहीं है। लोगों के मार्गदर्शन के लिए ईश्वरीय दूतों और मार्गदर्शकों का होना भी आवश्यक है ताकि वे ईश्वरीय ज्ञान लोगों के मध्य फैलाएं और स्वयं उस का व्यवहारिक उदाहरण पेश करें।ईश्वरीय धर्मों का मूल उद्देश्य मनुष्य को अंधकारों से निकालना है। उनका उद्देश्य लोगों को अज्ञानता के अंधकार से निकाल कर ज्ञान के प्रकाश में लाना, मतभेद के अंधकार से निकाल कर एकता के प्रकाश में लाना और पाप के अंधकार से निकाल कर ईश्वरीय भय के प्रकाश में लाना है।आइये अब सूरए इब्राहीम की दूसरी आयत की तिलावत सुनें।اللَّهِ الَّذِي لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَوَيْلٌ لِلْكَافِرِينَ مِنْ عَذَابٍ شَدِيدٍ (2)ईश्वर वही है जो आकाशों और धरती पर जो कुछ है उन सब का स्वामी है तो फिर इन्कार करने वालों का कठोर दंड से बुरा हाल होगा। (14:2)लोगों के मार्गदर्शन में ईश्वरीय ग्रंथ की भूमिका के वर्णन के बाद इस आयत में कहा जाता है कि इस किताब को भेजने वाला वही ईश्वर है जिसने धरती आकाश और मनुष्य सहित इस पूरी सृष्टि की रचना की और उसे समस्त रचनाओं का ज्ञान है और उसने उसी ज्ञान के आधार पर मनुष्य की आवश्यकता के अनुसार किताब भेजी है। ऐसा क्यों होता है कि ईश्वरीय रचनाओं में शामिल यह मनुष्य अपने रचनाकार के सामने खड़ा होने का साहस करता है? बल्कि उसके अस्तित्व या उसकी ओर से किताब भेजे जाने का भी इन्कार कर देता है? क्या यह इन्कार प्रमाणों या बौद्धिक तर्कों के आधार पर होता है या आंतरिक इच्छाओं के अनुसरण के कारण? स्पष्ट है कि आतंरिक इच्छाओं का अनुसरण मनुष्य को पाप व भ्रष्टाचार की दलदल की ओर ले जाता है और दुख व दंड का पात्र बनने की भूमिका प्रशस्त करता है। इस आयत से हमने सीखा कि हमें ऐसी हस्ती के बनाए हुए नियमों का पालन करना चाहिए जो हमारा रचनाकार भी है और जिसे हमारी आवश्यकताओं और संभावनाओं का भी ज्ञान है। ईश्वरीय नियमों को हटाकर उस के स्थान पर मानव द्वारा बनाए गये नियमों को लागू करना एक प्रकार से ईश्वर का इन्कार करने के समान है।ईश्वर का इन्कार करने से उसे कोई हानि नहीं पहुंचती जैसा कि दीवार के पीछे खड़े होकर सूर्य का इन्कार करने से ,सूर्य के महत्व व अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि यह सूर्य के प्रकाश से वंचित हो जाने का कारण बनता है। आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर तीन की तिलावत सुनें।الَّذِينَ يَسْتَحِبُّونَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا عَلَى الْآَخِرَةِ وَيَصُدُّونَ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ وَيَبْغُونَهَا عِوَجًا أُولَئِكَ فِي ضَلَالٍ بَعِيدٍ (3)काफ़िर वे हैं जो संसारिक जीवन को परलोक पर प्राथमिकता देते हैं और दूसरों को ईश्वर के मार्ग पर चलने से रोकते हैं और उसे टेढ़ा दर्शाने का प्रयास करते हैं यह लोग निश्चित रूप से गहन भ्रष्टाचार में हैं। (14:3)यह आयत काफिरों द्वारा ईश्वरीय दूतों के मार्ग के विरोध का कारण बताते हुए कहती है कि ईश्वरीय ग्रंथों के इन्कार का मूल कारण, संसारिक मोह व लोभ है। वे लोग जो इस संसार में सुख भोगना चाहते हैं और जैसा चाहें खाना और पहनना तथा मनमानी करना चाहते हैं। यह लोग धर्म का इन्कार करते हैं ताकि धर्म उन के गलत कामों पर अंकुश न लगा सके। यदि धर्मपरायणता का अर्थ केवल कुछ विश्वासों व धारणाओं को स्वीकार करना ही होता तो संभवतः सारे लोग धर्म का पालन करने वाले हो जाते किंतु धर्म परायणता के लिए आवश्यक तत्व कुछ वर्जनाओं का ध्यान रखना तथा कुछ ऐसे काम छोड़ना है जिन्हें छोड़ने पर सुखभोगी लोग तैयार नहीं होते। कुरआने मजीद का कहना है कि किंतु काफिरों को केवल इसी पर संतोष नहीं होता बल्कि वह दूसरों को भी अपने साथ मिलाने का प्रयास करते हैं। इसी लिए उन की कोशिश यह होती है कि ईश्वरीय दूतों को भ्रष्ट दर्शाएं और उन की शिक्षाओं को समाज के भ्रष्ट होने का कारण बताएं ताकि लोग स्वयं उन के बारे में कोई प्रश्न न करें।इस आयत से हमने सीखा कि भ्रष्टाचार व अश्लीलता का प्रचार, ईश्वरीय धर्मों के विरूद्ध कुप्रचार, शंका उत्पन्न करना तथा धार्मिक शिक्षाओं को गलत रूप से प्रस्तुत करना ईश्वरीय दूतों के मार्ग का विरोध करने वालों की मुख्य शैलियां हैं। जो वस्तु ख़तरनाक है वह संसार को परलोक पर प्राथमिकता देना है अन्यथा सांसारिक सुख सुविधाओं से लाभान्वित होना न केवल यह कि सही है बल्कि इसकी सिफ़ारिश भी की गयी है।