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    सूरए इब्राहीम, आयतें 11-14, (कार्यक्रम 422)

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    आइये सूरए इब्राहीम की आयत नंबर ११ की तिलावत सुनें।قَالَتْ لَهُمْ رُسُلُهُمْ إِنْ نَحْنُ إِلَّا بَشَرٌ مِثْلُكُمْ وَلَكِنَّ اللَّهَ يَمُنُّ عَلَى مَنْ يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ وَمَا كَانَ لَنَا أَنْ نَأْتِيَكُمْ بِسُلْطَانٍ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ وَعَلَى اللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ (11)पैग़म्बरों ने विरोधियों के उत्तर में कहा कि हम भी तुम्हारी ही भांति मनुष्य हैं किंतु ईश्वर अपने बंदों में से जिस पर चाहता है उपकार करता है (तथा उसे पैग़म्बरी के लिए नियुक्त करता है) और हम ईश्वर की अनुमति के बिना तुम्हारे समक्ष कोई चमत्कार कदापि प्रस्तुत नहीं कर सकते और ईमान वालों को तो केवल ईश्वर पर ही भरोसा करना चाहिए। (14:11)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि पैग़म्बरों का निमंत्रण स्वीकार न करने के लिए विरोधी एक बहाना यह बनाते थे कि वे भी उन्हीं की भांति मनुष्य हैं अतः इस बात का कोई कारण नहीं है कि वे उनकी बात को स्वीकार करते हुए अपने पूर्वजों की शैली को छोड़ दें।इस आयत में ईश्वर कहता है कि यद्यपि पैग़म्बर भी मनुष्य ही हैं किंतु वह अपने पवित्र एवं योग्य बंदों पर कृपा करता है तथा उन्हें अपनी पैग़म्बरी का पद प्रदान करके लोगों के मार्गदर्शन का माध्यम बनाता है। इसी के साथ सच्चे पैग़म्बरों तथा पैग़म्बरी के झूठे दावेदारों के बीच पहचान के लिए वह अपने पैग़म्बरों को ऐसे चमत्कार प्रदान करता है जिन्हें दिखाने की साधारण लोगों में क्षमता नहीं होती। यही चमत्कार, पैग़म्बरों के ईश्वर की ओर से आने तथा उनकी बातों, मार्ग तथा शैली के सही होने का प्रमाण होते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि सभी मनुष्य विदित रूप से एक समान होते हैं किंतु आंतरिक रूप से वे बहुत भिन्न होते हैं तथा इस बारे में ईश्वर के अतिरिक्त किसी को भी ज्ञान नहीं होता अतः किसी के बारे में भी उसके विदित रूप को देख कर निर्णय नहीं करना चाहिए।विरोधियों से मुक़ाबले में ईश्वर पर भरोसा करना, ईश्वर पर सच्चे ईमान का अटूट भाग है तथा वास्तविक ईमान वाला कभी भी विरोधियों के द्वेष, हठधर्म तथा इन्कार से निराश नहीं होता।आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर १२ की तिलावत सुनें।وَمَا لَنَا أَلَّا نَتَوَكَّلَ عَلَى اللَّهِ وَقَدْ هَدَانَا سُبُلَنَا وَلَنَصْبِرَنَّ عَلَى مَا آَذَيْتُمُونَا وَعَلَى اللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُتَوَكِّلُونَ (12)और हम ईश्वर पर भरोसा क्यों न करें जबकि उसी ने (कल्याण के) मार्गों की ओर हमारा मार्गदर्शन किया है और तुम्हारी ओर से दी जाने वाली यातनाओं पर हम धैर्य करेंगे और भरोसा करने वालों को तो केवल ईश्वर पर ही भरोसा करना चाहिए। (14:12)पिछली आयत में ईश्वर पर भरोसा करने की आवश्यकता पर बल देने के पश्चात, क़ुरआने मजीद इस आयत में कहता है कि जिस ईश्वर के हाथ में मनुष्य का कल्याण व सौभाग्य है, उसके अतिरिक्त किस पर भरोसा एवं विश्वास किया जा सकता है? अल्बत्ता ईश्वर पर भरोसे का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य समाज से कट जाए और एकांत में रहने लगे, बल्कि ईश्वर पर भरोसे का अर्थ कठिनाइयों के समक्ष डटे रहना तथा यातनाओं को सहन करना है।यातनाएं देना और समस्याएं खड़ी करना विरोधियों का काम है तथा सत्य के मार्ग पर डटे रहना, ईमान वालों की शैली है। इस संघर्ष में ईमान वालों को ईश्वर का समर्थन प्राप्त होता है जबकि विरोधी मानवीय समर्थकों पर भरोसा करते हैं कि जो ईश्वरीय संकल्प के मुक़ाबले में टिकने की क्षमता नहीं रखते।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का कथन है कि ईश्वर पर वास्तविक भरोसे का चिन्ह यह है कि तुम उसके अतिरिक्त किसी अन्य से न डरो, और यही ईमान की कुंजी है।इस आयत से हमने सीखा कि जो ईश्वर मार्गदर्शन करता है वह सहायता भी करता है, अतः हमें केवल उसी पर भरोसा करना चाहिए।ईश्वर के मार्ग पर चलने में कठिनाइयां सहन करनी ही पड़ती हैं, विरोधियों की यातनाओं और बाधाओं के कारण अपने ईमान को नहीं छोड़ना चाहिए। सच्चे ईमान वाला किसी भी स्थिति में सत्य पर आस्था और कर्म को नहीं छोड़ता।आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर १३ और १४ की तिलावत सुनें।وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِرُسُلِهِمْ لَنُخْرِجَنَّكُمْ مِنْ أَرْضِنَا أَوْ لَتَعُودُنَّ فِي مِلَّتِنَا فَأَوْحَى إِلَيْهِمْ رَبُّهُمْ لَنُهْلِكَنَّ الظَّالِمِينَ (13) وَلَنُسْكِنَنَّكُمُ الْأَرْضَ مِنْ بَعْدِهِمْ ذَلِكَ لِمَنْ خَافَ مَقَامِي وَخَافَ وَعِيدِ (14)और काफ़िरों ने अपने पैग़म्बरों से कहा कि निश्चित रूप से हम तुम्हें अपनी धरती से बाहर निकाल देंगे सिवाय इसके कि तुम हमारे धर्म की ओर लौट आओ। तो उनके पालनहार ने उनकी ओर अपना विशेष संदेश भेजा कि निश्चित रूप से हम अत्याचारियों को तबाह कर देंगे। (14:13) और उसके पश्चात तुम्हें धरती में बसाएंगे। यह (स्थिति) उसके लिए है जो मुझसे और मेरे वचन से डरता है। (14:14)जब विरोधी, ईमान वालों के प्रतिरोध और दृढ़ता को देखते थे तो उन्हें और पैग़म्बरों को धमकी देते थे कि यदि उन्होंने अपने धर्म को छोड़ कर उनके धर्म को स्वीकार नहीं किया तो उन्हें, उनकी धरती में रहने का अधिकार नहीं है और उन्हें कहीं और जाकर रहना होगा।किंतु ईश्वर ने, कि जो ईमान वालों का समर्थक है, अपने पैग़म्बरों के पास संदेश भेजा कि वे इस प्रकार की धमकियों से भयभीत न हों क्योंकि इससे पहले कि वे तुम्हें इस स्थान से बाहर निकालें, हम उन्हें दण्डित करके तबाह कर देंगे और शक्ति तथा सत्ता तुम्हारे हाथ में दे देंगे। अल्बत्ता स्पष्ट है कि यह ईश्वरीय वचन उन लोगों के बारे में है जो वास्तव में ईमान वाले होंगे तथा ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य से नहीं डरते होंगे।इन आयतों से हमने सीखा कि ज़ोर-ज़बरदस्ती करने वाले तर्कहीन लोगों की शैली धमकी और देशनिकाला देना है तथा धमकी का उत्तर धमकी से दिया जाना चाहिए।ईश्वर का एक अटल वचन, अत्याचारियों की तबाही तथा भले लोगों की सत्ता है और यह ईश्वरीय वचन अंतिम काल में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के प्रकट होने के बाद व्यवहारिक होगा।काफ़िर, धरती को अपना समझते हैं और ईमान वालों को कोई अधिकार देने के लिए तैयार नहीं होते, जबकि ईश्वर की दृष्टि में मामला इसके विपरीत है और धरती पर ईमान वालों का अधिकार है तथा काफ़िरों का उसमें कोई स्थान नहीं है।