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    सूरए इब्राहीम, आयतें 15-18, (कार्यक्रम 423)

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    आइये पहले सूरए इब्राहीम की आयत नंबर १५ और १६ की तिलावत सुनें।وَاسْتَفْتَحُوا وَخَابَ كُلُّ جَبَّارٍ عَنِيدٍ (15) مِنْ وَرَائِهِ جَهَنَّمُ وَيُسْقَى مِنْ مَاءٍ صَدِيدٍ (16)और उन्हें (ईश्वर की ओर से) विजय की आशा थी जबकि हठधर्मी अत्याचारी निराश रह गए। (14:15) उनका ठिकाना नरक है जहां उन्हें अत्यंत दूषित व दुर्गंध वाले पानी से तृप्त किया जाएगा। (14:16)इससे पहले हमने कहा था कि ईश्वर ने ईमान वालों को वचन दिया कि विरोधियों की धमकियों का कोई प्रभाव नहीं होगा बल्कि वे स्वयं इस संसार में ईश्वरीय कोप में ग्रस्त होकर तबाह हो जाएंगे। यह आयत कहती है कि ईश्वर का यह वचन पूरा हुआ और विरोधियों की इच्छा पूरी न हो सकी तथा वे वंचित ही रह गए। यह उनका सांसारिक दण्ड है जबकि प्रलय में उन्हें इससे भी कड़ा दण्ड मिलेगा इस प्रकार से कि उन्हें भड़कती हुई अग्नि की ज्वालाओं के बीच दूषित पानी पिलाया जाएगा।क़ुरआने मजीद की विभिन्न आयतों में पैग़म्बरों को ईश्वरीय सहायता का वचन दिया गया है किंतु उनकी अंतिम विजय अभी व्यवहारिक नहीं हुई है बल्कि संसार के अंतिम काल में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम के हाथों ईमान वालों को अंतिम विजय प्राप्त होगी, यही कारण है कि सभी धर्मों के वास्तविक ईमान वाले, इस ईश्वरीय वचन के पूरा होने की प्रतीक्षा में रहे हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान वाला कभी भी निराश नहीं होता और सदैव स्थिति के बेहतर होने, अत्याचार की समाप्ति तथा पूरे संसार में न्याय की सरकार की स्थापना की प्रतीक्षा में रहता है।विरोधियों को यह नहीं सोचना चाहिए कि उनकी ओर से दी जाने वाली यातनाएं निरुत्तर रहेंगी। प्रलय के न्यायालय में उन्हें अवश्य दण्डित किया जाएगा।आईए अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर १७ की तिलावत सुनें।يَتَجَرَّعُهُ وَلَا يَكَادُ يُسِيغُهُ وَيَأْتِيهِ الْمَوْتُ مِنْ كُلِّ مَكَانٍ وَمَا هُوَ بِمَيِّتٍ وَمِنْ وَرَائِهِ عَذَابٌ غَلِيظٌ (17)वह उस गंदे पानी को घूंट-घूंट करके पियेगा जबकि उसे निगलना कदापि सरल नहीं होगा और हर ओर से मृत्यु उसके पास आएगी किंतु वह मरेगा नहीं और इसके बाद उसके लिए बहुत ही कड़ा दण्ड होगा। (14:17)यह आयत नरक में काफ़िरों की स्थिति का वर्णन करते हुए कहती है कि वह अपनी प्यास बुझाने के लिए पीप जैसे गंदे पानी को घूंट-घूंट करके पीने पर विवश होंगे। वही लोग जो संसार में मदिरा पान करके मस्त हो जाते थे और ईमान वालों का परिहास किया करते थे आज इस प्रकार अपमानित व दण्डित हुए हैं।दूसरी ओर प्रलय के दिन का दण्ड इतना कड़ा है कि नरकवासी हर क्षण मृत्यु को अपने समक्ष देखता है किंतु प्रलय में मृत्यु नहीं है और नरक में मिलने वाला दण्ड अनंतकालीन होगा।इस आयत से हमने सीखा कि समय बीतने से नरकवासियों का दण्ड सरल नहीं होता कि उन्हें उसकी आदत हो जाए बल्कि जैसे-जैसे समय बीतता जाता है उसका दण्ड अधिक कड़ा होता जाता है।नरक में मृत्यु नहीं होती, वहां दण्ड स्थायी होता है किंतु मृत्यु का कारण नहीं बनता।आइए अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर १८ की तिलावत सुनें।مَثَلُ الَّذِينَ كَفَرُوا بِرَبِّهِمْ أَعْمَالُهُمْ كَرَمَادٍ اشْتَدَّتْ بِهِ الرِّيحُ فِي يَوْمٍ عَاصِفٍ لَا يَقْدِرُونَ مِمَّا كَسَبُوا عَلَى شَيْءٍ ذَلِكَ هُوَ الضَّلَالُ الْبَعِيدُ (18)काफ़िरों के कर्मों की उपमा, उस राख से दी जा सकती है जिस पर एक तूफ़ानी दिन में तेज़ हवा चले। जो कुछ उन्होंने प्राप्त किया है उसमें से एक कण को भी सुरक्षित रखने में वे सक्षम नहीं हैं और यही खुली हुई पथभ्रष्ठता है। (14:18)क़ुरआने मजीद ने अनेक आयतों में काफ़िरों के कर्मों के निरर्थक होने पर बल दिया है और उन्हें पानी पर बनने वाले झाग, हवा में उड़ने वाले कणों तथा राख की उपमा दी है कि जो बहुत जल्द अपना अस्तित्व खो देती है। यह उनके अच्छे कर्मों की बात है तथा उनके बुरे कर्मों का मामला तो अत्यंत स्पष्ट है। उनके अच्छे कर्म उनकी बुराइयों के कारण तबाह हो जाते हैं। इस बात की ओर क़ुरआने मजीद की अनेक आयतों में संकेत किया गया है।और ईमान वालों के लिए ईश्वर की परंपरा यह है कि, तौबा व प्रायश्चित और सुधार की स्थिति में उनके बुरे कर्म भले कर्मों में परिवर्तित हो जाते हैं। क़ुरआने मजीद ने पथभ्रष्ठ लोगों की पथभ्रष्ठता के बारे में विभिन्न प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया है। कभी वह इसे स्पष्ट पथभ्रष्ठता कहा है तो कभी दूर की पथभ्रष्ठता और कभी गहरी पथभ्रष्ठता। इस आयत में वह काफ़िरों की वास्तविकता से दूर की पथभ्रष्ठता की बात करते हुए कहता है, वह सत्य के मार्ग से इतने दूर हो गए हैं कि उनकी वापसी असंभव हो गई है।इस आयत से हमने सीखा कि चूंकि काफ़िरों की अंतरात्मा अपवित्र होती है अतः उनके विदित रूप से भले दिखाई देने वाले कर्म, उस राख की भांति हैं जो एक भड़कती हुई आग के परिणाम स्वरूप सामने आती है और उस आग का अंधकार तथा धुएं के अतिरिक्त कोई परिणाम नहीं होता।काफ़िरों के कर्मों से प्रभावित नहीं होना चाहिए क्योंकि उनका कोई मूल आधार नहीं होता और वे बहुत जल्दी तबाह हो जाते हैं।