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    सूरए इब्राहीम, आयतें 19-22, (कार्यक्रम 424)

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    आइये पहले सूरए इब्राहीम की आयत नंबर १९ और २० की तिलावत सुनें।أَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ بِالْحَقِّ إِنْ يَشَأْ يُذْهِبْكُمْ وَيَأْتِ بِخَلْقٍ جَدِيدٍ (19) وَمَا ذَلِكَ عَلَى اللَّهِ بِعَزِيزٍ (20)क्या तुमने नहीं देखा कि ईश्वर ने आकाशों और धरती की सत्य के साथ सृष्टि की? यदि वह चाहे तो तुम सबको (विनाश की ओर) ले जा सकता है तथा (तुम्हारे स्थान पर) एक नई रचना को ला सकता है। (14:19) तथा यह काम ईश्वर के लिए बिल्कुल कठिन नहीं है। (14:20)इस सूरे की पिछली आयतें ईश्वर के इन्कार तथा कुछ लोगों द्वारा पैग़म्बरों के मत तथा अपने अंत को झुठलाए जाने के संबंध में थीं। ये आयतें उन्हें तथा सभी मनुष्यों को संबोधित करते हुए कहती हैं कि यह मत सोचो कि धरती, आकाशों तथा तुम मनुष्यों का अस्तित्व एक संयोग है और इसका पहले से कोई कार्यक्रम नहीं था बल्कि संपूर्ण सृष्टि और उसकी हर वस्तु ईश्वर की युक्ति और इरादे से अस्तित्व में आई है और यदि ईश्वर चाहे तो मानव जाति को समाप्त करके उसके स्थान पर अपनी किसी अन्य रचना को ला सकता है।इसके अतिरिक्त सृष्टि का एक लक्ष्य व ध्येय है और उसकी रचना अकारण नहीं हुई है कि तुम उसके बारे में इस प्रकार के विचार रखते हो और यह सोचते हो कि तुम जैसा चाहो सृष्टि से लाभ उठाओगे तथा ईश्वर कुछ नहीं कर सकेगा।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर को हमारे अस्तित्व की ही कोई आवश्यकता नहीं है, हमारी उपासनाओं एवं प्रार्थनाओं की तो कोई बात ही नहीं है, अतः हमें ईश्वर के समक्ष घमण्ड और अकड़ से काम नहीं लेना चाहिए।यह संसार मनुष्य के बिना व्यर्थ है, यहां तक कि यदि ईश्वर वर्तमान पीढ़ी को नष्ट भी कर दे तो उसके स्थान पर किसी दूसरी पीढ़ी को ले आएगा।आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर २१ की तिलावत सुनें।وَبَرَزُوا لِلَّهِ جَمِيعًا فَقَالَ الضُّعَفَاءُ لِلَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا إِنَّا كُنَّا لَكُمْ تَبَعًا فَهَلْ أَنْتُمْ مُغْنُونَ عَنَّا مِنْ عَذَابِ اللَّهِ مِنْ شَيْءٍ قَالُوا لَوْ هَدَانَا اللَّهُ لَهَدَيْنَاكُمْ سَوَاءٌ عَلَيْنَا أَجَزِعْنَا أَمْ صَبَرْنَا مَا لَنَا مِنْ مَحِيصٍ (21)(प्रलय में) सभी ईश्वर के समक्ष लाए जाएंगे तो कमज़ोर लोग बलवानों से कहेंगे, हम (संसार में) तुम्हारे अधीन थे, तो क्या आज तुम ईश्वरीय दण्ड के कुछ भाग को हमसे रोक सकते हो? वे कहेंगे, यदि ईश्वर हमारा मार्गदर्शन करता तो हम भी तुम्हारा मार्गदर्शन कर देते। आज चाहे हम उतावलेपन से काम लें या धैर्य से, कोई अंतर नहीं है और हमारी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है। (14:21)मानव समाज में प्रायः साधारण लोग शासकों की नीतियों व कार्यक्रमों के अधीन रहते हैं और स्वाभाविक है कि यदि शासक अक्षम व भ्रष्ठ होंगे तो समाज को तबाही और विनाश की ओर ले जाएंगे, किंतु ईश्वर ने कभी भी इस बात की अनुमति नहीं दी है कि लोग किसी के भी दास बनें। ईश्वर और उसके प्रतिनिधियों की भांति किसी का भी अनुसरण नहीं किया जा सकता और प्रलय के दिन ऐसी कोई बात स्वीकार नहीं की जाएगी।यह आयत कहती है कि वे लोग जो संसार में दूसरों का अंधा अनुसरण करते हैं तथा शासकों की अवैध इच्छाओं का पालन करते हैं, प्रलय में वे उन्हीं लोगों के साथ रहेंगे तथा उन्हीं की भांति उनके पास भी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं रहेगा। अत्याचारी संसार में पैग़म्बरों व धर्म के प्रचारकों से कहते थे कि तुम चाहे हमें नसीहत करो या न करो हमें कोई अंतर नहीं पड़ता। प्रलय में भी वे अपने ऊपर आपत्ति करने वालों के उत्तर में कहेंगे कि चाहे हम रोएं-चिल्लाएं या धैर्य से काम लें, हमारी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि समाज के नेताओं का मार्गदर्शित या पथभ्रष्ठ होना, लोगों के कल्याण अथवा तबाही में प्रभावी भूमिका रखता है।वे लोग जो संसार में अत्याचारी प्रवृत्ति रखते हैं और यह सोचते हैं कि वे जो चाहे कर सकते हैं, वही प्रलय में इस बात को स्वीकार करेंगे कि उनमें कुछ भी करने की क्षमता नहीं है।आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर २२ की तिलावत सुनें।وَقَالَ الشَّيْطَانُ لَمَّا قُضِيَ الْأَمْرُ إِنَّ اللَّهَ وَعَدَكُمْ وَعْدَ الْحَقِّ وَوَعَدْتُكُمْ فَأَخْلَفْتُكُمْ وَمَا كَانَ لِي عَلَيْكُمْ مِنْ سُلْطَانٍ إِلَّا أَنْ دَعَوْتُكُمْ فَاسْتَجَبْتُمْ لِي فَلَا تَلُومُونِي وَلُومُوا أَنْفُسَكُمْ مَا أَنَا بِمُصْرِخِكُمْ وَمَا أَنْتُمْ بِمُصْرِخِيَّ إِنِّي كَفَرْتُ بِمَا أَشْرَكْتُمُونِ مِنْ قَبْلُ إِنَّ الظَّالِمِينَ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (22)जब (प्रलय में लोगों के कर्मों के हिसाब-किताब का) काम समाप्त हो जाएगा, तो शैतान (नरकवासियों से) कहेगा, ईश्वर ने तुमसे सच्चा वादा किया था और मैंने भी तुमसे वादा किया था (किंतु) उसे तोड़ दिया। तुम पर मेरा कोई अधिकार और वर्चस्व नहीं था मैंने तो बस तुम्हें निमंत्रण दिया और तुमने स्वीकार कर लिया तो मुझे बुरा-भला मत कहो बल्कि अपने आपको धिक्कारो। (आज) न तो मैं तुम्हारी सहायता कर सकता हूं और न ही तुम मेरी सहायता करने वाले हो, निश्चित रूप से मैं इस बात से विरक्त हूं कि तुमने मुझे ईश्वर का समकक्ष बना दिया। निःसंदेह अत्याचारियों के लिए अत्यंत कड़ा दण्ड है। (14:22)क़ुरआने मजीद की आयतों से पता चलता है कि प्रलय में पापी व अपराधी, अपने पापों व अपराधों के बहाने तलाश करेंगे तथा हर बार किसी न किसी को अपनी पथभ्रष्ठता का कारण बताएंगे। पिछली आयत में पापियों ने समाज के भ्रष्ठ नेताओं को संबोधित किया था और उन्हें अपने पापों में सहभागी बताया था। यह आयत शैतान के बारे में कहती है कि पापी अपने पापों के लिए उसे दोषी व उत्तरदायी बताएंगे किंतु रोचक बात यह है कि स्वयं शैतान इस प्रकार के आरोपों को स्वीकार नहीं करेगा और कहेगा कि यदि मैंने तुम्हें अच्छे भविष्य का वचन दिया था तो ईश्वर ने भी तो मुझसे पहले तुमको ऐसा वचन दे रखा था, तुमने मेरा अनुसरण क्यों किया?इसके अतिरिक्त शैतान यह भी कहेगा कि मैंने तुम्हें पाप करने के लिए विवश तो नहीं किया था, बल्कि मैंने तो पाप के लिए केवल तुम्हें उकसाया था और तुमने स्वयं अपने अधिकार और अपनी इच्छा से पाप किया था अतः मुझे क्यों धिक्कार रहे हो। यह प्रलय का न्यायालय है, मुझे अपने किए पर पछतावा है और मैं इस बात से विरक्त हूं कि तुमने मुझे ईश्वर का समकक्ष माना और उसी की भांति मेरा अनुसरण किया।एक दूसरे से विरक्तता जताना, नरकवासियों की विशेषता है और वे नरक में एक दूसरे को धिक्कारेंगे तथा अपने पापों के लिए दूसरों को दोषी ठहराएंगे।इस आयत से हमने सीखा कि शैतान का काम, मनुष्य को पाप के लिए उकसा कर उसे धोखा देना है, वह पाप के लिए विवश नहीं करता, अतः हमें अपने पापों के लिए शैतान को दोषी नहीं ठहराना चाहिए।जिस बात में ईश्वर प्रसन्न न हो, उसमें उसके अतिरिक्त किसी अन्य का अनुसरण एक प्रकार का शिर्क अर्थात किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराना है।शैतान का अनुसण वस्तुतः अपने आप और ईश्वरीय पैग़म्बरों पर अत्याचार है कि जिन्होंने मानवता के मार्गदर्शन के लिए बड़ी कठिनाइयां सहन की हैं।