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    सूरए इब्राहीम, आयतें 23-27, (कार्यक्रम 425)

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    आइये पहले सूरए इब्राहीम की आयत नंबर 23 की तिलावत सुनें।وَأُدْخِلَ الَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا بِإِذْنِ رَبِّهِمْ تَحِيَّتُهُمْ فِيهَا سَلَامٌ (23)और जो लोग ईमान लाए हैं और अच्छे कार्य किये हैं उन्हे ऐसे बाग़ों में भेजा जिस के नीचे से नहरें बह रही हैं जिसमें वे अपने पालनहार की अनुमति से सदैव रहने वाले हैं और वहां एक दूसरे के लिए उनका अभिनन्दन, सलाम होगा। (14:23) नरकवासियों के मुक़ाबले में जिन्हें यातना के साथ नरक की ओर ले जाया जा रहा होगा, स्वर्गवासियों को विशेष व्यवस्था व औपचारिकता तथा सम्मान के साथ स्वर्ग में भेजा जाएगा और ईश्वर की इच्छा है कि वे सदैव स्वर्ग में रहें किंतु यह भी स्पष्ट है कि स्वर्ग हर एक को मिलने वाला नहीं हैं बल्कि ईश्वर के विशिष्ट बन्दों के साथ रहने योग्य वही होगा जिसके हृदय में ईमान होगा और जो ईमान के साथ ही अच्छे कार्य करेगा और सदैव अच्छे कार्य करने के प्रयास में रहेगा। इस आयत से हमने सीखा कि दूसरों को सलाम करना, स्वर्ग का शिष्टाचार है और ईश्वर ने ईमान वालों से कहा है कि वे इस संसार में भी एक दूसरे को सलाम करें और उनका अभिनन्दन करें।यद्यपि इस संसार में मनुष्य की आयु कम और समाप्त हो जाने वाली है किंतु यदि सुकर्मियों को अमरत्व भी प्राप्त हो जाता तब भी वे सदैव ईश्वर पर ईमान रखते और अच्छे कार्य करते । ईश्वर ऐसे लोगों को सदैव रहने वाला फल व पुरस्कार प्रदान करता है। आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर 24 और 25 की तिलावत सुनते हैः أَلَمْ تَرَ كَيْفَ ضَرَبَ اللَّهُ مَثَلًا كَلِمَةً طَيِّبَةً كَشَجَرَةٍ طَيِّبَةٍ أَصْلُهَا ثَابِتٌ وَفَرْعُهَا فِي السَّمَاءِ (24) تُؤْتِي أُكُلَهَا كُلَّ حِينٍ بِإِذْنِ رَبِّهَا وَيَضْرِبُ اللَّهُ الْأَمْثَالَ لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ (25)क्या तुमने नहीं देखा कि ईश्वर ने किस प्रकार से उदाहरण दिया है? पवित्र कथन, पवित्र वृक्ष की भांति होता होता है जिसकी जड़ें स्थिर और शाखाएं आकाश में होती हैं। (14:24) जो अपने पालनहार की अनुमति से सदैव फल देता है ईश्वर लोगों के लिए उदाहरण देता है ताकि शायद उन्हें याद आ जाए और पाठ ले लें। (14:25) ईश्वर ने इन आयतों में ईमान और सही आस्था को हर प्रकार के रोग से दूर उस हरे भरे वृक्ष की भांति बताया है जिसकी जड़ें भूमि में गहराई तक पहुंची और सुदृढ़ हैं और उसमें अच्छे फल अत्यधिक मात्रा में होते हैं जो वास्तव में ईमान रखने वालों के अच्छे कर्म हैं। इस प्रकार का ईमान और आस्था सदैव विकसित होता रहता है और समाज के विभिन्न वर्गों को लाभ पहुंचाने के लिए प्रयासरत रहता है और उस से दूसरों को पहुंचने वाला सब से कम लाभ यह है कि लोग उस की छाया में आराम करते हैं। अन्य वस्तुओं से ईमान की तुलना में कहना चाहिए कि ईमान व आस्था वह वृक्ष है जिसमें सदैव चाहे संसार में या परलोक में हो, फल लगते हैं किंतु शक्ति, धन, संतान और पद वह वृक्ष है जो केवल इसी संसार में वह भी अल्पावधि के लिए फल देते हैं। इस आयत से हमने सीखा कि ईमान व आस्था के वृक्ष में सदैव फल लगते हैं और उस पर मौसमों का प्रभाव नहीं होता।सत्य कथन सदैव स्थिर, सुदृढ़ व अडिग होता है क्योंकि सत्य स्थाई व सदैव रहने वाला होता है।आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर 26 की तिलावत सुनें।

    وَمَثَلُ كَلِمَةٍ خَبِيثَةٍ كَشَجَرَةٍ خَبِيثَةٍ اجْتُثَّتْ مِنْ فَوْقِ الْأَرْضِ مَا لَهَا مِنْ قَرَارٍ (26)और बुरा कथन उस बुरे वृक्ष की भांति होता है जो भूमि से उखड़ गया हो और जिसमें स्थिरता न हो। (14:26)एकेश्वरवाद पर आस्था के मुक़ाबले में जो एक पवित्र व समृद्ध आस्था है, नास्तिकता अनेकश्वरवाद और गलत आस्थाएं उन गलत व बुरी तथा निराधार बातों की भांति हैं जो जो अपवित्र लोगों के मुख से निकलती हैं और वह बाक़ी रहने वाली नहीं होती। यह अधंविश्वास और कथन पत्तों से भरी झाड़ियों की भांति होते हैं कि जिन में न तो फल लगता है और न ही उनकी जड़े भूमि में गहराई तक होती हैं या फिर वह उस घास फूस की भांति होते हैं जो लाभदायक पौधों के विकास में बाधा भी उत्पन्न करती हैं। इस आयत से हमने सीखा कि उदाहरणों व उपमाओं द्वारा सत्य व असत्य की तुलना करना, युवा पीढ़ी की शिक्षा का एक मार्ग है।ईश्वर को मानने वालों को अपने विरोधियों की विदित रूप से दिखाई देने वाली शक्ति व विकास की चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि असत्य जाने वाला और सत्य बाक़ी रहने वाला है। आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर 27 की तिलावत सुनें।يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آَمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَفِي الْآَخِرَةِ وَيُضِلُّ اللَّهُ الظَّالِمِينَ وَيَفْعَلُ اللَّهُ مَا يَشَاءُ (27) ईश्वर लोक-परलोक में, ईमान रखने वालों को सुदृढ़ कथन से, अडिग बनाता है और ईश्वर अत्याचारियों को पथभ्रष्ट करता है और ईश्वर जो चाहता है, करता है। (14:27) सत्य व असत्य कथन तथा आस्तिकता व नास्तिकता की तुलना के पश्चात ईश्वर इस आयत में कहता है कि ईमान वालों को जान लेना चाहिए कि ईश्वन उन्हें उनके ईमान द्वारा स्थायित्व स स्थिरता प्रदान करता है और उनके संदर्भ में विरोधियों के षडयन्त्रों व कार्यक्रमों को प्रभावी नहीं होने देता और वह विरोधियों की योजनाओं पर पानी फेर देता है और उन्हें उनके लक्ष्य तक पहुंचने नहीं देता। यह ईश्वरीय परंपरा है कि वह जो चाहता है और अपनी तत्वदर्शिता व असीम ज्ञान के आधार पर जिस काम को उचित समझता है वह काम करता है और इसमें कोई व्यक्ति अथवा वस्तु बाधा नहीं बन सकती। इस आयत से हमने सीखा कि यदि ईश्वर की सहायता न हो तो ईमान वाले भी शैतानी उकसावे और बाहरी धमकियों व लालसाओं के सामने हथियार डाल देंगे और हार जाएगें।ईश्वरीय सहायता व कृपा का पात्र बनना या इसके विपरीत उसके आक्रोश का शिकार बनना उस मार्ग पर निर्भर है जिसका मनुष्य अपने जीवन के लिए चयन करता है।