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    सूरए इब्राहीम, आयतें 28-31, (कार्यक्रम 426)

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    आइये पहले सूरए इब्राहीम की आयत नंबर 28 और 29 की तिलावत सुनें।أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ بَدَّلُوا نِعْمَةَ اللَّهِ كُفْرًا وَأَحَلُّوا قَوْمَهُمْ دَارَ الْبَوَارِ (28) جَهَنَّمَ يَصْلَوْنَهَا وَبِئْسَ الْقَرَارُ (29)क्या तुमने नहीं देखा उन लोगों को जिन्होंने ईश्वरीय नेमतों को ईश्वर के इन्कार से बदल लिया और अपनी जाति को विनाश का पात्र बना दिया। (14:28) वे नरक में प्रविष्ट हुए जो बुरा ठिकाना है। (14:29)यह आयत भ्रष्ट व अत्याचारी नेताओं व शासकों के बारे में है कि जो नास्तिकता व इन्कार द्वारा समाज को विनाश की ओर बढ़ाते हैं वे एकेश्वरवाद के स्थान पर अनेकेश्वरवाद व नास्तिकता को प्रचलित करते हैं और अपने पूर्वजों की विरासत की रक्षा के नाम पर अतीत की कुरीतियों व अधंविश्वासों का प्रचार करते और समाज को सत्य के मार्ग पर चलने से रोकते हैं।साधारण लोग भी जिनकी बुद्धि पर संसारिक जीवन की चमक दमक छायी रहती है, वह इन भ्रष्ट नेताओं की विदित शक्ति व संपन्नता से अत्याधिक प्रभावित होते हैं और ईश्वर के योग्य व चुने हुए सुकर्मी मार्गदर्शकों के अनुसरण के स्थान पर इस प्रकार के नेताओं के पीछे चलने लगते हैं। स्वाभाविक है इस प्रकार के समाज का अंत जिसके नेता भ्रष्ट और लोग अंधा अनुसरण करने वाले हों विनाश की खांई में गिरना ही होगा जो प्रलय के दिन आग के रूप में उनके सामने होगा। इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय नेमतों और चिन्हों में हर प्रकार का फेर-बदल और परिवर्तन ईश्वर का इन्कार करने के समान है भले ही यह काम धर्म के नाम पर हो।अत्याचार व नास्तिकता प्रलय के दिन ही नहीं बल्कि इस संसार में भी समाज का सर्वनाश कर देती है। आइए अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर 30 की तिलावत सुनें। وَجَعَلُوا لِلَّهِ أَنْدَادًا لِيُضِلُّوا عَنْ سَبِيلِهِ قُلْ تَمَتَّعُوا فَإِنَّ مَصِيرَكُمْ إِلَى النَّارِ (30)उन लोगों ने ईश्वर के लिए सहभागी बना दिये ताकि लोगों को पथभ्रष्ट कर सकें, (हे पैग़म्बर!) आप उनसे कह दीजिए कि (कुछ दिन) आनन्द उठा लो कि तुम्हारा ठिकाना तो आग ही है। (14:30) पिछली आयतों में हमने कहा कि भ्रष्ट नेता, ईश्वरीय नेमतों का इन्कार करते और समाज को भ्रष्ट बनाते हैं । इस आयत में इसके एक उदाहरण के उल्लेख के साथ कहा गया है कि जो लोग लोगों को ईश्वरीय आदेशों के पालन का निमंत्रण देने के स्थान पर स्वंय को ही ईश्वर के स्थान पर रख लेते और लोगों को अपना अंधा अनुसरण करने पर विवश करते हैं वास्तव में यह लोग स्वये को ईश्वर के समान दर्शाते हैं ताकि अपने सांसारिक उद्देश्यों की पूर्ति कर सकें किंतु यह भी स्पष्ट है कि इस प्रकार के लोग केवल संसार में ही सफलता प्राप्त कर सकते हैं किंतु परलोक में वे नरक की आग में ढकेल दिये जाएंगे। इस आयत से हमने सीखा कि मानव द्वारा बनाया गया हर नियम, जो ईश्वरीय आदेशों के विपरीत हो, एक प्रकार का अनेकेश्वरवाद है और इससे समाज पथभ्रष्टता में ग्रस्त हो जाता है।हर प्रकार का सुख व सफलता ईश्वरीय कृपा का चिन्ह नहीं है बल्कि कभी कभी तो सुख सुविधा व सफलता ईश्वरीय प्रकोप की भूमिका भी हो सकती है।आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर 31 की तिलावत सुनें।قُلْ لِعِبَادِيَ الَّذِينَ آَمَنُوا يُقِيمُوا الصَّلَاةَ وَيُنْفِقُوا مِمَّا رَزَقْنَاهُمْ سِرًّا وَعَلَانِيَةً مِنْ قَبْلِ أَنْ يَأْتِيَ يَوْمٌ لَا بَيْعٌ فِيهِ وَلَا خِلَالٌ (31)(हे पैग़म्बर!) मेरे उन दासों से, जो ईमान लाए हैं कह दीजिए कि नमाज़ स्थापित करें और हमने उन्हें जो अजीविका प्रदान की है उस में से गुप्त और खुले रूप में दान करें उस दिन के आने से पूर्व जिस दिन न तो लेन-देन काम आया है और न ही मित्रता। (14:31)नरक में जाने वाले नेताओं और उन के अनुसरणकर्ताओं की पिछली आयतों में बात करने के बाद इस आयत में ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्ल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहा है कि मेरी आज्ञापालन करने वाले मेरे दासों को सही मार्ग दिखाइए कि जो नमाज़ पढ़ना और दान व ज़कात देना है। यदि अत्याचारी शासक लोगों को अपनी दासता पर विवश करते हैं तो आप, लोगों को मेरे आज्ञापालन का आह्ववान कीजिए और ईश्वर का दास बनने का मार्ग, कि जो नमाज़ पढ़ना और ज़कात रूपी दान देना है, उन्हें दिखाइये।यदि संसार में रिश्वत और मित्रता कुछ समस्याओं का समाधान कर देती है तो प्रलय में धन दौलत और जान पहचान किसी काम की नहीं है। वहां पर केवल अच्छे कर्म ही काम आएंगे और यह अच्छे कर्म लोगों से जितने छिपे होगें उनमें शुद्धता उतनी ही अधिक होगी और दिखावे की भावना से भी दूर रहेंगे।अलबत्ता कभी कभी आवश्यक है कि दान-दक्षिणा खुल कर की जाए ताकि इस प्रकार से बच्चों का प्रशिक्षण भी हो और अच्छे कामों और अन्य लोगों की सहायता के लिए दूसरों को प्रोत्साहन भी मिले।क़ुरआन के कुछ समीक्षकों का कहना है कि ख़ुम्स और ज़कात आदि जैसे अनिवार्य दान, खुले रूप में किये जाने चाहिए ताकि मनुष्य अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन न करने के आरोपों से मुक्त रह सके किंतु अनिवार्य दानों के अतिरिक्त जो दान हो उसे गुप्त रूप से किया जाना चाहिए ताकि दानकर्ता के भीतर ईश्वर के लिए ही काम करने की भावना प्रबल हो। स्पष्ट है कि दान का अर्थ केवल धन व दौलत देना ही नहीं है ताकि यह अवसर केवल धनवानों के लिए ही हो बल्कि जो कुछ भी हमारे पास चाहे जिस मात्रा में हो, भले ही कम हो उससे दूसरों की सहायता करनी चाहिए। इस आयत से हमने सीखा कि मोमिनों और धर्म में आस्था रखने वालों के लिए ईश्वर की दासता गौरव है क्योंकि यह समस्त ससांरिक व भौतिक बंधनों से छुटकारा दिलाती है।इस्लाम व्यापक धर्म है जिसमें ईश्वर से संबधों के साथ ही लोगों से भी संबंध की सिफारिश की गयी है और नमाज़ व दान में से प्रत्येक को एक दूसरे को ईश्वर द्वारा स्वीकार किये जाने का प्रतीक बनाया गया है।हमें अपने कर्मों के मामले में ईश्वर से सौदा करना चाहिए कि यह प्रलय के दिन हमारे हित में होगा, जिस दिन किसी भी प्रकार का लेनदेन व सौदा काम नहीं आएगा।