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    सूरए इब्राहीम, आयतें 32-35, (कार्यक्रम 427)

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    आइये पहले सूरए इब्राहीम की आयत नंबर 32 और 33 की तिलावत सुनें।اللَّهُ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَأَنْزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَخْرَجَ بِهِ مِنَ الثَّمَرَاتِ رِزْقًا لَكُمْ وَسَخَّرَ لَكُمُ الْفُلْكَ لِتَجْرِيَ فِي الْبَحْرِ بِأَمْرِهِ وَسَخَّرَ لَكُمُ الْأَنْهَارَ (32) وَسَخَّرَ لَكُمُ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَ دَائِبَيْنِ وَسَخَّرَ لَكُمُ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ (33)ईश्वर ही है जिसने आकाशों और पृथ्वी की रचना की और आकाश से जल बरसाया और उस से तुम्हारे लिए फलों की आजीविका बनाई और तुम्हारे नियंत्रण में नौकाओं को दिया ताकि वह ईश्वर के आदेश से समुद्र में चलें और तुम्हारे नियंत्रण में नदियां दे दीं। (14:32) और सूर्य व चंद्रमा पर तुम्हें नियंत्रण दिया तथा रात व दिन को भी तुम्हारे नियंत्रण में दे दिया। (14:33)इससे पहले हमने कहा था कि ईश्वर ने अपने दासों की सफलता व कल्याण के लिए उन्हें नमाज़ और दान व दक्षिणा का आदेश दिया है। अब इस आयत में कहा जाता है कि नमाज़ पढ़ो उस ईश्वर के सामने कि जिसने इस महान सृष्टि की रचना की है और ईश्वर के लिए दान करो क्योंकि तुम्हारे पास खाने पीने के लिए जो कुछ है सब उसी का दिया हुआ है।इस आयत में तीन आयामों से मानव जीवन में जल की भूमिका की ओर संकेत किया गया है। एक वर्षा का जल जो धरती व विभिन्न प्रकार के पेड़ पौधों व साग सब्जियों और फलों के अस्तित्व के लिए अत्याधिक आवश्यक और मूल तत्व है। दूसरा आयाम समुद्रों का जल है जो विभिन्न प्रकार के जलीय जीव-जंतुओं के जीवन के लिए आवश्यक होने के साथ ही साथ सस्ते परिवहन का मुख्य साधन है। यहां तक कि आज भी जब मानव ने भारी व विशालकाय मालवाहक विमान बना लिए हैं सब से अधिक सामानों का स्थानान्तरण सागर के मार्ग से ही होता है जिसे ईश्वर ने मानव के नियंत्रण में दिया है। तीसरे आयाम में ईश्वर ने इस आयत में नदियों की ओर संकेत किया है जो कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सींचाई के काम आती हैं और यह वास्तव में सूखे क्षेत्रों तक जल पहुचने का मुख्य साधन हैं। इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय नेमतों में जल सब से अधिक महत्वपूर्ण है जिसकी मानवजीवन में विभिन्न आयामें से कई भूमिकाएं हैं। प्रकृति को ईश्वर के नियंत्रण में समझना चाहिए पूरी प्रकृति ईश्वर के आदेश के अधीन है।केवल पृथ्वी ही नहीं बल्कि चांद व सूरज तथा अन्य वस्तुएं भी मानव जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तथा उसकी आवश्यकता के अनुसार बनाई गयी हैं। अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर 34 की तिलावत सुनते हैः وَآَتَاكُمْ مِنْ كُلِّ مَا سَأَلْتُمُوهُ وَإِنْ تَعُدُّوا نِعْمَةَ اللَّهِ لَا تُحْصُوهَا إِنَّ الْإِنْسَانَ لَظَلُومٌ كَفَّارٌ (34)ईश्वर ने हर वह वस्तु तुम्हें प्रदान की जो तुमने उससे मांगी और यदि तुम ईश्वर की नेमतों को गिनना चाहोगो तो नहीं गिन पाओगे और मनुष्य तो अत्याधिक अत्याचारी व अकृतज्ञ है। (14:34) पिछली आयतों में धरती व आकाश में ईश्वर की नेमतों के वर्णन को आगे बढ़ाते हुए इस आयत में कहा जाता है कि ईश्वर ने तुम्हारी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति की है जिनको मनुष्य गिन भी नहीं सकता किंतु इस के बावजूद वह ईश्वर के प्रति आभार प्रकट नहीं करता और उस की ओर से प्रदान की गयी नेमतों और कृपाओं का सदुपयोग नहीं करता। वह अपनी आंख कान और ज़बान को ईश्वर की अवज्ञा के लिए प्रयोग करता है और अपने अस्तित्व में मौजूद ईश्वरीय नेमतों पर अत्याचार करता है। इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने सारी सुविधाएं मनुष्य को दी हैं और यदि कोई कमी है तो उसका कारक स्वंय मनुष्य है और वास्तव में वह मनुष्य के एक दूसरे पर अत्याचार व एक दूसरे के प्रति अन्याय का परिणाम है।वह मनुष्य जिसमें ईश्वर की कृपाओं और नेमतों को गिनने की भी शक्ति नहीं है उसमें किस प्रकार से इन कृपाओं के लिए ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने की क्षमता हो सकती है। आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर 35 की तिलावत सुनें।وَإِذْ قَالَ إِبْرَاهِيمُ رَبِّ اجْعَلْ هَذَا الْبَلَدَ آَمِنًا وَاجْنُبْنِي وَبَنِيَّ أَنْ نَعْبُدَ الْأَصْنَامَ (35)और जब इब्राहीम ने कहा हे पालनहार इस नगर को शांत बना दे और मुझे और मेरी संतान को मूर्ति पूजा से दूर रख। (14:35)इस सूरे का नाम इब्राहीम है और इस स्थान के बाद हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की जीवनी और ईश्वर से उन की प्रार्थनाओं पर प्रकाश डाला जाता है। हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माईल के हाथों काबे के पुनर्निमाण के बाद हज़रत इब्राहीम ने बहुत सी प्रार्थनाएं की हैं और उसमें ईश्वर से अपनी बहुत सी इच्छाओं का वर्णन हुआ है। इसी लिए इस आयत में ईश्वर से हज़रत इब्राहीम की पहली प्रार्थना, मक्का नगर को शांत रखने से संबधित है जिस पर कुरआन मजीद की अन्य आयतों में बल दिया गया है।स्पष्ट है कि जिस स्थान को विश्ववासियों के लिए ईश्वर की उपासना और एकीश्वरवाद के केन्द्र के रूप में स्थापित होना है उस में शांति होना चाहिए ताकि लोगों द्वारा एक दूसरे पर अत्याचार की भूमिका प्रशस्त न हो और न केवल मनुष्य बल्कि इस क्षेत्र के पशु-पक्षियों और पेड़ पौधों का भी विशेष महत्व हो। हज़रत इब्राहीम की यह दुआ स्वीकार की गयी और मक्का नगर आज भी एक सुरक्षित व शांतिपूर्ण क्षेत्र के रूप में समझा जाता है। ईश्वर ने भी वचन दिया है कि इस नगर को बुरा इरादा रखने वालों से सुरक्षित रखेगा।यहां पर रोचक तथ्य यह है कि यद्यपि हज़रत इब्राहीम मूर्ति पूजा का विरोध करने वाले सर्वप्रथम व्यक्ति हैं किंतु फिर भी वे एकेश्वरवाद के मार्ग पर डटे रहने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनके वंश को हर प्रकार के अनेकेश्वरवाद और मूर्ति पूजा से दूर रखे।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय मार्गदर्शकों को लोगों के लिए शांति व सुरक्षा तथा ईश्वर की उपासना के लिए उचित वातावरण की चिंता रहती है।मनुष्य को सदैव पथभ्रष्टता का ख़तरा रहता है इस लिए हमें प्रयास करना चाहिए कि दुआ द्वारा स्वयं को ईश्वर के हवाले कर दें और उससे प्रार्थना करें कि वह हमारी और हमारे वंश की रक्षा करे।