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    सूरए इब्राहीम, आयतें 36-39, (कार्यक्रम 428)

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    आइये पहले सूरए इब्राहीम की आयत नंबर ३६ की तिलावत सुनें।رَبِّ إِنَّهُنَّ أَضْلَلْنَ كَثِيرًا مِنَ النَّاسِ فَمَنْ تَبِعَنِي فَإِنَّهُ مِنِّي وَمَنْ عَصَانِي فَإِنَّكَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (36)प्रभुवर! इन मूर्तियों ने बहुत अधिक लोगों को पथभ्रष्ठ किया है तो जो कोई मेरा अनुसरण करे तो वह मुझ से है और जो मेरा विरोध करे तो निश्चित रूप से तू बड़ा कृपालु और दयावान है। (14:36)इससे पहले हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की प्रार्थना का उल्लेख किया गया था जिसमें उन्होंने ईश्वर से चाहा था कि वह उन्हें तथा उनकी संतान को मूर्ति पूजा से दूर रखे। इस आयत में उनकी प्रार्थना को जारी रखते हुए कहा गया है कि मूर्तियों का आकर्षण तथा लोगों की अज्ञानता के कारण लोग अनन्य एवं सक्षम ईश्वर को भुला बैठे तथा जीवन के सभी मामलों में मार्गदर्शन का कारण बनने वाली ईश्वरीय पैग़म्बरों की शिक्षाओं का पालन करने के स्थान पर मूर्तियों के आगे शीष नवा कर प्रसन्न होने लगे।यही कारण था कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने मूर्तियों को तोड़ने का निश्चय किया किंतु साथ ही उनकी महानता ने उन्हें इस बात की अनुमति नहीं दी कि वे मूर्ति पूजा करने वालों को श्राप दें और ईश्वर से उन्हें दण्डित करने का आग्रह करें। इसके स्थान पर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उनके लिए ईश्वरीय दया व क्षमा की प्रार्थना की।इस आयत से हमने सीखा कि धार्मिक संबंध, पारीवारिक संबंधों पर प्राथमिकता रखते हैं। ईमान वाला व्यक्ति पैग़म्बर के परिजनों में समझा जाता है चाहे उससे उसका कोई पारिवारिक संबंध न हो और इसी प्रकार काफ़िर को पैग़म्बर का परिजन नहीं माना जाता चाहे वह उसका पुत्र ही क्यों न हो।यदि कला पथभ्रष्ठ लोगों के हाथ में रहे तो लोगों की पथभ्रष्ठता का कारण बन जाती है जिस प्रकार से मूर्तिकारों ने अपनी मूर्तियों को बेचने के लिए उन्हें ईश्वर बना कर लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया।आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर ३७ की तिलावत सुनें।رَبَّنَا إِنِّي أَسْكَنْتُ مِنْ ذُرِّيَّتِي بِوَادٍ غَيْرِ ذِي زَرْعٍ عِنْدَ بَيْتِكَ الْمُحَرَّمِ رَبَّنَا لِيُقِيمُوا الصَّلَاةَ فَاجْعَلْ أَفْئِدَةً مِنَ النَّاسِ تَهْوِي إِلَيْهِمْ وَارْزُقْهُمْ مِنَ الثَّمَرَاتِ لَعَلَّهُمْ يَشْكُرُونَ (37)प्रभुवर! मैंने अपनी संतान को इस बंजर भूमि में तेरे सम्मानीय घर के निकट बसा दिया है। प्रभुवर! (ऐसा मैंने इस लिए किया) ताकि वे नमाज़ स्थापित करें तो कुछ लोगों के ह्रदय इनकी ओर झुका दे और विभिन्न प्रकार के फलों से इन्हें आजीविका दे, कदाचित ये तेरे प्रति कृतज्ञ रह सकें। (14:37)हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने ईश्वर के आदेश पर अपनी पत्नी और अपने नवजात शिशु इस्माईल को मक्के के क्षेत्र में बसा दिया और स्वयं वर्तमान सीरिया के क्षेत्र की ओर लौट गए। चूंकि मक्के का क्षेत्र बंजर व सुनसान था अतः उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की कि वह उनके परिजनों को विभिन्न प्रकार की विभूतियां प्रदान करे तथा उस क्षेत्र के बंजारे उन्हें सह्रदयता के साथ स्वीकार करें।यहां ध्यान योग्य बात यह है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने मक्के में अपने आगमन का कारण काबे का पुनर्निर्माण अथवा हज या उमरा नहीं बताया बल्कि उन्होंने कहा कि मेरा लक्ष्य नमाज़ स्थापित करना है और काबा, ईश्वर की उपासना का केंद्र है।इसी प्रकार बंजर क्षेत्र में काबे के स्थित होने का कारण यह है कि लोगों की परीक्षा ली जा सके क्योंकि यदि यह पवित्र स्थान किसी मनमोहक जगह होता तो बहुत से लोग ईश्वर की उपासना के लिए नहीं बल्कि पर्यटन के लिए इस स्थान पर आते।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय आदेश के पालन के लिए कभी अपने देश से पलायन करना और बहुत से सुखों से वंचित होना पड़ता है।लोगों के ह्रदय, ईश्वर के हाथ में हैं, अनुचित मार्गों से लोकप्रियता प्राप्त करने के प्रयासों के स्थान पर हमें ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें लोकप्रिय बनाए।आइए अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर ३८ की तिलावत सुनें।رَبَّنَا إِنَّكَ تَعْلَمُ مَا نُخْفِي وَمَا نُعْلِنُ وَمَا يَخْفَى عَلَى اللَّهِ مِنْ شَيْءٍ فِي الْأَرْضِ وَلَا فِي السَّمَاءِ (38)प्रभुवर! तू हर उस बात से अवगत है जिसे हम छिपाते या प्रकट करते हैं और धरती तथा आकाश की कोई भी वस्तु ईश्वर से छिपी हुई नहीं है। (14:38)हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम मक्के के लोगों पर ईश्वरीय अनुकंपाओं में वृद्धि तथा उनके बीच प्रेम उत्पन्न होने के संबंध में ईश्वर से अपनी प्रार्थना को जारी रखते हुए कहते हैं कि प्रभुवर! तू हर बात से अवगत है और कोई भी वस्तु तुझ से छिपी हुई नहीं है, चाहे वह मनुष्य की नीयत व उसके कर्म हों अथवा सृष्टि व प्रकृति से संबंधित बातें हों।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर का ज्ञान अत्यंत व्यापक व अनंत है तथा उसमें छोटी-बड़ी, गुप्त व प्रकट हर बात एक समान है।हम जो भी अच्छे कर्म करते हैं उन पर हमें घमण्ड नहीं करना चाहिए क्योंकि ईश्वर हमारी मनोदशा से पूर्ण रूप से अवगत है।आइए अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर ३९ की तिलावत सुनें।الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي وَهَبَ لِي عَلَى الْكِبَرِ إِسْمَاعِيلَ وَإِسْحَاقَ إِنَّ رَبِّي لَسَمِيعُ الدُّعَاءِ (39)समस्त प्रशंसा है उस ईश्वर के लिए जिसने बुढ़ापे में मुझे इस्माईल और इस्हाक़ को प्रदान किया। निश्चित रूप से मेरा पालनहार प्रार्थना को सुनने (तथा उसे स्वीकार करने) वाला है। (14:39)हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ईश्वर से अपनी संतान के लिए प्रार्थना करने के साथ ही उन्हें प्रदान करने के लिए ईश्वर का आभार भी प्रकट करते हैं क्योंकि ईश्वर ने बुढ़ापे में हज़रत इस्माईल को प्रदान किया था। यह हज़रत इब्राहीम की प्रार्थनाओं का ही फल था कि ईश्वर ने उन्हें बुढ़ापे में इस्माईल समान पुत्र दिया।रोचक बात यह है कि हज़रत इब्राहीम के दोनों पुत्रों अर्थात हज़रत इस्माईल तथा हज़रत इस्हाक़ अलैहिमस्सलाम से पैग़म्बरी का वंश चला। यद्यपि इनमें से एक की माता दासी और दूसरे की साधारण स्त्री थी किंतु चूंकि वे दोनों अत्यंत पवित्र थे अतः उनके बाद के सभी पैग़म्बर उन्हीं के वंश में आए।इस आयत से हमने सीखा कि संतान, ईश्वरीय भेंट है और इसके लिए हमें ईश्वर का कृतज्ञ रहना चाहिए तथा संतान के भविष्य के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।अनुकंपाओं के उल्लेख के समय ईश्वर के प्रति कृतज्ञता जतानी चाहिए और सभी अनुकंपाओं को उसी की ओर से समझना चाहिए।