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    सूरए इब्राहीम, आयतें 4-6, (कार्यक्रम 420)

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    आइये सबसे पहले सूरे इब्राहीम की आयत नंबर 4 की तिलावत सुनें। وَمَا أَرْسَلْنَا مِنْ رَسُولٍ إِلَّا بِلِسَانِ قَوْمِهِ لِيُبَيِّنَ لَهُمْ فَيُضِلُّ اللَّهُ مَنْ يَشَاءُ وَيَهْدِي مَنْ يَشَاءُ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ (4)और हमने प्रत्येक पैग़म्बर को उसकी जाति की भाषा में भेजा ताकि वह ईश्वरीय संदेश का वर्णन करे तो ईश्वर जिसे चाहता है पथभ्रष्ट कर देता है और जिसे चाहता है उसका मार्गदर्शन करता है और वह प्रतिष्ठित और तत्वदर्शी है। (14:4)इससे पहले हमने कहा था कि ईश्वर का कथन है कि जो लोग संसार को परलोक पर प्राथमिकता देते और सुखभोग के प्रयास में रहते हैं वह सत्य को स्वीकार नहीं करते और ईश्वरीय दूतों के संदेशों का इन्कार करते हैं। इस आयत में कहा गया है कि ईश्वरीय दूतों ने अपने कर्तव्यों के पालन में कोई कमी नहीं की है और उन्होंने अपनी जाति की भाषा में उन की बुद्धि और समझ के अनुसार बात की है ताकि विरोधियों को सत्य स्वीकार न करने का कोई बहाना न मिले और यह न कहें कि हम उनकी बात समझ नहीं पाते थे और उन की बातें हमारी समझ से परे थीं। स्वाभाविक है कि मनुष्य की प्रत्येक क्रिया की उसी के अनुसार एक प्रतिक्रिया होती है। जो लोग सत्य के सामने अपनी आंख और अपने कान बंद कर लेते हैं और बुद्धि का प्रयोग नहीं करते वह पथभ्रष्टता में ग्रस्त हो जाते हैं और जीवन की वास्तविकताओं के संदर्भ में भी उन्हें बहुत से कुपरिणामों का सामना करना पड़ता है और वास्तव में यह ईश्वरीय दंड है जो उन्हें इस संसार में मिलता है।इसी प्रकार सत्यप्रेमी, ईश्वरीय संदेशों को स्वीकार करके सही मार्ग पर लग जाते हैं और इस प्रकार से वह इस संसार में सही मार्ग पर जीवन यापन की आधार शिला रखते हैं इन लोगों को इस का अच्छा फल भी मिलता है और वास्तव में यह इस संसार में ईश्वर की ओर से उन्हें मिलने वाला उपहार होता है। इस आधार पर इस आयत में यह जो कहा गया है कि ईश्वर जिसे चाहता है पथभ्रष्ट करता है उसका आशय यह है कि हठधर्म लोग अपने पापों के कारण ईश्वर की कृपा से वंचित हो जाते हैं और यह उनके लिए हानिकारक होगा।जैसा कि एक अन्य आयत में कहा गया हैः ईश्वर केवल अत्याचारियों और अतिवादियों को ही पथभ्रष्ट करता है तो इससे वास्तव में ईश्वर के मार्गदर्शन से दूर करने में पापों की भूमिका स्पष्ट होती है। वास्तविकता यह है कि यदि ईश्वर लोगों को पथभ्रष्ट ही करना चाहता तो फिर वह लोगों के लिए अपने दूत और ग्रंथ न भेजता जबकि ईश्वर ने कई ग्रंथ और इतने सारे ईश्वरीय दूत मनुष्य के कल्याण और मार्गदर्शन के लिए भेजे हैं किंतु कुछ लोगों का मन सत्य की ओर नहीं झुकता और वह सही मार्ग को स्वीकार नहीं करते।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय दूतों की भाषा विशेष नहीं थी कि उसे समझना केवल बुद्धिजीवियों के बस की ही बात हो बल्कि वे जनता की भाषा में उन की सूझ बूझ के आधार पर बात करते थे ताकि किसी के लिए कोई बहाना न रहे।लोगों के साथ चाहे वह अच्छे हों या बुरे, ईश्वर का व्यवहार तत्वदर्शिता पर आधारित होता है और हर एक को उसके कर्म के आधार पर फल मिलता है। आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर 5 की तिलावत सुनें। وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مُوسَى بِآَيَاتِنَا أَنْ أَخْرِجْ قَوْمَكَ مِنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ وَذَكِّرْهُمْ بِأَيَّامِ اللَّهِ إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَاتٍ لِكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ (5)निसंदेह हमने मूसा को अपने चिन्हों के साथ भेजा और कहा कि अपनी जाति के लोगों को अंधकारों से प्रकाश की ओर ले जाओ और उन्हें ईश्वरीय दिनों की याद दिलाओ, निश्चित रूप से इसमें प्रत्येक संयमी व कृतज्ञ के लिए चिन्ह हैं। (14:5)ईश्वरीय दूतों के अभियान के बारे में पिछली आयत में एक मूल सिद्धांत के वर्णन के बाद इस आयत में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम द्वारा मार्गदर्शन के अभियान की शैली का उल्लेख और कहा गया है कि वे लोगों को फ़िरऔन की दासता के बंधनों और झूठी प्रतिमाओं की उपासना से छुटकारा दिलाने का प्रयास प्रयास करते थे और अपनी बात की सत्यता को सिद्ध करने के लिए लोगों को चमत्कार दिखाते थे किंतु उनकी जाति ने एक चरण में उनकी बात मानी और एक अन्य चरण में उनकी बात मानने से इन्कार कर दिया, इस लिए उनका अभियान ईश्वरीय कृपाओं और अनुकंपाओं के परिपूर्ण दिनों तथा समस्याओं व दुखों से भरे दिनों पर आधारित है और क़ुरआने मजीद ने इन दिनों को ईश्वरीय दिनों का नाम दिया है। इन दिनों की याद दिलाने से लोगों के मन पर छाया अंधकार छंट जाता है और वे अपने अतीत से पाठ लेते हैं।बनी इस्राईल जाति ने एक बार ईश्वर के आदेश से नील नदी को सुरक्षित रूप से पार कर लिया था और उसके शत्रु उसमें डूब गए थे। एक बार यही जाति ईश्वरीय नेमतों व कृपाओं के प्रति कृतघ्नता के कारण 40 वर्षों तक जंगलों व मरुस्थलों में भटकती रही थी जिसके दौरान इस जाति को बहुत सी समस्याओं और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था, इसी लिए उन दिनों की याद स्वयं उनके और उनकी आगामी पीढ़ियों के लिए चेतना का कारण है।इस आयत से हमने सीखा कि अतीत की याद, दुखों व समस्याओं पर संयम व धैर्य तथा ईश्वरीय नेमतों व अनुकंपाओं पर कृतज्ञता प्रकट करने की भूमि समतल करती है।किसी भी राष्ट्र, विशेष कर मुसलमानों के इतिहास के महत्वपूर्ण दिनों की याद मनाने की ईश्वर ने सिफ़ारिश की है।आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर 6 की तिलावत सुनें। وَإِذْ قَالَ مُوسَى لِقَوْمِهِ اذْكُرُوا نِعْمَةَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ أَنْجَاكُمْ مِنْ آَلِ فِرْعَوْنَ يَسُومُونَكُمْ سُوءَ الْعَذَابِ وَيُذَبِّحُونَ أَبْنَاءَكُمْ وَيَسْتَحْيُونَ نِسَاءَكُمْ وَفِي ذَلِكُمْ بَلَاءٌ مِنْ رَبِّكُمْ عَظِيمٌ (6)और जब मूसा ने अपनी जाति के लोगों से कहा कि अपने ऊपर ईश्वरीय कृपाओं को याद करो जब उसने तुम्हें फ़िरऔन के लोगों से बचाया था, उन लोगों से जो तुम्हें अत्यधिक कठोर यातनाएं दिया करते थे। वे तुम्हारे पुत्रों की हत्या कर देते थे और तुम्हारी महिलाओं को जीवित रखते थे और इसमें तुम्हारे लिए ईश्वर की ओर से कड़ी परीक्षा थी। (14:6)पिछली आयत में ईश्वरीय दिनों की याद की सिफ़ारिश के बाद इस आयत में क़ुरआने मजीद ने उसके कुछ उदाहरणों की ओर संकेत करते हुए कहा है कि यहूदी जाति के लिए एक बड़ा दिन, फ़िरऔन के हाथों से उनका छुटकारा था, जो ज्योतिषियों की भविष्यवाणी के कारण हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के जन्म से भयभीत था और इसी लिए उसने आदेश दे रखा था कि चाहे जिस घर में पुत्र का जन्म हो उसकी हत्या कर दी जाए किंतु पुत्रियों को जीवित छोड़ दिया जाए।वह विभिन्न बहानों से बनी इस्राईल के युवाओं को यातनाएं देता था और उनकी महिलाओं व पुत्रियों को दासी बना लेता था। स्वाभाविक है कि यह स्थिति बनी इस्राईल के लिए बहुत बड़ी परीक्षा थी ताकि यह पता चल सके कि वे अत्याचारी फ़िरऔन के सामने किस प्रकार की प्रतिक्रिया दिखाते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि स्वतंत्रता, ईश्वर की बहुत बड़ी कृपा है जिसे याद रखने का ईश्वर आगामी पीढ़ियों को आदेश देता है।जो कुछ फ़िरऔन के समर्थक करते थे वह बुरा था किंतु इसके बावजूद उनके काम ईश्वरीय इच्छा के आगे लोगों की परीक्षा का मार्ग प्रशस्त करते थे।