islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए इब्राहीम, आयतें 40-45, (कार्यक्रम 429)

    सूरए इब्राहीम, आयतें 40-45, (कार्यक्रम 429)

    सूरए इब्राहीम, आयतें 40-45, (कार्यक्रम 429)
    4 (80%) 1 vote[s]

    आइये पहले सूरए इब्राहीम की आयत नंबर ४० और ४१ की तिलावत सुनें।رَبِّ اجْعَلْنِي مُقِيمَ الصَّلَاةِ وَمِنْ ذُرِّيَّتِي رَبَّنَا وَتَقَبَّلْ دُعَاءِ (40) رَبَّنَا اغْفِرْ لِي وَلِوَالِدَيَّ وَلِلْمُؤْمِنِينَ يَوْمَ يَقُومُ الْحِسَابُ (41)प्रभुवर! मुझे नमाज़ स्थापित करने वालों में रख तथा मेरे वंश के साथ भी ऐसा ही कर। प्रभुवर! मेरी प्रार्थना को स्वीकार कर। (14:40) प्रभुवर! मुझे, मेरे माता-पिता तथा सभी ईमान वालों को उस दिन क्षमा करना जिस दिन सबका हिसाब लिया जाएगा। (14:41)जिस समय हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपनी पत्नी हाजेरा तथा पुत्र इस्माईल को मक्के की मरुस्थलीय एवं बंजर धरती में बसाया तो उन्होंने ईश्वर से कहा कि प्रभुवर! मैं इन्हें यहां इस लिए लाया हूं ताकि ये नमाज़ स्थापित करें। इस आयत में भी वे ईश्वर से अपनी संतान तथा वंश के बारे में प्रार्थना करते हैं कि वे भी नमाज़ स्थापित करने वालों में से हों तथा ईश्वर उनकी नमाज़ तथा प्रार्थना को स्वीकार करे।जी हां! ईश्वर के पैग़म्बर तथा उसके प्रिय बंदे केवल स्वयं नमाज़ पढ़ने के विचार में नहीं रहते बल्कि वे स्वयं को समाज में नमाज़ स्थापित होने तथा नमाज़ की संस्कृति को जीवित रखने के संबंध में उत्तरदायी समझते हैं और यह ऐसी बात है जो व्यवहारिक हो जाए तो न केवल लोग नमाज़ पढ़ने लगेंगे बल्कि वास्तविक नमाज़ी भी बन जाएंगे तथा परिवार व समाज के प्रति उनका व्यवहार हर प्रकार के स्वार्थ व घमण्ड से दूर एवं विनम्रता पर आधारित होगा।हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की इस प्रार्थना में आगे चलकर अपने, अपने परिवार तथा सभी ईमान वालों के लिए क्षमा की प्रार्थना की गई है कि जो प्रार्थना के अवसर पर सभी लोगों को दृष्टिगत रखने को दर्शाती है। इस्लामी शिक्षाओं में इस बात पर बहुत अधिक बल दिया गया है कि दूसरों के लिए स्वयं से अधिक प्रार्थना करनी चाहिए और ईश्वर से उनके लिए भलाई की कामना करनी चाहिए।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर के प्रिय बंदों का एक चिन्ह, ईश्वर के समक्ष प्रार्थना करना है कि जो ईश्वर की महानता तथा मनुष्य की तुच्छता को दर्शाता है।प्रार्थना में पिछली पीढ़ियों अर्थात माता-पिता का भी ध्यान रखना चाहिए और आगामी पीढ़ियों एवं उनकी संतानों को भी दृष्टिगत रखना चाहिए।आइए अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर ४२ और ४३ की तिलावत सुनें।وَلَا تَحْسَبَنَّ اللَّهَ غَافِلًا عَمَّا يَعْمَلُ الظَّالِمُونَ إِنَّمَا يُؤَخِّرُهُمْ لِيَوْمٍ تَشْخَصُ فِيهِ الْأَبْصَارُ (42) مُهْطِعِينَ مُقْنِعِي رُءُوسِهِمْ لَا يَرْتَدُّ إِلَيْهِمْ طَرْفُهُمْ وَأَفْئِدَتُهُمْ هَوَاءٌ (43)जो कुछ अत्याचारी करते हैं, उससे ईश्वर को निश्चेत मत समझो, उसने तो उनके दण्ड को उस दिन तक के लिए टाल रखा है जिस दिन आंखें भय से फटी रह जाएंगी। (14:42) उस दिन अत्याचारी भय से सिर उठाए भागे चले जा रहे होंगे, उनकी पलकें भी नहीं झपक रही होंगी तथा भय से हृदय दहल रहे होंगे। (14:43)हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की प्रार्थना के वर्णन की समाप्ति के बाद यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा सभी ईमान वालों को संबोधित करते हुए कहती है कि यदि तुम यह देखते हो कि अत्याचारी ऐश्वर्य का जीवन बिता रहे हैं तथा उनके लिए कोई दण्ड नहीं आता तो यह मत सोचो कि ईश्वर उनके कर्मों से अवगत नहीं हैं या वह उन्हें दण्डित नहीं कर सकता।ईश्वर ने अपनी तत्वदर्शितापूर्ण परंपरा के आधार पर सभी भले व बुरे लोगों को यह अधिकार दिया है कि वे अपनी समझ और बुद्धि के आधार पर जो चाहते हैं करें तथा उसका प्रतिफल या दण्ड प्रलय के दिन प्राप्त करें। अल्बत्ता जब पाप समाज के अधिकांश भाग को अपनी चपेट में ले ले तो ईश्वर उस समाज को दण्डित करता है किंतु यह इस प्रकार नहीं होता है कि मनुष्य से उसका अधिकार छिन जाए और वह यह सोचने लगे कि वह जो भी करेगा उसका पारितोषिक या दण्ड तुरंत मिल जाएगा।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर ज्ञानी, सक्षम एवं न्याय प्रेमी है, लोगों को यह नहीं सोचना चाहिए कि वह उनके कर्मों की ओर से निश्चेत है।पापियों तथा अत्याचारियों की रस्सी ढीली छोड़ना ईश्वर की परंपरा है, इसे अपने कर्मों पर ईश्वर की पुष्टि नहीं समझना चाहिए।आइए अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर ४४ और ४5 की तिलावत सुनें।وَأَنْذِرِ النَّاسَ يَوْمَ يَأْتِيهِمُ الْعَذَابُ فَيَقُولُ الَّذِينَ ظَلَمُوا رَبَّنَا أَخِّرْنَا إِلَى أَجَلٍ قَرِيبٍ نُجِبْ دَعْوَتَكَ وَنَتَّبِعِ الرُّسُلَ أَوَلَمْ تَكُونُوا أَقْسَمْتُمْ مِنْ قَبْلُ مَا لَكُمْ مِنْ زَوَالٍ (44) وَسَكَنْتُمْ فِي مَسَاكِنِ الَّذِينَ ظَلَمُوا أَنْفُسَهُمْ وَتَبَيَّنَ لَكُمْ كَيْفَ فَعَلْنَا بِهِمْ وَضَرَبْنَا لَكُمُ الْأَمْثَالَ (45)(हे पैग़म्बर!) लोगों को उस दिन से डराइए जब दण्ड उन्हें आ लेगा तो अत्याचारी कहेंगे, प्रभुवर! हमें थोड़ा सा समय दे दे ताकि हम तेरे निमंत्रण को स्वीकार कर लें और पैग़म्बरों का अनुसरण करें। (उनसे कहा जाएगा कि) क्या यह तुम नहीं थे जो इससे पहले तक सौगंध खाते थे कि तुम्हारे लिए कोई अंत नहीं है? (14:44) और तुम उन लोगों के घरों में रहे जिन्होंने अपने आप पर अत्याचार किया था। और तुम्हारे लिए यह बात स्पष्ट हो गई कि हमने उनके साथ क्या किया। और हमने तुम्हारे लिए उदाहरण प्रस्तुत किए (किंतु तुमने पाठ नहीं सीखा)। (14:45)पिछली आयतों में यह कहने के पश्चात कि ईश्वर को अपने कर्मों के बारे में निश्चेत नहीं समझना चाहिए, क़ुरआने मजीद इन आयतों में कहता है कि यदि संसार में ईश्वरीय दण्ड आ गया तो फिर तुम उससे बचने और स्वयं को सुधारने के लिए समय मांगने का जितना भी आग्रह करोगे उसका कोई प्रभाव नहीं होगा क्योंकि ईश्वरीय दण्ड देखने के पश्चात प्राप्त होने वाला ईमान स्वेच्छा और स्वाधिकार से नहीं बल्कि भय के कारण होता है और उसका कोई मूल्य नहीं है।आगे चल कर आयत अत्याचारियों को संबोधित करते हुए कहती है कि तुम पिछली जातियों से पाठ क्यों नहीं सीखते जिनके स्थान पर और जिनके घरों में इस समय तुम हो? उनका परिणाम देखने के बाद भी तुम ईश्वर से इस प्रकार की मांग क्यों करते हो कि यदि वह सक्षम है तो तुम्हारे लिए अपने दण्ड को भेज दे? क्या तुम यह सोचते हो कि तुम नश्वर नहीं हो और इस संसार में सदैव रहोगे? तुम्हें अपने से पहले वाले लोगों से पाठ सीखना चाहिए जो इसी प्रकार के विचार रखते थे।इन आयतों से हमने सीखा कि पापी व अपराधी लोग एक न एक दिन अवश्य पछताते हैं किंतु उसका कोई लाभ नहीं होता क्योंकि वे अवसर को गंवा चुके होते हैं और अपने आप पर तौबा व प्रायश्चित का द्वार बंद कर चुके होते हैं।समाज तथा इतिहास के संबंध में ईश्वर की परंपरा स्थिर एवं अटल है, अतः हमें पिछले लोगों के इतिहास का अध्ययन करना और उनसे पाठ सीखना चाहिए।