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    सूरए इब्राहीम, आयतें 46-52, (कार्यक्रम 430)

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    आइये पहले सूरए इब्राहीम की आयत नंबर ४६ और ४७ की तिलावत सुनें।وَقَدْ مَكَرُوا مَكْرَهُمْ وَعِنْدَ اللَّهِ مَكْرُهُمْ وَإِنْ كَانَ مَكْرُهُمْ لِتَزُولَ مِنْهُ الْجِبَالُ (46) فَلَا تَحْسَبَنَّ اللَّهَ مُخْلِفَ وَعْدِهِ رُسُلَهُ إِنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ ذُو انْتِقَامٍ (47)और उन्होंने अपनी सभी चालें चलीं किंतु उनकी सभी चालें ईश्वर के निकट (स्पष्ट) हैं। यद्यपि उनकी चालें ऐसी थीं कि पर्वत अपने स्थान से हट जाएं। (14:46) तो कदापि यह मत सोचो कि ईश्वर अपने उस वचन को तोड़ने वाला है जो उसने अपने पैग़म्बरों को दिया है। निसंदेह ईश्वर अजेय व प्रतिशोध लेने वाला है। (14:47)पिछली आयतों में ईश्वर ने प्रलय में अत्याचारियों की स्थिति तथा उनकी इच्छाओं व कामनाओं का वर्णन किया था और यह कहा था कि उन्होंने पिछली जातियों के अंत से पाठ नहीं सीखा और अपने ग़लत मार्ग पर ही हठधर्मी करते रहे।ये आयतें कहती हैं कि अत्याचारी शासक सत्य की आवाज़ को दबाने के लिए जो भी षड्यंत्र करें या चाल चलें, ईश्वर उससे पूर्णतः अवगत है तथा उसे विफल बनाने में भी सक्षम है। उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि यदि वे पहाड़ों को उनके स्थान से हटा सकते हैं तो वे ईश्वर के नियंत्रण से बाहर निकलने की भी शक्ति रखते हैं।उन्हें कदापि यह नहीं सोचना चाहिए कि सत्य के विजयी और असत्य के पराजित होने के बारे में ईश्वर ने अपने पैग़म्बरों को जो वचन दिया है वह खोखला है और कभी पूरा नहीं होगा। ईश्वर की शक्ति के समक्ष खड़े होने की क्षमता किसी भी सांसारिक शक्ति में नहीं है और यदि ईश्वर चाहे तो किसी को भी उसके कड़े दण्ड से बचने का मार्ग नहीं मिलेगा।इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान वालों को मिलने वाली ईश्वरीय सहायता में विलंब, ईश्वर तथा उसकी शक्ति पर ईमान में संदेह का कारण नहीं बनना चाहिए।काफ़िरों तथा अत्याचारियों को ईश्वर की ओर से दी जाने वाली मोहलत, निश्चेतना तथा भूल नहीं बल्कि एक तत्वदर्शितापूर्ण परंपरा के आधार पर है।आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर ४८की तिलावत सुनें।يَوْمَ تُبَدَّلُ الْأَرْضُ غَيْرَ الْأَرْضِ وَالسَّمَاوَاتُ وَبَرَزُوا لِلَّهِ الْوَاحِدِ الْقَهَّارِ (48)उस दिन जब धरती एक दूसरी धरती में परिवर्तित हो जाएगी और आकाश भी परिवर्तित कर दिए जाएंगे और सबके सब अनन्य व प्रकोपी ईश्वर के समक्ष प्रस्तुत होंगे। (14:48)प्रलय के दिन का एक चिन्ह, धरती व आकाशों की व्यवस्था में आने वाला परिवर्तन है जिसके बारे में क़ुरआने मजीद की अनेक आयतों में संकेत किया गया है। उस दिन इतना भीषण भूकंप आएगा कि पहाड़ अपने स्थान से हट जाएंगे, सूर्य का प्रकाश समाप्त हो जाएगा, तारे एक दूसरे से टकरा जाएंगे और वर्तमान व्यवस्था का अंत हो जाएगा।उसके बाद एक नई व्यवस्था स्थापित होगी, सभी मरे हुए लोग जीवित किए जाएंगे और वे अपने कर्मों का फल प्राप्त करने के लिए ईश्वर के न्यायालय में लाए जाएंगे। वह ऐसा न्यायालय होगा जिसमें केवल अनन्य व सर्वसक्षम ईश्वर का आदेश चलेगा।इस आयत से हमने सीखा कि यदि ईश्वर पापियों व अत्याचारियों को इस संसार में दण्डित नहीं करता तो प्रलय में उन्हें उनके किए का पूरा फल मिलेगा और उससे बचने का कोई मार्ग नहीं होगा।प्रलय, अत्याचारियों पर दया करने का स्थान नहीं है और वे अवश्य ही ईश्वरीय प्रकोप में ग्रस्त होंगे।आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर ४९ और ५० की तिलावत सुनें।وَتَرَى الْمُجْرِمِينَ يَوْمَئِذٍ مُقَرَّنِينَ فِي الْأَصْفَادِ (49) سَرَابِيلُهُمْ مِنْ قَطِرَانٍ وَتَغْشَى وُجُوهَهُمُ النَّارُ (50)और हे पैग़म्बर! उस दिन आप अपराधियों को देखेंगे कि किस प्रकार ज़न्जीरों में जकड़े हुए हैं। (14:49) उनके वस्त्र क़तेरान अर्थात एक प्रकार के तेल के होंगे और आग उनके चेहरों को चारों ओर से घेरे हुए होगी। (14:50)ये आयतें प्रलय के दिन अपराधियों के घोर अपमान और साथ ही उनको मिलने वाले कड़े दण्ड का वर्णन करती हैं। उनके हाथ, पैर व गर्दन ज़न्जीरों में जकड़े होंगे तथा उन्हें शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार के दण्ड मिल रहे होंगे।उन्हें ऐसे अपराधियों व पापियों के सामने दण्ड मिल रहा होगा जिन्हें देखना स्वयं ही दण्ड समान होगा। नरकवासियों के कपड़े तारकोल के समान एक ऐसे तेल के बने होंगे जिसमें बहुत अधिक दुर्गंध होती है और जो आग को अधिक भड़काता है, इस प्रकार उनके शरीर में लगी हुई आग और भड़क रही होगी।इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद नरक का इस प्रकार चित्रण करता है मानो हम उसे अपने सामने देख रहे हों ताकि हम प्रलय को कोई असंभव बात न समझें।शायद यह बात कही जा सकती हो कि अपराधी इस संसार में जिन कपड़ों को पहन कर बहुत घमण्ड से रहते थे वही वस्त्र प्रलय में उनके लिए कड़े दण्ड का कारण बनेंगे।आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर ५१ और ५२ की तिलावत सुनें।لِيَجْزِيَ اللَّهُ كُلَّ نَفْسٍ مَا كَسَبَتْ إِنَّ اللَّهَ سَرِيعُ الْحِسَابِ (51) هَذَا بَلَاغٌ لِلنَّاسِ وَلِيُنْذَرُوا بِهِ وَلِيَعْلَمُوا أَنَّمَا هُوَ إِلَهٌ وَاحِدٌ وَلِيَذَّكَّرَ أُولُو الْأَلْبَابِ (52)(प्रलय इस लिए है) ताकि ईश्वर हर किसी को उसके किए का प्रतिफल दे दे कि ईश्वर निश्चित रूप से बहुत शीघ्र हिसाब करने वाला है। (14:51) यह (क़ुरआन) लोगों के लिए एक स्पष्ट संदेश है ताकि इसके माध्यम से उन्हें डराया जाए और उन्हें ज्ञात हो जाए कि केवल वही अनन्य ईश्वर है और फिर बुद्धि वाले लोग उपदेश प्राप्त करें। (14:52)सूरए इब्राहीम की अंतिम आयतें कहती हैं कि प्रलय, ईश्वरीय न्याय के आधार पर है ताकि हर कर्म का, चाहे वह अच्छा हो या बुरा, उचित बदला दिया जाए। प्रलय के दिन का हिसाब-किताब ईश्वर के हाथ में है। पैग़म्बरों व आसमानी किताबों की शिक्षाएं भी पापियों व अपराधियों को चेतावनी देती हैं तथा बुद्धि वालों के लिए पाठ का कारण बनती हैं अन्यथा वे निश्चेतना में ग्रस्त हो जाएंगे क्योंकि इस संसार में हर प्रकार की पथभ्रष्ठता व पाप का मार्ग प्रशस्त है।इन आयतों से हमने सीखा कि संसार में किए जाने वाले हर कर्म का प्रतिफल मिलेगा तथा हमारा हर कर्म ईश्वर के पास सुरक्षित है।केवल संदेश पहुंचाना पर्याप्त नहीं है, डराना व चेतावनी देना भी आवश्यक है। केवल जानना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सीखी हुई बातों को व्यवहारिक बनाना तथा उन पर ध्यान रखना भी आवश्यक है।