islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए इब्राहीम, आयतें 7-10, (कार्यक्रम 421)

    सूरए इब्राहीम, आयतें 7-10, (कार्यक्रम 421)

    Rate this post

    सूरए इब्राहीम की आयत नंबर ७ और ८ की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ تَأَذَّنَ رَبُّكُمْ لَئِنْ شَكَرْتُمْ لَأَزِيدَنَّكُمْ وَلَئِنْ كَفَرْتُمْ إِنَّ عَذَابِي لَشَدِيدٌ (7) وَقَالَ مُوسَى إِنْ تَكْفُرُوا أَنْتُمْ وَمَنْ فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا فَإِنَّ اللَّهَ لَغَنِيٌّ حَمِيدٌ (8) और (हे पैग़म्बर!) याद कीजिए उस समय को जब आपके पालनहार ने घोषणा कर दी कि यदि तुम कृतज्ञ रहे तो मैं तुम्हें और अधिक अनुकंपाएं प्रदान करूंगा और यदि तुम अकृतज्ञ रहे तो मेरा दण्ड अत्यंत कड़ा है। (14:7) और मूसा ने कहा यदि तुम अर्थात बनी इस्राईल और धरती पर रहने वाले सभी लोग काफ़िर हो जाओ तब भी ईश्वर आवश्यकता मुक्त और प्रशंसा का अधिकारी है। (14:8)इससे पहले हमने कहा था कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने बनी इस्राईल जाति के लोगों से कहा था कि वे फ़िरऔन के चंगुल से छूटने के कारण ईश्वर के प्रति कृतज्ञता जताएं। यह आयत इस संबंध में एक मूल सिद्धांत का वर्णन करती है कि अनुकंपा की वृद्धि अथवा उसके हाथ से निकल जाने में अनुकंपा पर कृतज्ञ या अकृतज्ञ रहने की, बड़ी भूमिका होती है।अलबत्ता ईश्वर के प्रति कृतज्ञता जताने के कई चरण होते हैं। कभी यह काम केवल ज़बान से होता है, जैसे प्रार्थना या ईश्वर का स्मरण, कभी यह कर्म के द्वारा होता है, जैसे ईश्वर के मार्ग में दान दक्षिणा करना या ईश्वरीय संभावनाओं को उसकी प्रसन्नता के लिए प्रयोग करना। ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में आंखों की अनुकंपा से लाभ उठाना, इस अनुकंपा पर व्यवहारिक कृतज्ञता है, अल्बत्ता शर्त यह है कि इस ज्ञान प्राप्ति का उद्देश्य अवैध लाभ उठाना नहीं बल्कि ईश्वर की रचनाओं या दूसरे शब्दों में आम लोगों की सेवा करना हो।मनुष्य अपने ज्ञान व धन-संपत्ति को अपना नहीं बल्कि ईश्वर का समझे तो यही एक प्रकार की कृतज्ञता है। इसी प्रकार यदि मनुष्य ईश्वरीय अनुकंपाओं को अनुचित मार्ग में प्रयोग न करे तो वस्तुतः वह उन अनुकंपाओं पर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता जताना है।इतिहास में वर्णित है कि ईश्वर ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को आदेश दिया कि वे पूर्ण रूप से उसकी कृतज्ञता के अधिकार का पालन करें। उन्होंने कहा कि प्रभुवर! मुझ में इस आदेश के पालन की क्षमता नहीं है क्योंकि मेरे पास जो कुछ है, तेरा है और मैं तेरे प्रति जितना भी कृतज्ञ रहूंगा, वह तेरी महानता और कृपा के अनुकूल नहीं होगा। ईश्वर की ओर से उत्तर आया कि तुम्हारी यही स्वीकारोक्ति कि जो कुछ तुम्हारे पास है, मेरा है, उत्तम कृतज्ञता है।स्वाभाविक है कि ईश्वरीय अनुकंपाओं को उन कार्यों में प्रयोग करना, जिनसे ईश्वर प्रसन्न नहीं है, अनुकंपा पर अकृतज्ञता है जिसके लिए ईश्वर ने कड़े दण्ड का वचन दिया है।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर की परंपरा है कि वह कृतज्ञता पर अनुकंपा में वृद्धि करता है जबकि अकृतज्ञता के कारण लोगों को दण्डित करता है।ईश्वर को हमारे कृतज्ञ रहने की कोई आवश्यकता नहीं है बल्कि कृतज्ञ रहने की भावना स्वयं हमारे शिष्टाचार को बेहतर बनाती है तथा हमारे भीतर अधिक अनुकंपाएं प्राप्त करने की क्षमता बढ़ती है।आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर ९ कि तिलावत सुनें।أَلَمْ يَأْتِكُمْ نَبَأُ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ قَوْمِ نُوحٍ وَعَادٍ وَثَمُودَ وَالَّذِينَ مِنْ بَعْدِهِمْ لَا يَعْلَمُهُمْ إِلَّا اللَّهُ جَاءَتْهُمْ رُسُلُهُمْ بِالْبَيِّنَاتِ فَرَدُّوا أَيْدِيَهُمْ فِي أَفْوَاهِهِمْ وَقَالُوا إِنَّا كَفَرْنَا بِمَا أُرْسِلْتُمْ بِهِ وَإِنَّا لَفِي شَكٍّ مِمَّا تَدْعُونَنَا إِلَيْهِ مُرِيبٍ (9)क्या तुम तक अपने से पहले वाली जातियों, नूह की जाति, आद व समूद तथा जो जातियां उनसे पूर्व थीं, जिन्हें ईश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं जानता, उनका समचार नहीं पहुंचा? उनके पैग़म्बर स्पष्ट चमत्कारों के साथ उनके पास आए किंतु उन्होंने उनके हाथों को उनके मुंह की ओर पलटा दिया और कहा कि जो संदेश तुम लेकर आए हो हम उसका इन्कार करते हैं और जिस बात की ओर तुम निमंत्रण दे रहो हो उसके बारे में हमें घोर संदेह है। (14:9)यह आयत मानव इतिहास के दौरान पैग़म्बरों के विरोधियों के द्वेष एवं हठधर्म का उल्लेख करती है कि स्पष्ट चमत्कार और तर्कसंगत प्रमाण देखने के बावजूद वे कहते थे कि हमें अभी भी आपकी बातों में संदेह है अतः हम ईमान नहीं लाएंगे। यहां तक कि वे पैग़म्बरों के मुख पर अपना हाथ रख कर उन्हें चुप रहने का आदेश देते थे ताकि अन्य लोग उनकी बातें न सुन सकें।किसी बात में संदेह करना अस्वाभाविक नहीं है किंतु जब तर्क व चमत्कार स्पष्ट हो तो संदेह करना ऐसा ही है जैसे कि कोई भरी दोपहर में कहे कि मुझे संदेह है कि इस समय दिन है या रात। इस प्रकार का संदेह स्वीकार्य नहीं है। संदेह और संशय प्रश्न व उत्तर तथा वास्तविकता को समझने के लिए हो तो दृढ़ ईमान तक पहुंचने का कारण बनता है और मनुष्य को आगे चलकर संदेह नहीं होता।इस आयत से हमने सीखा कि पिछली जातियों के इतिहास का अध्ययन तथा ईश्वरीय परंपराओं की पहचान, आगामी पीढ़ियों के लिए शिक्षा सामग्री है और उनके सही मार्ग पर चलने का कारण बनती है।धर्म की सत्यता के बारे में काफ़िरों का संदेह, अध्ययन और तर्कसंगत समीक्षा के आधार पर नहीं बल्कि द्वेष और हठधर्म के कारण है।आइये अब सूरए इब्राहीम की आयत नंबर १० कि तिलावत सुनें।قَالَتْ رُسُلُهُمْ أَفِي اللَّهِ شَكٌّ فَاطِرِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ يَدْعُوكُمْ لِيَغْفِرَ لَكُمْ مِنْ ذُنُوبِكُمْ وَيُؤَخِّرَكُمْ إِلَى أَجَلٍ مُسَمًّى قَالُوا إِنْ أَنْتُمْ إِلَّا بَشَرٌ مِثْلُنَا تُرِيدُونَ أَنْ تَصُدُّونَا عَمَّا كَانَ يَعْبُدُ آَبَاؤُنَا فَأْتُونَا بِسُلْطَانٍ مُبِينٍ (10) उनके पैग़म्बरों ने (उत्तर में) कहा, क्या ईश्वर के अस्तित्व में संदेह है कि जो आकाशों और धरती का रचयिता है? वह तुम्हें इस लिए बुलाता है ताकि तुम्हारे पिछले पापों को क्षमा कर दे तथा एक निर्धारित समय तक के लिए तुम्हें अवसर दे। काफ़िरों ने कहा, तुम भी हमारी ही भांति मनुष्य हो और चाहते हो कि हमें उन वस्तुओं से रोक दो जिनकी हमारे पूर्वज उपासना किया करते थे, तो अब हमारे लिए कोई खुला हुआ तर्क लेकर आओ। (14:10)विरोधी इस बात तक की अनुमति नहीं देते थे कि ईश्वरीय पैग़म्बर अपनी बात पूर्ण रूप से कह सकें। उनके इस अनुचित कार्य के बारे में क़ुरआने मजीद कहता है कि पैग़म्बर, ईश्वरीय धर्म के बचाव में कहते थे कि यदि यह मान लिया जाए कि तुम हमारा इन्कार करते हो तो क्या तुम ईश्वर के अस्तित्व का भी इन्कार कर सकते हो? उसने तुम्हारी रचना की है और तुम्हें सीधे मार्ग की ओर बुलाया है। यदि तुम इसे स्वीकार नहीं करोगे तो ईश्वरीय समय सीमा बीत जाने के बाद तुम्हारे पास तौबा व प्रायश्चित का मार्ग नहीं रहेगा और तुम ईश्वरीय दण्ड में ग्रस्त होगे तो जब तक समय बाक़ी है अपने बुरे अतीत से पलट जाओ और ईश्वरीय क्षमा के पात्र बनो।किंतु काफ़िर इसके बाद भी अपनी ग़लत बातों पर ही अड़े रहते थे और कहते थे कि तुम हमसे किस बात में श्रेष्ठ हो कि हमें अपनी ओर बुलाते हो और चाहते हो कि हम अपने पूर्वजों का मार्ग छोड़ दें? तुम्हारे पास इस काम का क्या तर्क है? स्पष्ट है कि विरोधियों की यह बात उनके पूर्वजों की ग़लत शैली के अंधे अनुसरण के अतिरिक्त कुछ नहीं थी। उनके उत्तर में कहना चाहिए कि उन्हें इस बात का कि किस प्रकार विश्वास है कि उनके पूर्वजों ने सही मार्ग अपनाया था? क्या पूर्वजों द्वारा किया गया हर कार्य सही था? यदि ऐसा था तो सभी अपने पूर्वजों का अनुसरण करते और मानव समाज में कोई परिवर्तन न आता और कोई प्रगति न होती।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बर लोगों को बुराइयों से पवित्रता तथा पापों से बचने का निमंत्रण देते थे। अतः बुराइयों में ग्रस्त लोग उनकी बातों को स्वीकार नहीं करते थे।मुसलमान सत्य के समक्ष सिर झुकाता है। इस्लाम में पूर्वजों का तर्कहीन व अंधा अनुसरण तथा जातीय व सांप्रदायिक भेद-भाव स्वीकार्य नहीं है।