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    सूरए इसरा, आयतें 1-2, (कार्यक्रम 474)

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    आइये पहले सूरए इसरा की पहली आयत की तिलावत सुनें।

    بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ .سُبْحَانَ الَّذِي أَسْرَى بِعَبْدِهِ لَيْلًا مِنَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ إِلَى الْمَسْجِدِ الْأَقْصَى الَّذِي بَارَكْنَا حَوْلَهُ لِنُرِيَهُ مِنْ آَيَاتِنَا إِنَّه هُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ (1)

    ईश्वर के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। (हर प्रकार की बुराई व किसी भी समकक्ष से) पवित्र है वह (ईश्वर) जो अपने दास (मुहम्मद) को रात के समय मस्जिदुल हराम से मस्जिदुल अक़सा तक, जिसके आस-पास को हमने बरकत और विभूति प्रदान की है, ले गया ताकि उसे अपनी निशानियों में से कुछ निशानियां दिखाए। निश्चित रूप से वह (ईश्वर) सबसे अधिक सुनने और देखने वाला है।(17:1)

    इस सूरे को इस कारण से सूरए इसरा कहा जाता है कि इसमें पैग़म्बरे इस्लाम सल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के मेराज पर जाने की घटना का वर्णन किया गया है। इसरा का अर्थ होता है किसी को रात में कहीं ले जाना। पैग़म्बरे इस्लाम की इस यात्रा का आरंभ मक्के से मस्जिदुल अक़सा तक था जिसकी ओर इस सूरे की पहली आयत में संकेत किया गया है। अलबत्ता इस सूरे में आगे चलकर एकेश्वरवाद, प्रलय, अनेकेश्वरवाद, अत्याचार व पथभ्रष्टता से संघर्ष जैसे आस्था संबंधी मामलों का भी वर्णन किया गया है।

    वस्तुतः इतिहास की सबसे पवित्र व पावन यात्रा, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के आकाशों तक जाने और फिर धरती की ओर लौट कर आने की यात्रा है। पैग़म्बर ने इस यात्रा के पश्चात जो कुछ आकाशों पर देखा था उसे लोगों के समक्ष बयान किया।

    हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को ईश्वर के आदेश की अवहेलना के कारण, स्वर्ग से धरती पर आना पड़ा किंतु पैग़म्बरे इस्लाम सल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने आकाशों की सैर की तथा वे मानवता के लिए उच्च वास्तविकताओं एवं ईश्वरीय शिक्षाओं का उपहार लेकर आए।

    मेराज के संबंध में पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों के अनुसार इस यात्रा में उन्होंने स्वर्ग व नरक तथा स्वर्ग व नरकवासियों की स्थिति को निकट से देखा। मेराज की यात्रा में पैग़म्बरे इस्लाम ने पिछले कई पैग़म्बरों से भेंट की तथा सृष्टि की विचित्र बातों को बहुत निकट से देखा।

    इस आसमानी यात्रा पर सभी मुसलमान सहमत हैं और इस पर आस्था रखते हैं और जो इस यात्रा का इन्कार करे उसे धर्म के मूल सिद्धांतों का इन्कार करने वाला माना जाता है। इसी प्रकार अधिकांश मुसलमानों की आस्था यह है कि उनकी यह यात्रा शारीरिक थी जबकि बहुत कम लोग इसे केवल आत्मा की यात्रा कहते हैं। इतिहास के अनुसार यह यात्रा पैग़म्बरे इस्लाम के मक्के से मदीने हिजरत करने से एक वर्ष पहले हुई थी वे मस्जिदुल हराम अर्थात काबे के चारों ओर निर्मित मस्जिद में मग़रिब की नमाज़ अदा करने के पश्चात मस्जिदुल अक़सा पहुंचे और वहां से एक आसमानी सवारी के माध्यम से जिसे बुराक़ कहा जाता है, आकाशों की सैर पर गए।

    इस यात्रा से वापसी पर पैग़म्बरे इस्लाम ने भोर की नमाज़ मस्जिदुल हराम में अदा की। उनकी यह यात्रा एक ईश्वरीय चमत्कार थी क्योंकि मक्के से मस्जिदुल अक़सा तक का फ़ासला बहुत अधिक है और इसे उस समय के साधनों द्वारा एक रात में तै करना संभव नहीं है। मस्जिदुल अक़सा वर्तमान फ़िलिस्तीन के बैतुल मुक़द्दस नगर में स्थित है और मक्के से बैतुल मुक़द्दस तक हज़ारों किलो मीटर का अंतर है।

    किंतु रोचक बात यह है कि इस आयत में पैग़म्बरे इस्लाम को पैग़म्बर नहीं बल्कि ईश्वर का दास बताया गया है। इस आयत में ईश्वर कहता है कि हम अपने दास को मस्जिदुल अक़सा ले गए। इससे ईश्वर की दृष्टि में उसके दासों के उच्च व श्रेष्ठ स्थान का पता चलता है। इसका अर्थ यह है कि चूंकि हज़रत मुहम्मद सल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ईश्वर के निष्ठावान दास थे अतः वह उन्हें मेराज पर ले गया। इसी प्रकार इस आयत में बताया गया है कि मेराज का आरंभ बिंदु व गन्तव्य दोनों ही मस्जिदें अर्थात ईश्वर के प्रति अपनी उपासना और दासता प्रकट करने का स्थान थीं। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर अपने दास को उसके उपासना स्थल से आकाशों पर ले गया।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की निष्ठापूर्ण दासता, भौतिक मामलों से दूर हो कर आध्यात्मिक एवं ईश्वरीय मामलों की ओर उड़ान की भूमिका है।

    ईश्वर के सामिप्य के लिए, सबसे अच्छा समय रात्रि का है अतः रात के समय उपासना, तौबा व प्रायश्चित किए जाने पर बहुत अधिक बल दिया गया है।

    मस्जिद ईमान वालों की आध्यात्मिक उड़ान का सर्वोत्तम मंच है।

    मस्जिदुल अक़सा एक अत्यंत पवित्र स्थान है और मुसलमानों को इसकी रक्षा हेतु प्रयासरत रहना चाहिए।

    आइये अब सूरए इसरा की दूसरी आयत की तिलावत सुनें।

    وَآَتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ وَجَعَلْنَاهُ هُدًى لِبَنِي إِسْرَائِيلَ أَلَّا تَتَّخِذُوا مِنْ دُونِي ‎وَكِيلًا (2)

    और हमने मूसा को किताब प्रदान की और उसे बनी इस्राईल के मार्गदर्शन का माध्यम बनाया ताकि वे मेरे अतिरिक्त किसी और का सहारा न लें।(17:2)

    पैग़म्बरे इस्लाम की मस्जिदुल अक़सा की यात्रा के वर्णन के पश्चात इस आयत में कहा गया है कि पूरे इतिहास में ईश्वर की परंपरा, एकेश्वरवाद तथा उसकी निष्ठापूर्ण दासता की लोगों के मार्गदर्शन की रही है। अतः पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से पूर्व हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को बनी इस्राईल जाति के बीच भेजा गया और उन्होंने ईश्वर की ओर से भेजी गई किताब तौरैत के आधार पर लोगों को एकेश्वरवाद का निमंत्रण दिया।

    पैग़म्बरों और आसमानी किताबों के भेजे जाने का उद्देश्य लोगों को अनेकेश्वरवाद से दूर करना और उन्हें एकेश्वरवाद का निमंत्रण देना था। अलबत्ता केवल मौखिक रूप से ला इलाहा इल्लल्लाह अर्थात अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है, कहना नहीं बल्कि उन्हें व्यवहारिक रूप से एकेश्वरवाद का निमंत्रण देना वास्तविक उद्देश्य था। इस एकेश्वरवाद का चिन्ह, इस संसार की किसी भी भौतिक बात पर मोहित न होना और ईश्वर की अनंत शक्ति पर भरोसा करना है।

    इसी कारण आगे चल कर आयत कहती है कि जो कुछ तौरैत में आया है वह यह है कि अपने भौतिक व सांसारिक कार्यों में ईश्वर के अतिरिक्त किसी को भी प्रभावी न समझो और उसके अतिरिक्त किसी पर भी भरोसा न करो चाहे वह कितने ही ऊंचे पद व स्थान पर क्यों न हो।

    इस आयत से हमने सीखा कि सभी ईश्वरीय पैग़म्बरों के निमंत्रण और आसमानी किताबों की शिक्षाओं का सार, एकेश्वरवाद है।

    अपने सांसारिक जीवन में मनुष्य को सदैव किसी ऐसे विश्वस्त सहारे की आवश्यकता होती है जिस पर वह भरोसा कर सके तथा पैग़म्बरों ने ईश्वर को मनुष्य के लिए ऐसे ही विश्वस्त सहारे के रूप में प्रस्तुत किया है।