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    सूरए इसरा, आयतें 102-106, (कार्यक्रम 502)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 102 की तिलावत सुनें।

    قَالَ لَقَدْ عَلِمْتَ مَا أَنْزَلَ هَؤُلَاءِ إِلَّا رَبُّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ بَصَائِرَ وَإِنِّي لَأَظُنُّكَ يَا فِرْعَوْنُ مَثْبُورًا (102)

    मूसा ने कहा निश्चित रूप से तुम जानते हो कि इन चमत्कारों को आकाशों और धरती के पालनहार के अतिरिक्त किसी और ने मार्गदर्शक बना कर नहीं भेजा है और हे फ़िरऔन मैं निश्चित रूप से तुझे विनष्ट देखता हूं।(17:102)

    इससे पहले हमने बताया था कि जब फ़िरऔन ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के ईश्वरीय चमत्कारों को देखा तो ईमान लाने के स्थान पर उन्हें जादूगर और जादू किया गया व्यक्ति कहा। यह आयत हज़रत मूसा के उत्तर का उल्लेख करती है कि उन्होंने फ़िरऔन से कहा कि जो कुछ मैंने किया है वह जादू टोना नहीं था कि तुम मुझे जादूगर या जादू किया गया व्यक्ति कह रहे हो बल्कि ये असाधारण कार्य थे जो संसार के पालनहार के आदेश से किए गए और वह भी शक्ति प्रदर्शन, धनोपार्जन या प्रसिद्धि के लिए नहीं बल्कि लोगों के समक्ष अपनी पैग़म्बरी को सिद्ध करने और उन्हें ईश्वरीय कथन को स्वीकार करने का निमंत्रण देने के लिए किए गए थे। स्वाभाविक है कि जो कोई ईश्वरीय मार्गदर्शन व दूरदृष्टि को स्वीकार नहीं करेगा वह तबाह हो जाएगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि कभी मनुष्य सत्य को समझता है किंतु स्वयं को अज्ञानी दर्शाने का प्रयास करता है। फ़िरऔन जानता था कि हज़रत मूसा सत्य कह रहे हैं किंतु वह उनकी बात को स्वीकार करने और ईश्वर के समक्ष नतमस्तक होने के लिए तैयार नहीं था।

    जिन समाजों में लोगों को अत्याचारी व बुरे शासकों का सामना है, वहां धर्म के प्रचार और लोगों को सत्य की ओर बुलाने के लिए पहले शासकों पर काम करना चाहिए क्योंकि इस प्रकार के समाजों में लोगों का सुधार, सरकार के सुधरने पर निर्भर होता है। यही कारण था कि हज़रत मूसा अलैहिलस्सलाम ने बनी इस्राईल से पहले फ़िरऔन को ईश्वर के समक्ष नतमस्तक होने का निमंत्रण दिया।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 103 और 104 की तिलावत सुनें।

    فَأَرَادَ أَنْ يَسْتَفِزَّهُمْ مِنَ الْأَرْضِ فَأَغْرَقْنَاهُ وَمَنْ مَعَهُ جَمِيعًا (103) وَقُلْنَا مِنْ بَعْدِهِ لِبَنِي إِسْرَائِيلَ اسْكُنُوا الْأَرْضَ فَإِذَا جَاءَ وَعْدُ الْآَخِرَةِ جِئْنَا بِكُمْ لَفِيفًا (104)

    फ़िरऔन ने चाहा कि उन्हें मिस्र की धरती से निकाल दे तो हमने उसे और जो लोग उसके साथ थे सब को डुबा दिया। (17:103) और उसके बाद बनी इस्राईल से कहा कि इस धरती में बस जाओ तो जब प्रलय के वादे का समय आ जाएगा तो हम तुम सब को एक साथ समेट कर ले आएंगे।(17:104)

    अत्याचारी शासकों की शैली यह है कि वे सत्यवादियों को या तो निर्वासित कर देते हैं या फिर उनकी हत्या कर देते हैं ताकि उनकी आवाज़ लोगों तक न पहुंच सके। फ़िरऔन ने भी यही निर्णय किया किंतु वह यह बात भूल गया कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम अकेले नहीं हैं बल्कि जिस ईश्वर ने उन्हें लोगों के मार्गदर्शन के लिए भेजा है वह उनका रक्षक व समर्थक है। अतः जब फ़िरऔन तथा उसके सैनिकों ने हज़रत मूसा व बनी इस्राईल का पीछा किया ताकि उन्हें मिस्र से निकाल दें तो ईश्वरीय इच्छा से वे लोग नील नदी से पार हो गए किंतु फ़िरऔन और उसके सभी सैनिक उसमें डूब गए। इस प्रकार ईश्वर ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया।

    इसी प्रकार मक्के के अनकेश्वरवादी भी पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की हत्या करना चाहते थे जिसके चलते वे मक्के से पलायन पर विवश हो गए किंतु ईश्वरीय इच्छा से पैग़म्बरे इस्लाम, मदीना नगर में पहला इस्लामी शासन स्थापित करने में सफल हुए और फिर उन्होंने व्यापक स्तर पर अपने अभियान को आगे बढ़ाया। निश्चित रूप से जब मुसलमानों ने मक्का नगर पर विजय प्राप्त की तो अनेकेश्वरवादी पूर्ण रूप से अपमानित हो गए।

    आगे चलकर आयत कहती है कि फ़िरऔन के मारे जाने के बाद बनी इस्राईल के लोग, अपनी मातृभूमि में रहने लगे और उन्हें फ़िरऔन तथा उसके लोगों से मुक्ति मिल गई। प्रलय में भी इन दो गुटों को एक साथ उपस्थित किया जाएगा ताकि उनके बीच न्यायपूर्ण फ़ैसला किया जा सके।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर की परंपरा और उसका क़ानून यह है कि उसका इरादा, अत्याचारियों की इच्छा पर हावी रहता है और ईश्वरीय युक्ति के मुक़ाबले में उनकी चालें और षड्यंत्र विफल रहते हैं।

    संसार में सभी कर्मों का पारितोषिक अथवा दंड देने की क्षमता नहीं है अतः ईश्वर प्रलय में लोगों को उपस्थित करके सत्य व न्याय के आधार पर फ़ैसला करेगा तथा सभी को उनके कर्मों का प्रतिफल देगा।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 105 और 106 की तिलावत सुनें।

    وَبِالْحَقِّ أَنْزَلْنَاهُ وَبِالْحَقِّ نَزَلَ وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا مُبَشِّرًا وَنَذِيرًا (105) وَقُرْآَنًا فَرَقْنَاهُ لِتَقْرَأَهُ عَلَى النَّاسِ عَلَى مُكْثٍ وَنَزَّلْنَاهُ تَنْزِيلًا (106)

    और हमने इस क़ुरआन को सत्य के साथ उतारा है यह सत्य के साथ ही उतरा है और (हे पैग़म्बर!) हमने आपको केवल शुभ सूचना देने वाला और डराने वाला बना कर भेजा है। (17:105) और हमने क़ुरआन को भाग-भाग करके उतारा ताकि आप उसे लोगों के समक्ष ठहर-ठहर कर पढ़ें और हमने क़ुरआन को उस प्रकार धीरे-धीरे उतारा जिस प्रकार उतारना चाहिए।(17:106)

    ये आयतें हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और फ़िरऔन की घटना का वर्णन करने के पश्चात एक बार फिर क़ुरआने मजीद और हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी के महत्व की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि यह क़ुरआन ईश्वर की ओर से सत्य के साथ उतरा है और ईश्वर की ओर से जिब्राईल द्वारा इसे लाने और पैग़म्बर द्वारा ग्रहण करने के दौरान इसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ है। पैग़म्बर को यह दायित्व दिया गया कि वे इस क़ुरआन की शिक्षाओं के आधार पर लोगों को स्वर्ग की शुभ सूचना दें और नरक से डराएं। वे अपनी इच्छा से इसमें कुछ भी घटा या बढ़ा नहीं सकते अतः क़ुरआने मजीद की सत्यता पूर्ण रूप से बाक़ी है।

    आगे चलकर आयत कहती है कि ईश्वर की इन उच्च शिक्षाओं को लोगों के मन व विचारों में दृढ़ता के साथ बसाने के लिए क़ुरआने मजीद को भाग-भाग करके धीरे-धीरे उतारा गया है। अर्थात एक एक आयत और एक एक सूरा उतारा गया है। यह ईश्वर की प्रशिक्षण शैली है कि वह अपने आदेशों और शिक्षाओं का वर्णन, लोगों की क्षमता व योग्यता के अनुसार करता है। जिस प्रकार से कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से लेकर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल तक सभी ईश्वरीय किताबें और पैग़म्बर क्रमानुसार भेजे गए हैं। वस्तुतः यह क़ुरआने मजीद की परिपूर्णता का एक अन्य प्रमाण है जबकि मक्के के अनेकेश्वरवादियों की एक आपत्ति यह थी कि पूरे क़ुरआन को एक साथ क्यों नहीं भेजा गया?

    इन आयतों से हमने सीखा कि हर प्रकार के फेर-बदल से क़ुरआने मजीद की सुरक्षा को ईश्वर ने सुनिश्चित बनाया है और उसका संदेश पूरी सुरक्षा के साथ लोगों तक पहुंचा है।

    शिक्षा, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन क्रमानुसार होना चाहिए ताकि लोगों पर उसका प्रभाव पड़ सके।

    धर्म और सृष्टि के संबंध में ईश्वर की परंपरा, कार्यों को धीरे-धीरे तथा क्रमानुसार करने की है। यद्यपि वह पूरे संसार की रचना एक क्षण से भी कम में कर सकता था किंतु उसने छः दिनों में यह काम किया। इसी प्रकार उसने क़ुरआने मजीद व अन्य आसमानी किताबों को धीरे-धीरे भेजा जबकि वह उन्हें आरंभ में ही एक साथ भेज सकता था।