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    सूरए इसरा, आयतें 107-111, (कार्यक्रम 503)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 107 की तिलावत सुनें।

    قُلْ آَمِنُوا بِهِ أَوْ لَا تُؤْمِنُوا إِنَّ الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ مِنْ قَبْلِهِ إِذَا يُتْلَى عَلَيْهِمْ يَخِرُّونَ لِلْأَذْقَانِ سُجَّدًا (107)

    (हे पैग़म्बर! विरोधियों से) कह दीजिए कि तुम ईमान लाओ या न लाओ, निश्चित रूप से इससे पूर्व जिन लोगों को ज्ञान दिया गया था, उनके समक्ष जब कभी ईश्वरीय आयतों की तिलावत होती थी तो वे नतमस्तक होते हुए धरती पर गिर पड़ते थे।(17:107)

    इससे पहले हमने कहा कि ईश्वर ने क़ुरआने मजीद को एक ही बार में नहीं बल्कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी के 23 वर्षीय काल के दौरान क्रमशः भेजा है जिस पर विरोधी आपत्ति करते हुए कहते थे कि चूंकि पूरा क़ुरआन एक बार में नहीं आया है इस लिए हम उस पर ईमान नहीं लाएंगे।

    यह आयत कहती है कि इस प्रकार के तर्कहीन लोगों से कहना चाहिए कि ईश्वर को तुम्हारे ईमान की आवश्यकता नहीं है कि तुम इस प्रकार के बहाने बना रहे हो। जिनके पास ज्ञान है या जो पिछली आसमानी किताबों का ज्ञान रखते हैं वे क़ुरआने मजीद की आयतों को पढ़कर उसकी सत्यता को समझ जाते हैं। वे क़ुरआन की महानता के समक्ष इस प्रकार से नतमस्तक हो जाते हैं कि केवल उनका माथा ही नहीं बल्कि उनकी ठुड्डी और पूरा चेहरा धरती पर टिक जाता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि लोगों का ईमान या कुफ़्र, क़ुरआने मजीद की सत्यता में किसी भी प्रकार का प्रभाव नहीं रखता। यदि संसार के सभी लोग क़ुरआन का इन्कार भी कर दें तो यह ऐसा ही है जैसे सभी लोग अपनी आंखें बंद करके सूर्य का इन्कार कर दें।

    वास्तविक ज्ञान वह है जो मनुष्य को सत्य के समक्ष नतमस्तक करे, न यह कि मानव ज्ञान में वृद्धि से वह धार्मिक व आध्यात्मिक वास्तविकताओं का इन्कार कर दे।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 108 और 109 की तिलावत सुनें।

    وَيَقُولُونَ سُبْحَانَ رَبِّنَا إِنْ كَانَ وَعْدُ رَبِّنَا لَمَفْعُولًا (108) وَيَخِرُّونَ لِلْأَذْقَانِ يَبْكُونَ وَيَزِيدُهُمْ خُشُوعًا (109)

    और वे कहते हैं कि हर बुराई से पवित्र है हमारा पालनहार, निश्चित रूप से हमारे पालनहार का वचन पूरा हो कर रहेगा।(17:108) और वे रोते हुए ठुड्डियों के बल गिर पड़ते हैं और (क़ुरआन की आयतों की तिलावत) उनकी विनम्रता में वृद्धि कर देती है।(17:109)

    चूंकि तौरैत और इंजील में अंतिम पैग़म्बर के आने की भविष्यवाणी की गई थी अतः आसमानी किताब रखने वाले वे लोग जो पैग़म्बरे इस्लाम (स) पर ईमान ला चुके थे, कहते थे कि ईश्वर ने अपने वचन को पूरा कर दिया है अतः वे ईश्वर का गुणगान करते थे।

    स्वाभाविक है कि इस प्रकार के लोग सत्य के प्रति नतमस्तक रहते। वे क़ुरआने मजीद की जितनी अधिक तिलावत करते, उतना ही उनका हृदय ईश्वर के प्रति विनम्र होता जाता और वे रोते और गिड़गिड़ाते हुए ईश्वर का सज्दा करते। क़ुरआने मजीद ने उनकी इस दशा की सराहना की है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद की तिलावत सत्य स्वीकार करने के लिए तत्पर हृदयों पर ऐसा प्रभाव डालती है कि वे बरबस ही ईश्वर के गुणगान, उसके समक्ष नतमस्तक होने और रोने पर विवश हो जाते हैं और उनके ये आंसू ईश्वर तथा उसके कथन की पहचान और महानता के कारण होते हैं।

    क़ुरआने मजीद की तिलावत, मनुष्य को सदैव ही परिपूर्णता की ओर ले जाती है और ईश्वर के प्रति विनम्र बनाती है जो सभी परिपूर्णताओं का स्रोत है।

    उपासना विशेष कर सज्दे की स्थिति में रोना अत्यंत मूल्यवान है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 110 की तिलावत सुनें।

    قُلِ ادْعُوا اللَّهَ أَوِ ادْعُوا الرَّحْمَنَ أَيًّا مَا تَدْعُوا فَلَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَى وَلَا تَجْهَرْ بِصَلَاتِكَ وَلَا تُخَافِتْ بِهَا وَابْتَغِ بَيْنَ ذَلِكَ سَبِيلًا (110)

    (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि तुम उसे अल्लाह कह कर पुकारो या रहमान कह कर पुकारो, जिस प्रकार से भी पुकारोगे, सबसे अच्छे नाम उसी के हैं। और आप अपनी नमाज़ को न तो अधिक ऊंची आवाज़ में पढ़िए और न ही बहुत धीमी आवाज़ में पढ़िए बल्कि (इन दोनों के) बीच का मार्ग अपनाइए।(17:110)

    इतिहास में वर्णित है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम मस्जिदुल हराम में दुआ करते थे और कहते थे कि या अल्लाह व या रहमान अर्थात हे ईश्वर और हे सबसे बड़े दयालु! कुछ लोग सोचते थे कि वे दो ईश्वरों को पुकारते हैं जिनमें से एक का नाम अल्लाह है और दूसरे का रहमान। उसी समय यह आयत आई जिसमें कहा गया है कि दोनों नाम एक ही ईश्वर के हैं और इन दो नामों के अतिरिक्त भी ईश्वर के अनेक नाम और गुण हैं और उसकी परिपूर्णता के किसी न किसी आयाम को दर्शाते हैं। अतः तुम लोग ईश्वर को इनमें से किसी भी नाम से पुकार सकते हो।

    इसी प्रकार जब भी पैग़म्बरे इस्लाम (स) ऊंची आवाज़ में नमाज़ पढ़ते थे तो अनेकेश्वरवादी ऊंची आवाज़ में कुछ शेर पढ़ कर उनका ध्यान बंटाने का प्रयास करते थे और जब वे धीमी आवाज़ में नमाज़ पढ़ते थे तो उनके साथी नहीं सुन पाते थे। इसी कारण इस आयत ने उन्हें ऊंची और धीमी आवाज़ के बीच का मार्ग अपनाने की सिफ़ारिश की और सैद्धांतिक रूप से इस्लाम कर्म तथा उपासना की शैली और उसकी गुणवत्ता पर ध्यान देता है विशेष कर नमाज़ पर जिसे विशेष शैली में पढ़ा जाता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि सबसे अच्छे नाम और गुण, जिनमें संदेश पाया जाता है, ईश्वर के हैं और ईश्वर तथा उसके नामों के बीच संपूर्ण ताल-मेल पाया जाता है किंतु आज के संसार में बहुत से लोगों के व्यक्तित्व और उनके नाम के बीच विरोधाभास होता है।

    इस्लाम एक मध्यमार्गी व संतुलन का धर्म है। नमाज़ पढ़ते समय भी आवाज़ में संतुलन होना चाहिए।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 111 की तिलावत सुनें।

    وَقُلِ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي لَمْ يَتَّخِذْ وَلَدًا وَلَمْ يَكُنْ لَهُ شَرِيكٌ فِي الْمُلْكِ وَلَمْ يَكُنْ لَهُ وَلِيٌّ مِنَ الذُّلِّ وَكَبِّرْهُ تَكْبِيرًا (111)

    और (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि समस्त प्रशंसाएं ईश्वर के लिए हैं जिसने न किसी को अपनी संतान बनाया है और न तो उसके राज्य में कोई उसका सहभागी है और न ही कोई उसकी कमज़ोरी के कारण उसका संरक्षक है और इस प्रकार उसकी महानता की घोषणा करते रहो जिस प्रकार करना चाहिए।(17:111)

    क़ुरआने मजीद के कुछ सूरे ईश्वर के गुणगान से आरंभ होते हैं। यह सूरा अर्थात सूरए इसरा भी ईश्वर के गुणगान से आरंभ हुआ था और उसके गुणगान से ही समाप्त हो रहा है। अलबत्ता ऐसा गुणगान जो उसे हर प्रकार की कमी से दूर रखता हो क्योंकि यह आयत ईश्वर को हर प्रकार के संरक्षक, सहभागी, जीवन साथी और संतान से पवित्र बताते हुए कहती है कि ईश्वर किसी भी प्रकार की कमज़ोरी और अक्षमता से दूर है। स्वाभाविक रूप से इस प्रकार का ईश्वर महान समझे जाने योग्य है।

    इस आयत से हमने सीखा कि अलहम्दो लिल्लाह अर्थात समस्त प्रशंसाएं ईश्वर के लिए हैं, सुबहानल्लाह अर्थात ईश्वर हर प्रकार की कमी से दूर है और अल्लाहो अकबर अर्थात ईश्वर सबसे महान है जैसे शब्दों को दोहराते रहना, सभी पैग़म्बरों व ईमान वालों के लिए ईश्वरीय सिफ़ारिश है।

    ईश्वर को किसी भी वस्तु की तनिक भी आवश्यकता नहीं है, वह माता-पिता और संतान से आवश्यकतामुक्त है अतः उसे साधारण मनुष्यों की भांति नहीं समझना चाहिए बल्कि उसे इन बातों से पवित्र समझना चाहिए।