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    सूरए इसरा, आयतें 11-14, (कार्यक्रम 477)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 11 की तिलावत सुनें।

    وَيَدْعُ الْإِنْسَانُ بِالشَّرِّ دُعَاءَهُ بِالْخَيْرِ وَكَانَ الْإِنْسَانُ عَجُولًا (11)

    और मनुष्य बुराई की इसी प्रकार इच्छा करता है जैसे वह भलाई को चाहता है और मनुष्य सदैव ही उतावला रहा है।(17:11)

    क़ुरआने मजीद में मनुष्य के बारे में उतावले और कंजूस होने जैसे कई अवगुणों का उल्लेख किया गया है कि जो सबके सब अप्रशिक्षित मनुष्यों से संबंधित हैं। अर्थात यदि मनुष्य का सही प्रशिक्षण न हो तो ये अवगुण उसमें प्रकट होने लगते हैं। ये सभी अवगुण, मनुष्य के मायामोह को दर्शाते हैं।

    यह आयत कहती है कि चूंकि मनुष्य सदैव अधिक से अधिक लाभ कमाने के प्रयास में रहता है अतः अनेक अवसरों पर वह बिना सोचे-समझे ऐसे निर्णय या काम करता है जो उसके उतावलेपन को दर्शाते हैं। यह उतावलापन उसके लिए लाभ के बजाए हानि और क्षति का कारण बन जाता है। वस्तुतः वह भलाई चाहता है किंतु चूंकि वह बिना सोचे-समझे और उतावलेपन में काम करता है अतः वही काम उसके लिए बुराई बन जाता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से भलाई चाहने वाला है किंतु उतावलेपन और अज्ञानता के कारण वह बुराई को भलाई समझ बैठता है और उसी को प्राप्त करने का प्रयास करता है।

    जल्दबाज़ी और उतावलापन मनुष्य के निर्णय और कर्म पर बुरा प्रभाव डालता है और उसे तबाही के मुहाने पर पहुंचा देता है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 12 की तिलावत सुनें।

    وَجَعَلْنَا اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ آَيَتَيْنِ فَمَحَوْنَا آَيَةَ اللَّيْلِ وَجَعَلْنَا آَيَةَ النَّهَارِ مُبْصِرَةً لِتَبْتَغُوا فَضْلًا مِنْ رَبِّكُمْ وَلِتَعْلَمُوا عَدَدَ السِّنِينَ وَالْحِسَابَ وَكُلَّ شَيْءٍ فَصَّلْنَاهُ تَفْصِيلًا (12)

    और हमने रात और दिन को (अपनी शक्ति व तत्वदर्शिता के) दो चिन्ह बनाया, फिर रात के चिन्ह को अंधकारमय और दिन के चिन्ह को प्रकाशवान बनाया ताकि तुम अपने पालनहार की कृपा से निर्धारित आजीविका की प्राप्ति का प्रयास करो और वर्षों की संख्या तथा हिसाब को जान सको, और हमने हर वस्तु को पूरे विस्तार के साथ स्पष्ट रूप से बयान कर दिया है।(17:12)

    पिछली आयत में उतावलेपन की निंदा के पश्चात क़ुरआने मजीद इस आयत में कहता है कि ईश्वर ने ब्रह्मांड की रचना व्यवस्था, तत्वदर्शिता, युक्ति और सटीक हिसाब-किताब के आधार पर की है। दिन और रात दोनों ही अपने सही समय और स्थान पर प्रकट होते हैं और एक सुव्यवस्थित कार्यक्रम के आधार पर अपना काम करते हैं और उनके काम का सरलता से हिसाब लगाया जा सकता है। तुम लोग भी अपने जीवन के लिए निर्धारित कार्यक्रम बनाओ ताकि ईश्वरीय अनुकंपाओं से सही ढंग से लाभ उठा सको किंतु यदि तुम सृष्टि की व्यवस्था को सही ढंग से पहचाने बिना कोई निर्णय करोगे तो लाभ प्राप्त करने के स्थान पर स्वयं को हानि पहुंचा बैठोगे।

    इस आयत से हमने सीखा कि अपने ध्रुव पर धरती की परिक्रमा तथा दिन और रात का अस्तित्व में आना, ईश्वर के तत्वदर्शितापूर्ण इरादे के अनुसार है और इस युक्ति में लोगों के लाभ को मुख्य रूप से दृष्टिगत रखा गया है।

    ईश्वरीय दया व कृपा, उसकी अनुकंपाओं का मार्ग प्रशस्त करती है किंतु इन अनुकंपाओं को प्राप्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 13 और 14 की तिलावत सुनें।

    وَكُلَّ إِنْسَانٍ أَلْزَمْنَاهُ طَائِرَهُ فِي عُنُقِهِ وَنُخْرِجُ لَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ كِتَابًا يَلْقَاهُ مَنْشُورًا (13) اقْرَأْ كِتَابَكَ كَفَى بِنَفْسِكَ الْيَوْمَ عَلَيْكَ حَسِيبًا (14)

    और हमने हर मनुष्य का कर्मपत्र उसकी गर्दन में लटका दिया है और प्रलय के दिन हम उसके लिए एक पत्र निकालेंगे जिसे वह खुला हुआ पाएगा। (17:13) (उससे कहा जाएगा कि) अपने (कर्म) पत्र को पढ़ो कि आज के दिन अपने हिसाब के लिए स्वयं तुम ही काफ़ी हो।(17:14)

    ये आयतें, जिनमें मनुष्य को प्रलय की याद दिलाई गई है, वस्तुतः पिछली आयतों का ही क्रम जारी रखती हैं कि मनुष्य को यह समझना चाहिए कि यह संसार उसका अंत नहीं है कि वह केवल सांसारिक लक्ष्यों के लिए ही प्रयत्नशील रहे और संसार के लिए ही निर्णय और कर्म करता रहे बल्कि उसके सभी अच्छे और बुरे कर्म ज़ंजीर की भांति उसकी गर्दन से लटके हुए हैं और कभी भी उससे अलग नहीं होंगे। यही कर्म प्रलय के दिन एक विस्तृत और बोलते हुए कर्मपत्र के रूप में उसके समक्ष प्रकट होंगे और फिर उसे अपने सभी कर्मों का उत्तर देना होगा।

    रोचक बात यह है कि क़ुरआने मजीद के शब्दों में मनुष्य का कर्मपत्र इतना पारदर्शी और बोलता हुआ होगा कि किसी न्यायालय अथवा न्यायाधीश की आवश्यकता नहीं होगी जो उस पर आरोपों को तय करे और वह उन आरोपों से स्वयं का बचाव करे, बल्कि हर मनुष्य स्वयं ही अपने कर्मों का फ़ैसला कर सकता है और समझ सकता है कि उसके कर्मों का परिणाम क्या है तथा किस प्रकार का अंत उसकी प्रतीक्षा कर रहा है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि हर मनुष्य का कर्म न केवल इस संसार तक बल्कि प्रलय तक सदा उसके साथ रहता है तथा हर व्यक्ति का कल्याण या बर्बादी स्वयं उसके कर्मों पर निर्भर है।

    मनुष्य जो कुछ भी करता या कहता है वह इस संसार में सुरक्षित रहता है तथा प्रलय के दिन कर्मपत्र के रूप में उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाता है।

    प्रलय, एकमात्र ऐसा न्यायालय है जहां अपराधी अपने पाप और अपराध का इन्कार नहीं कर सकता बल्कि वह स्वयं अपने विरुद्ध फ़ैसला भी जारी करता है।