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    सूरए इसरा, आयतें 15-17, (कार्यक्रम 478)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 15 की तिलावत सुनें।

    مَنِ اهْتَدَى فَإِنَّمَا يَهْتَدِي لِنَفْسِهِ وَمَنْ ضَلَّ فَإِنَّمَا يَضِلُّ عَلَيْهَا وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى وَمَا كُنَّا مُعَذِّبِينَ حَتَّى نَبْعَثَ رَسُولًا (15)

    जो कोई मार्गदर्शन प्राप्त करता है वह अपने हित में मार्गदर्शन प्राप्त करता है और जो कोई पथभ्रष्ट होता है तो वह भी अपने अहित में पथभ्रष्ट होता है तथा कोई भी किसी (के पाप) का बोझ नहीं उठाएगा। और निश्चित रूप से जब तक हम (किसी जाति के मध्य अपना कोई) पैग़म्बर न भेज दें, तब तक (उसे) दण्डित नहीं करते।(17:15)

    यह आयत ईश्वर की ओर से कर्मों पर दण्ड अथवा पारितोषिक दिए जाने की व्यवस्था के बारे में तीन मूल सिद्धांतों की ओर संकेत करते हुए कहती है कि प्रथम तो यह कि तुम्हारे ईमान अथवा कुफ़्र से ईश्वर को कोई लाभ या हानि नहीं होती बल्कि इसका परिणाम स्वयं तुम लोगों को प्राप्त होता है। यदि तुम ईश्वरीय मार्गदर्शन को स्वीकार करके ईश्वर के आदेशों का पालन करो तो तुम अपने ही हित में काम करोगे और यदि तुमने इसके विपरीत किया तो इसकी हानि भी तुम्हीं को सहन करनी होगी।

    दूसरा सिद्धांत यह है कि हर किसी के कर्म का परिणाम स्वयं उसी के सामने आता है। ईश्वर न तो किसी का पाप किसी दूसरे पर डालता है और न ही इस बात को स्वीकार करता है कि किसी को किसी दूसरे के स्थान पर दंडित किया जाए जिस प्रकार से कि इस संसार में कुछ लोग अपना अपराध दूसरों की गर्दन में डाल देते हैं और स्वयं दंडित होने से बच जाते हैं।

    तीसरा सिद्धांत कि जो ईश्वर की सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक है और जिसका वर्णन क़ुरआने मजीद में विभिन्न रूपों में किया गया है, यह है कि जब तक ईश्वर पैग़म्बर या पथ प्रदर्शक न भेजे और लोगों का मार्गदर्शन न करे, वह उन्हें कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद के अपराध में दण्डित नहीं करता। यह लोगों पर ईश्वर की कृपा है कि वह जब तक लोगों के लिए मार्गदर्शन का पूरा प्रबंध नहीं कर देता उन्हें दंडित नहीं करता।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने मनुष्य को चयन का अधिकार दिया है ताकि वह अपनी इच्छा से अपने जीवन के मार्ग का चयन कर सके।

    ईश्वर किसी भी व्यक्ति या जाति को उस समय तक दंडित नहीं करता जब तक उसे सही मार्ग नहीं दिखा देता।

    मनुष्य के कल्याण के लिए केवल बुद्धि पर्याप्त नहीं है, ईश्वरीय दूतों का मार्गदर्शन भी आवश्यक है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 16 की तिलावत सुनें।

    وَإِذَا أَرَدْنَا أَنْ نُهْلِكَ قَرْيَةً أَمَرْنَا مُتْرَفِيهَا فَفَسَقُوا فِيهَا فَحَقَّ عَلَيْهَا الْقَوْلُ فَدَمَّرْنَاهَا تَدْمِيرًا (16)

    जब हम किसी बस्ती को विनष्ट करना चाहते हैं तो उसके सरदारों और धनवान लोगों के पास अपना आदेश भेज देते हैं, तो वे उसकी अवज्ञा करते हैं और दंड के पात्र बन जाते हैं फिर हम उस बस्ती को पूर्ण रूप से विनष्ट कर देते हैं।(17:16)

    पिछली आयत में इस बात की ओर संकेत करने के बाद कि जब तक ईश्वर मार्गदर्शन का प्रबंध नहीं कर देता तब तक किसी को दंडित नहीं करता, इस आयत में क़ुरआने मजीद कहता है कि जब ईश्वर किसी क्षेत्र के लोगों को तबाह करना चाहता है उससे पूर्व अवश्य ही अपने बाध्यकारी और वर्जित आदेश उनके समक्ष बयान कर देता है और जब वे उन आदेशों की अवज्ञा करते हैं तो फिर ईश्वरीय दंड में ग्रस्त हो जाते हैं।

    चूंकि प्रायः मानव समाज के तथाकथित प्रतिष्ठित लोग अशिष्ट और धनाड्य होते हैं अतः इस आयत में ईश्वरीय आदेशों का संबोधन उन्हीं लोगों से है क्योंकि प्रायः लोग उनके आदेशों का पालन करते हैं। यही कारण है कि उनके पाप और बुरे कर्म केवल उन्हीं तक सीमित नहीं रहते बल्कि पूरे समाज को अपनी चपेट में ले लेते हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि मानव समाज की तबाही और बर्बादी का मुख्य कारण संसार का प्रेम, धन का मोह और ऐश्वर्य है।

    ऐश्वर्य प्रेमी सत्तालोलुप नेता समाज में नैतिक मान्यताओं के पतन और ईश्वरीय कोप का मार्ग प्रशस्त होने का कारण बनते हैं।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 17 की तिलावत सुनें।

    وَكَمْ أَهْلَكْنَا مِنَ الْقُرُونِ مِنْ بَعْدِ نُوحٍ وَكَفَى بِرَبِّكَ بِذُنُوبِ عِبَادِهِ خَبِيرًا بَصِيرًا (17)

    और हमने नूह के पश्चात कितनी अधिक जातियों को (उनके पापों के चलते) विनष्ट कर दिया। और यही काफ़ी है कि तुम्हारा पालनहार अपने बंदों के पापों को जानने वाला और देखने वाला है।(17:17)

    पिछली आयत में एक ऐतिहासिक परंपरा का वर्णन करने के पश्चात इस आयत में कहा गया है कि यदि तुम इतिहास पर दृष्टि डालो तो देखोगे कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के बाद, जब धरती को नया जीवन मिला और नई नई जातियां और समुदाय अस्तित्व में आए और धरती पर फैलते गए, बहुत सी जातियां विनष्ट हो गईं और उनके पाप के चिन्ह तक बाक़ी न रहे।

    जैसा कि सभी जानते हैं, हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के काल में ईश्वरीय कोप के रूप में एक भयंकर समुद्री तूफ़ान आया था और पूरी धरती को पानी की लहरों ने अपनी चपेट में ले लिया था। इस तूफ़ान के कारण धरती पर रहने वाले सभी जीवों का अंत हो गया था केवल वही प्राणी जीवित बचे थे जो हज़रत नूह के जहाज़ में सवार थे।

    यह आयत भली भांति दर्शाती है कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम का काल मानव इतिहास का एक नया मोड़ है और मानव जाति की पिछली पीढ़ी के विनाश के बाद मनुष्य के जीवन का एक नया अध्याय आरंभ हुआ। क़ुरआने मजीद की आयतों और ऐतिहासिक प्रमाणों से पता चलता है कि आद, समूद, लूत, मदयन और कुछ दूसरी जातियां, हज़रत नूह के पश्चात विनष्ट हुई हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय कोप, प्रलय से विशेष नहीं है बल्कि इसी संसार में बहुत सी जातियां और समुदाय ईश्वरीय कोप के पात्र बन चुके हैं।

    इतिहास, मनुष्य के वर्तमान तथा भविष्य के लिए पाठ है कि वह ईश्वरीय कोप की ओर से निश्चेत न रहे।

    लोगों के कर्मों के संबंध में ईश्वर का ज्ञान, उनकी कथनी, करनी और प्रशिक्षण के नियंत्रण का सबसे उचित साधन है।