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    सूरए इसरा, आयतें 18-21, (कार्यक्रम 479)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 18 की तिलावत सुनें।

    مَنْ كَانَ يُرِيدُ الْعَاجِلَةَ عَجَّلْنَا لَهُ فِيهَا مَا نَشَاءُ لِمَنْ نُرِيدُ ثُمَّ جَعَلْنَا لَهُ جَهَنَّمَ يَصْلَاهَا مَذْمُومًا مَدْحُورًا (18)

    जो कोई तेज़ी से गुज़र जाने वाले (इस संसार) को चाहता है तो हम जिसे जितना चाहते हैं बड़ी तीव्रता से प्रदान कर देते हैं, फिर उसके लिए नरक भी तैयार कर देते हैं जिसमें वह अपमान के साथ तथा (ईश्वरीय दया से) दुत्कारे हुए व्यक्ति की भांति प्रविष्ट होगा।(17:18)

    यह आयत उन लोगों के बारे में है जो या तो प्रलय का इन्कार कर देते हैं या फिर उसकी ओर से निश्चेत रहते हुए केवल संसार प्राप्ति को ही अपना लक्ष्य बना लेते हैं। स्वाभाविक सी बात है कि इस प्रकार के लोग, परलोक के लिए कोई काम नहीं करते तथा प्रलय के दिन उन्हें स्वर्ग में जाने की आशा नहीं रखनी चाहिए।

    संसार प्राप्ति के बारे में भी ऐसा नहीं है कि वे जो कुछ चाहें उन्हें प्राप्त हो जाए क्योंकि सैद्धांतिक रूप से संसार में इतनी क्षमता नहीं है कि वह सभी की आशाओं, आकांक्षाओं और इच्छाओं की पूर्ति कर सके। यही कारण है कि ईश्वर कहता है कि इस नश्वर संसार में भी केवल कुछ लोगों की कुछ इच्छाएं पूरी की जाती हैं और वह भी स्वयं संसार की भांति नश्वर और तेज़ी से गुज़र जाने वाली होती हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि संसारप्रेम और मायामोह जिससे मनुष्य परलोक के प्रति निश्चेत बन जाता है, प्रलय में उसके घाटे का कारण है।

    भौतिक मामलों में सीमितता पाई जाती है इसी लिए हर किसी की हर इच्छा पूरी नहीं होती किंतु आध्यात्मिक मामलों की पूर्ति की कोई सीमा नहीं है और हर कोई प्रयास व प्रयत्न करने की स्थिति में अपनी सभी आध्यात्मिक इच्छाओं की पूर्ति कर सकता है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 19 की तिलावत सुनें।

    وَمَنْ أَرَادَ الْآَخِرَةَ وَسَعَى لَهَا سَعْيَهَا وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَأُولَئِكَ كَانَ سَعْيُهُمْ مَشْكُورًا (19)

    और जो कोई प्रलय की इच्छा रखता हो तथा उसके लिए ऐसी स्थिति में (भरसक) प्रयास करे कि वह ईश्वर पर ईमान रखता हो तो ऐसे ही लोगों के प्रयास आभार के पात्र होते हैं।(17:19)

    पिछली आयत में संसार के मायामोह में ग्रस्त लोगों की स्थिति का उल्लेख करने के पश्चात क़ुरआने मजीद इस आयत में कहता है कि जो कोई प्रलय संवारने के उद्देश्य से सांसारिक प्रयास करता हो और ईश्वर पर ईमान के आधार पर अपने सांसारिक मामलों का संचालन करता हो, उसके प्रयास ईश्वरीय पारितोषिक का पात्र बनेंगे और प्रलय में स्वर्ग के रूप में उसके सामने आएंगे।

    इस आयत और पिछली आयत की तुलना करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि परलोक के लिए किए जाने वाले हर प्रयास का यदि संसार में कोई प्रतिफल न भी मिले तब भी प्रलय में अवश्य ही पारितोषिक मिलेगा, जबकि संसार के लिए किए जाने वाले हर प्रयत्न का संसार में सफल रहना आवश्यक नहीं है और प्रलय में संसार का मायामोह मनुष्य के घाटे का कारण भी बनेगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि वास्तविक कल्याण व सौभाग्य, परलोक के लिए प्रयास करने पर निर्भर है। ईश्वर पर ईमान रखने वाला व्यक्ति काम-काज जैसे अपने सांसारिक काम भी ईश्वर के लिए और उसके आदेशों का पालन करते हुए करता है, अतः उसके हर कार्य का प्रतिफल प्रलय में सुरक्षित रहता है।

    हमें अपने दायित्व का पालन करना चाहिए, परिणाम पर ध्यान नहीं देना चाहिए, हमें अपनी क्षमता के अनुसार प्रयास करते रहना चाहिए क्योंकि परिणाम हमारे अधिकार में नहीं है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 20 की तिलावत सुनें।

    كُلًّا نُمِدُّ هَؤُلَاءِ وَهَؤُلَاءِ مِنْ عَطَاءِ رَبِّكَ وَمَا كَانَ عَطَاءُ رَبِّكَ مَحْظُورًا (20)

    हम आपके पालनहार की देन द्वारा इनकी और उनकी अर्थात दोनों गुटों की सहायता करते हैं और आपके पालनहार की से किसी को वंचित नहीं रखा जाता।(17:20)

    पिछली दो आयतों में संसारप्रेमियों और प्रलयप्रेमियों की स्थिति का वर्णन करने के पश्चात इस आयत में क़ुरआने मजीद कहता है कि संसार में ईश्वर की परंपरा यह है कि वह दोनों ही गुटों को अपनी दया व कृपा का पात्र बनाता है क्योंकि उसने सभी मनुष्यों को चयन का अधिकार दिया है और वह उन्हें अपना लक्ष्य प्राप्त करने हेतु सांसारिक संभावनाओं की प्राप्ति से रोकता नहीं है बल्कि वह उनकी सहायता भी करता है किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि वह संसारप्रेमियों के कर्मों से प्रसन्न होता है जिस प्रकार से कि काफ़िरों तथा अनेकेश्वरवादियों को आजीविका प्रदान करना, उनके कार्यों से ईश्वर के राज़ी रहने के अर्थ में नहीं है।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर पर ईमान और प्रलय में सौभाग्य की इच्छा, भौतिक एवं सांसारिक संभावनाओं से लाभ उठाने से विरोधाभास नहीं रखती।

    ईश्वर की ओर से मिलने वाली अनुकंपाएं उसकी दया व कृपा के आधार पर हैं अन्यथा वह हमारा ऋणी नहीं है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 21 की तिलावत सुनें।

    انْظُرْ كَيْفَ فَضَّلْنَا بَعْضَهُمْ عَلَى بَعْضٍ وَلَلْآَخِرَةُ أَكْبَرُ دَرَجَاتٍ وَأَكْبَرُ تَفْضِيلًا (21)

    देखिए कि हमने किस प्रकार कुछ को कुछ दूसरों पर श्रेष्ठता प्रदान की है और निश्चित रूप से प्रलय में मिलने वाले दर्जे अधिक बड़े और अधिक श्रेष्ठ हैं।(17:21)

    पिछली आयत में ईश्वर ने कहा था कि हम संसार में सभी लोगों को अपनी दया व कृपा का पात्र बनाते हैं, यह आयत कहती है कि यह बात भी दृष्टिगत रहे कि ईश्वर सभी लोगों को एक समान आजीविका और संभावनाएं प्रदान नहीं करता बल्कि उसने अपनी तत्वदर्शिता के आधार पर वैचारिक एवं अन्य क्षमताओं से लाभ उठाने में लोगों के बीच अंतर रखा है।

    अलबत्ता स्पष्ट है कि ईश्वर जिसको जितनी अधिक संभावनाएं प्रदान करता है उतनी ही उसकी परीक्षाएं भी लेता है तथा उससे दायित्व एवं कटिबद्धता की उतनी ही अपेक्षा भी रखता है।

    अंत में आयत कहती है कि लोगों के सांसारिक अंतर महत्वपूर्ण नहीं होते बल्कि महत्वपूर्ण बात यह है कि जो कोई अधिक प्रयास करेगा उसे प्रलय में अधिक लाभ प्राप्त होगा तथा उसके दर्जे अधिक उच्च होंगे।

    इस आयत से हमने सीखा कि लोगों के बीच पाए जाने वाले अंतर को भेदभाव नहीं समझना चाहिए बल्कि ध्यान देने से यह बात समझी जा सकती है कि ये अंतर तत्वदर्शिता के आधार पर हैं और सृष्टि के लिए आवश्यक भी हैं।

    सांसरिक श्रेष्ठता के प्रयास में नहीं रहना चाहिए कि यह जल्दी गुज़र जाने वाली एवं नश्वर है, हमें परलोक की प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए कि वास्तविक दर्जे वहीं पर हैं।