islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए इसरा, आयतें 22-24, (कार्यक्रम 480)

    सूरए इसरा, आयतें 22-24, (कार्यक्रम 480)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 22 की तिलावत सुनें।

    لَا تَجْعَلْ مَعَ اللَّهِ إِلَهًا آَخَرَ فَتَقْعُدَ مَذْمُومًا مَخْذُولًا (22)

    अल्लाह के साथ किसी अन्य को पूज्य न ठहराओ कि तुम निंदनीय व असहाय बैठे रह जाओगे।(17:22)

    यह छोटी सी आयत इस संसार में अनेकेश्वरवाद के परिणामों की ओर संकेत करते हुए कहती है कि आस्था या कर्म में किसी भी प्रकार का अनेकेश्वरवाद, मनुष्य में कमज़ोरी, अपमान एवं लज्जित होने का कारण बनता है क्योंकि ईश्वर, अनेकेश्वरवादी को अपनी दया व कृपा का पात्र नहीं बनाता। इस प्रकार का व्यक्ति निश्चित रूप से अनेक समस्याओं और कठिनाइयों में ग्रस्त होता है जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण निराश और निर्लक्ष्य होना है।

    दूसरी ओर चूंकि अनेकेश्वरवाद का कोई बौद्धिक व तर्कसंगत कारण नहीं है, इसलिए यह निंदा का कारण बनता है और अनेकेश्वरवादी सदैव लज्जित रहता है। साथ ही कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति उसकी बात को स्वीकार नहीं करता।

    इस आयत से हमने सीखा कि गौरव व सम्मान, एकेश्वरवाद की छाया में ही प्राप्त होता है और कर्म व आस्था में किसी भी प्रकार का अनेकेश्वरवाद, अपमान एवं लज्जा का कारण बनता है।

    अधर्मी शिक्षाओं का पालन, मनुष्य को बंद गली में पहुंचा देता है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 23 की तिलावत सुनें।

    وَقَضَى رَبُّكَ أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا إِيَّاهُ وَبِالْوَالِدَيْنِ إِحْسَانًا إِمَّا يَبْلُغَنَّ عِنْدَكَ الْكِبَرَ أَحَدُهُمَا أَوْ كِلَاهُمَا فَلَا تَقُلْ لَهُمَا أُفٍّ وَلَا تَنْهَرْهُمَا وَقُلْ لَهُمَا قَوْلًا كَرِيمًا (23)

    और आपके पालनहार ने यह निर्धारित कर दिया है कि उसके अतिरिक्त किसी की भी उपासना न कीजिए और अपने माता-पिता के साथ भलाई कीजिए। यदि उन दोनों में से कोई एक या दोनों आपके पास बुढ़ापे को पहुंच जाएं तो उनसे उफ़ तक न कहिए और न उन्हें झिड़किए और उनके साथ बहुत आदर से बात कीजिए।(17:23)

    पिछली आयत में अनेकेश्वरवाद से रोकने के पश्चात यह आयत कहती है कि सभी कालों और स्थानों के लिए ईश्वर का निश्चित आदेश यह है कि उसके अतिरिक्त किसी की उपासना न की जाए ताकि सदैव एकेश्वरवाद ही जीवन के सभी मामलों का ध्रुव बना रहे। इसके पश्चात क़ुरआने मजीद कहता है कि एकेश्वरवाद के बाद, माता-पिता के साथ भलाई सबसे महत्वपूर्ण है और ईश्वर ने उनके साथ भलाई को एकेश्वरवाद पर आस्था के साथ रखा है जिससे इस विषय के महत्व का पता चलता है।

    यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि माता-पिता के साथ भलाई का अर्थ केवल उनकी आर्थिक व भौतिक सहायता नहीं है बल्कि उनके साथ किया जाने वाला हर भला कर्म इसमें शामिल है। संभव है कि माता-पिता को आर्थिक सहायता की आवश्यकता ही न हो बल्कि उन्हें देख-भाल और साथ की आवश्यकता हो। इसीलिए आगे चल कर आयत कहती है कि ध्यान रहे कि वृद्धावस्था में उनके साथ कड़ा व्यवहार न किया जाए और उनकी जो मांगें पूरी करना संभव न हो उन पर अप्रसन्न नहीं होना चाहिए बल्कि उनके साथ बात और व्यवहार में आदर और सम्मान का पालन किया जाना चाहिए।

    पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने एक पुत्र से, जिसे अपने पिता की इच्छाओं और अपेक्षाओं के प्रति शिकायत थी, कहा कि तुम भी और तुम्हारा धन भी तुम्हारे पिता का है, उनकी इच्छाओं की पूर्ति में तनिक भी ढिलाई न करो।

    इस आयत से हमने सीखा कि माता-पिता की सेवा और उनके साथ भलाई, हर एकेश्वरवादी तथा ईश्वर पर ईमान रखने वाले व्यक्ति की मूल विशेषताओं में से एक है।

    माता-पिता के साथ भलाई का उल्लेख एकेश्वरवाद तथा ईश्वर के आज्ञापालन के साथ किया गया है ताकि यह पता चल जाए कि यह एक मानवीय दायित्व होने के साथ ही ईश्वरीय प्रतिबद्धता भी है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 24 की तिलावत सुनें।

    وَاخْفِضْ لَهُمَا جَنَاحَ الذُّلِّ مِنَ الرَّحْمَةِ وَقُلْ رَبِّ ارْحَمْهُمَا كَمَا رَبَّيَانِي صَغِيرًا (24)

    और दया व कृपा के साथ उनके समक्ष विनम्रता के पर बिछा दीजिए और कहिए कि प्रभुवर! उन पर दया कर जिस प्रकार से कि उन्होंने बचपन में मुझे पाला-पोसा।(17:24)

    पिछली आयत में माता-पिता के साथ भलाई और बुढ़ापे में उनका ध्यान रखने का आदेश देने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि माता-पिता के साथ तुम्हारा व्यवहार विनम्रता का व्यवहार होना चाहिए। सदैव और हर स्थिति में उनके प्रति विनम्र रहो और कभी भी उनके साथ आदेशात्मक व्यवहार न करो।

    जिस प्रकार से माता-पिता ने बचपन में तुम्हारे साथ प्रेम और स्नेह का व्यवहार किया है तुम भी उनके बुढ़ापे में उनके साथ वैसा ही व्यवहार करो। सदैव उनके लिए प्रार्थना करो और ईश्वर से चाहो कि वह उन्हें अपनी दया व कृपा का पात्र बनाए। केवल उनके जीवन तक ही नहीं बल्कि माता-पिता के निधन के बाद भी उनके लिए प्रार्थना करते रहना चाहिए और ईश्वर से उनके लिए क्षमा याचना करते रहना चाहिए।

    यद्यपि ये आयतें वास्तविक माता-पिता के बारे में हैं किंतु पैग़म्बरे इस्लाम (स) तथा उनके परिजनों के कथनों के अनुसार शिक्षक और प्रशिक्षक भी माता अथवा पिता के समान ही हैं। जैसा कि क़ुरआने मजीद हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बारे में कहता है कि तुम्हारे पिता इब्राहीम का धर्म। इस आयत में हज़रत इब्राहीम को सभी एकेश्वरवादियों और मुसलमानों का पिता बताया गया है। इसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का प्रख्यात कथन है कि मैं और अली इस समुदाय अर्थात मुसलमानों के दो पिता हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि संतान, धन अथवा सामाजिक दृष्टि से जिस पद और स्थान पर भी पहुंच जाए उसे माता-पिता के प्रति सही अर्थों में विनम्र रहना चाहिए और उनके समक्ष अपने पद अथवा धन पर इतराना नहीं चाहिए।

    संतान का एक दायित्व अपने माता-पिता के लिए प्रार्थना करते रहना है, चाहे वे जीवित हों अथवा परलोक सिधार गए हों।

    मनुष्य को अपने प्रशिक्षकों के प्रति आभारी रहना चहिए और उनके साथ प्रेम व स्नेह का व्यवहार करना चाहिए।