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    सूरए इसरा, आयतें 25-28, (कार्यक्रम 481)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 25 की तिलावत सुनें।

    رَبُّكُمْ أَعْلَمُ بِمَا فِي نُفُوسِكُمْ إِنْ تَكُونُوا صَالِحِينَ فَإِنَّهُ كَانَ لِلْأَوَّابِينَ غَفُورًا (25)

    जो कुछ तुम्हारे भीतर है, उसके बारे में तुम्हारा पालनहार अधिक ज्ञान रखने वाला है। यदि तुम भले (बन कर) रहोगे तो निश्चित रूप से वह तौबा अर्थात प्रायश्चित करने वालों के लिए अत्यंत क्षमाशील है।(17:25)

    इससे पहले माता-पिता के सम्मान और उनके साथ भलाई करने से संबंधित आयतों का वर्णन किया गया। यह आयत कहती है कि कुछ लोग उस प्रकार से अपने माता-पिता के अधिकारों को पूरा नहीं करते जिस प्रकार से करना चाहिए तथा उनके देखने, कथनी और व्यवहार में अनादर दिखाई पड़ता है और ईश्वर इन सबसे अवगत है। इसके बावजूद ये लोग यदि तौबा व प्रायश्चित करें और अतीत की भूलों को सुधारते हुए अच्छा व्यवहार करने लगें तो ईश्वर उनके पापों को क्षमा कर देगा।

    यह आयत दर्शाती है कि माता-पिता का सम्मान, केवल एक नैतिक सिफ़ारिश नहीं बल्कि एक धार्मिक कर्तव्य है अतः ऐसा हर व्यवहार जो उन्हें यातना पहुंचने का कारण बने, पाप समझा जाता है और दोषी व्यक्ति को उसकी क्षतिपूर्ति का प्रयास करना चाहिए अन्यथा वह ईश्वरीय कोप और दंड का पात्र बनेगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि कभी कभी भले लोगों से भी कुछ भूल हो जाती है, उन्हें तुरंत ही तौबा व प्रायश्चित करके उसे सुधारना चाहिए।

    ईश्वर न केवल यह कि हमारे कर्मों से बल्कि हमारे इरादों और भावनाओं से भी अवगत है तथा उसके ज्ञान में कोई भी त्रुटि नहीं है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 26 और 27 की तिलावत सुनें।

    وَآَتِ ذَا الْقُرْبَى حَقَّهُ وَالْمِسْكِينَ وَابْنَ السَّبِيلِ وَلَا تُبَذِّرْ تَبْذِيرًا (26) إِنَّ الْمُبَذِّرِينَ كَانُوا إِخْوَانَ الشَّيَاطِينِ وَكَانَ الشَّيْطَانُ لِرَبِّهِ كَفُورًا (27)

    और (हे पैग़म्बर!) अपने निकट परिजनों, वंचितों और मार्ग में रह जाने वालों का अधिकार दे दीजिए और (देखिए इसमें) अपव्यय न होने पाए। (17:26) निश्चित रूप से अपव्यय करने वाले शैतान के भाई हैं और शैतान अपने पालनहार के प्रति कृतघ्न था।(17:27)

    लोगों पर माता-पिता के अधिकारों का वर्णन करने के पश्चात क़ुरआने मजीद इन आयतों में परिजनों और दरिद्रों व वंचितों के अधिकारों का उल्लेख करता है और कहता है कि इन लोगों के तुम पर कुछ अधिकार हैं जिन्हें तुम्हें पूरा करना चाहिए।

    खेद के साथ कहना पड़ता है कि समाज में कुछ लोग दूसरों की सहायता करने के संबंध में या तो कमी करते हैं या फिर अतिश्योक्ति से काम लेते हैं। कुछ लोग केवल अपने और अपने परिवार के विचार में रहते हैं और दूसरों के बारे में यहां तक कि अपने निकट परिजनों के संबंध में भी कोई विचार नहीं करते।

    इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने परिवार को ही भूल जाते हैं और केवल अपने मित्रों और परिजनों की समस्याओं को दूर करने को ही अपना कर्तव्य समझते हैं। ये आयतें इन दोनों ही शैलियों की आलोचना करते हुए कहती हैं कि दूसरों की सहायता के विचार में भी रहना चाहिए और अतिश्योक्ति भी नहीं करनी चाहिए कि जो एक प्रकार का अपव्यय है।

    अगली आयत अपव्यय करने वाले को शैतान का मित्र बताती है क्योंकि अनुचित स्थान पर अथवा तर्कहीन ढंग से माल को ख़र्च करना एक प्रकार से ईश्वरीय अनुकंपाओं के प्रति कृतघ्नता है और शैतान ने सबसे पहले ईश्वर के प्रति कृतघ्नता की थी क्योंकि ईश्वर ने जो कुछ उसे दिया है उसे वह लोगों को धोखा देने, बहकाने और पाप की ओर आमंत्रित करने के लिए प्रयोग करता है।

    यद्यपि अपव्यय का मामला अधिकांश, आर्थिक क्षेत्र में प्रस्तुत किया जाता है किंतु सबसे बड़ा अपव्यय अपनी आयु और युवावस्था को बर्बाद करना है। यदि मनुष्य ईश्वर द्वारा प्रदान किए गए जीवन तथा अन्य संभावनाओं से लाभ न उठाए या अनुचित मार्ग में उन्हें प्रयोग करे तो ये दोनों ही बातें उसके घाटे का कारण बनेंगी।

    इन आयतों से हमने सीखा कि भलाई करते समय प्राथमिकताओं को दृष्टिगत रखना चाहिए। सबसे पहले माता-पिता, फिर परिजन और उसके बाद समाज के दरिद्र एवं वंचित लोगों की सहायता करनी चाहिए।

    धनवान, जो कुछ दरिद्रों को देते हैं वह उनका अधिकार है अतः धनवानों को वंचितों और दरिद्रों पर उपकार नहीं जताना चाहिए।

    दान-दक्षिणा में संतुलन से काम लेना चाहिए और हर प्रकार के अपव्यय से दूर रहना चाहिए।

    आइए अब सूरए इसरा की आयत नंबर 28 की तिलावत सुनें।

    وَإِمَّا تُعْرِضَنَّ عَنْهُمُ ابْتِغَاءَ رَحْمَةٍ مِنْ رَبِّكَ تَرْجُوهَا فَقُلْ لَهُمْ قَوْلًا مَيْسُورًا (28)

    और यदि तुम्हें अपने पालनहार की कृपा की प्रतीक्षा में, जिसकी तुम्हें आशा है, उनसे अर्थात दरिद्रों व वंचितों से मुंह मोड़ना भी पड़े तो उनके साथ बड़ी नर्मी से बात करो।(17:28)

    पिछली आयत में कहा गया था कि अपने परिजनों और दरिद्रों के साथ भलाई करनी चाहिए और उनकी आर्थिक सहायता करनी चाहिए। यह आयत कहती है कि यदि तुम्हारे पास ऐसी कोई वस्तु न हो जिसे तुम उन्हें दे सको तो कम से कम उनके साथ प्रेम के साथ बात करके उन्हें प्रसन्न करो। उन्हें यह आशा दिलाओ कि यदि ईश्वर ने तुम्हारी आजीविका में वृद्धि की तो तुम अपनी क्षमता के अनुसार अवश्य ही उनकी सहायता करोगे।

    इतिहास में वर्णित है कि जब भी कोई पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से अपनी आवश्यकता का उल्लेख करता और वे उसे पूरा न कर पाते तो उसके लिए प्रार्थना करते और कहते कि ईश्वर हमें और तुम्हें अपनी कृपा से आजीविका प्रदान करता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि सदैव ही ईश्वर की दया व कृपा की ओर से आशावान रहना चाहिए और दूसरों के साथ नर्मी और प्रेम से बात करके उन्हें भी आशा प्रदान करनी चाहिए।

    यदि हम किसी की आर्थिक सहायता नहीं कर सकते तो कम से कम उसे आशा तो प्रदान करनी ही चाहिए।