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    सूरए इसरा, आयतें 29-31, (कार्यक्रम 482)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 29 की तिलावत सुनें।

    وَلَا تَجْعَلْ يَدَكَ مَغْلُولَةً إِلَى عُنُقِكَ وَلَا تَبْسُطْهَا كُلَّ الْبَسْطِ فَتَقْعُدَ مَلُومًا مَحْسُورًا (29)

    और कभी भी अपने हाथ को (कंजूसी से) अपनी गर्दन से मत बांधो और न (ही दानशीलता से) उसे पूरा खुला छोड़ दो कि इस स्थिति में तुम धिक्कारे हुए और पछताने वाले हो कर बैठ जाओगे।(17:29)

    इससे पहले वाली आयतों में ईश्वर ने माता-पिता, नातेदारों और दरिद्रों के साथ भलाई की सिफ़ारिश की थी। यह आयत कहती है कि भलाई और आर्थिक सहायता में संतुलन से काम लेना चाहिए, न तो इतना कंजूस होना चाहिए कि सदैव हाथ बंधा रहे और न ही इतना दानी होना चाहिए कि अपने पास जो कुछ भी है उसे दूसरों को देकर स्वयं ख़ाली हाथ घर में बैठ जाएं।

    इस्लाम संतुलन का धर्म है और हर प्रकार की कमी और अतिश्योक्ति से रोकता है चाहे वह भले कर्मों में ही क्यों न हो क्योंकि इसका परिणाम पछतावे के अतिरिक्त कुछ नहीं होता।

    इस आयत से हमने सीखा कि जिस प्रकार से कंजूसी अप्रिय है उसी प्रकार से अपव्यय भी इस्लामी शिक्षाओं से मेल नहीं खाता।

    भले और उचित कामों तक में अपव्यय का परिणाम पछतावे के अतिरिक्त कुछ और नहीं होता।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 30 की तिलावत सुनें।

    إِنَّ رَبَّكَ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَنْ يَشَاءُ وَيَقْدِرُ إِنَّهُ كَانَ بِعِبَادِهِ خَبِيرًا بَصِيرًا (30)

    निश्चित रूप से तुम्हारा पालनहार जिसे चाहता है उसकी आजीविका को बढ़ा देता है या कम कर देता है कि निसंदेह वह अपने दासों के बारे में बहुत अधिक ज्ञानी व देखने वाला है।(17:30)

    यह आयत इस संसार में लोगों की आजीविका में अंतर की ओर संकेत करते हुए कहती है कि मूलतः ईश्वर ने सभी लोगों की आजीविका एक समान नहीं रखी है और उसकी परंपरा यह है कि मनुष्यों को एक दूसरे से भिन्न होना चाहिए और यह परंपरा उसके ज्ञान व तत्वदर्शिता के आधार पर है।

    स्पष्ट है कि यह अंतर, अन्यायपूर्ण भेदभाव के अर्थ में नहीं है क्योंकि प्रथम तो यह कि ईश्वर किसी का ऋणी नहीं है कि उसके दावे के अनुसार उसे आजीविका प्रदान करे और दूसरे यह कि वह जिसे, जिस मात्रा में भी आजीविका प्रदान करता है उससे उतना ही दायित्व भी चाहता है। जिसकी आजीविका अधिक होती है उसके कर्तव्य और दायित्व भी ऐसे होते हैं जो दूसरों के नहीं होते।

    इसके अतिरिक्त, यह संसार परीक्षा का स्थान है और हर किसी की किसी न किसी ढंग से परीक्षा ली जाती है, धन संपन्न की दान-दक्षिणा द्वारा और दरिद्र की धैर्य व संयम के माध्यम से परीक्षा ली जाती है।

    अलबत्ता आजीविका की प्राप्ति के लिए प्रयास भी आवश्यक है और हर किसी को अपनी क्षमता भर प्रयास करना चाहिए किंतु मनुष्य को कितनी आजीविका मिलती है यह बात अनेक बाहरी कारकों पर निर्भर है जो मनुष्य के हाथ में नहीं हैं अतः संभव है कि एक समान प्रयास करने वाले दो लोगों को भिन्न-भिन्न परिणाम प्राप्त हों किंतु उन्हें जितनी मात्रा में आजीविका मिलेगी उसी अनुपात में उनका दायित्व भी होगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि हमें इस बात की आशा नहीं रखनी चाहिए कि सभी की आजीविका एक समान होगी बल्कि हमें अपनी क्षमता व योग्यता के अनुसार दरिद्रों की सहायता करनी चाहिए, इससे अधिक हमारा कोई दायित्व नहीं है।

    ईश्वर के सभी काम ज्ञान व तत्वदर्शिता पर आधारित होते हैं, यदि कभी हमें किसी काम का कारण समझ में न आए तो हमें लोगों की आजीविका में अंतर के समान ही अपने ज्ञान पर संदेह करना चाहिए, ईश्वर के कार्य को ग़लत नहीं समझना चाहिए।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 31 की तिलावत सुनें।

    وَلَا تَقْتُلُوا أَوْلَادَكُمْ خَشْيَةَ إِمْلَاقٍ نَحْنُ نَرْزُقُهُمْ وَإِيَّاكُمْ إِنَّ قَتْلَهُمْ كَانَ خِطْئًا كَبِيرًا (31)

    और दरिद्रता के भय से अपनी संतान की हत्या न करो। यह हम ही हैं जो उन्हें भी और तुम्हें भी आजीविका प्रदान करते हैं। निश्चित रूप से उनकी हत्या बहुत बड़ा पाप है।(17:31)

    गर्भपात और शिशुओं की हत्या के कई बहाने हैं जिनमें से एक अर्थात दरिद्रता और आर्थिक दुर्दशा की ओर यह आयत संकेत करती है और कहती है कि क्या तुम यह सोचते हो कि तुम अन्नदाता हो कि दरिद्रता के भय से निर्दोष शिशुओं की हत्या करते हो? ईश्वर है जो उन्हें रोज़ी और आजीविका प्रदान करता है जिस प्रकार से कि वह तुम्हें भी आजीविका देता है।

    स्पष्ट है कि जब दरिद्रता के भय से गर्भपात वैध नहीं है तो फिर किसी भी अन्य कारण से कदापि वैध नहीं हो सकता। वस्तुतः माता या पिता, शिशु के स्वामी नहीं हैं कि वे उसकी जान लेने के बारे में सोचें बल्कि शिशु भी माता-पिता की भांति एक स्वतंत्र व स्वाधीन मनुष्य है और उसका स्वामी तथा अन्नदाता ईश्वर है। ईश्वर ने कदापि इस बात की अनुमति नहीं दी है कि शिशु के जीवन के अधिकार का कोई भी हनन करे चाहे वह माता के गर्भ में ही क्यों न हो।

    रोचक बात यह है कि आज का सभ्य संसार, बच्चियों को जीवित धरती में गाड़ देने के कारण अज्ञानता के काल के अरबों की भर्त्सना करता है जबकि कुछ देशों की संसदों ने गर्भपात को वैध घोषित किया है और माता की इच्छा पर उसका गर्भपात कर दिया जाता है।

    यदि उस समय क्रूर पिता, अपनी नवजात बच्ची को जीवित धरती में गाड़ देता था तो आज माता, जिसे प्रेम व स्नेह का प्रतीक होना चाहिए, इस प्रकार का निंदनीय कृत्य करती है। यदि उस समय केवल लड़कियों पर ही अत्याचार किया जाता था तो आज लड़के और लड़की दोनों ही अपने माता-पिता की स्वार्थी इच्छाओं की बलि चढ़ रहे हैं और मनुष्य के सबसे बड़े अधिकार अर्थात जीवन के अधिकार से उन्हें वंचित किया जा रहा है।

    इस आयत से हमने सीखा कि किसी भी प्रकार के घाटे या हानि का भय, इस बात का औचित्य प्रदान नहीं करता कि दूसरों के अधिकारों विशेष कर उनके जीवन के अधिकार की अनदेखी की जाए।

    रोज़ी व आजीविका ईश्वर के हाथ में है और दरिद्रता का बहाना बना कर गर्भपात नहीं किया जा सकता।