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    सूरए इसरा, आयतें 3-6, (कार्यक्रम 475)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 3 की तिलावत सुनें।

    ذُرِّيَّةَ مَنْ حَمَلْنَا مَعَ نُوحٍ إِنَّهُ كَانَ عَبْدًا شَكُورًا (3)

    हे उन लोगों की पीढ़ियो जिन्हें हम नूह के साथ (नौका में) ले गए। निश्चित रूप से वे ईश्वर के अत्यंत कृतज्ञ दास थे।(17:3)

    इससे पहले वाली आयतों में बताया गया था कि ईश्वर ने बनी इस्राईल के मार्गदर्शन के लिए तौरैत नामक आसमानी पुस्तक भेजी थी। यह आयत उन्हें संबोधित करते हुए कहती है कि ईश्वर की इस महान अनुकंपा पर उसके प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए और उसके आदेशों का पालन करना चाहिए। इसके पश्चात आयत, ईश्वर के कृतज्ञ बंदे के उदाहरण स्वरूप हज़रत नूह अलैहिस्सलाम का परिचय कराती है और कहती है कि तुम्हारे पूर्वज उन लोगों में शामिल थे जिन्हें ईश्वर ने हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के साथ, भीषण तूफ़ान से मुक्ति दिलाई थी। वे कृतज्ञ लोग थे अतः उन्हें मुक्ति प्राप्त हो गई। तुम्हें भी उन्हीं के समान होना चाहिए ताकि तुम्हें भी मुक्ति प्राप्त हो जाए।

    हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की आयु सभी ईश्वरीय पैग़म्बरों से अधिक थी और उन्होंने सबसे अधिक ईश्वरीय धर्म का प्रचार किया। यद्यपि इस मार्ग में उन्हें बहुत यातनाएं और कठिनाइयां सहन करनी पड़ीं किन्तु वे सदैव ईश्वर के प्रति कृतज्ञ रहे और उन्होंने कभी भी उससे अपनी कठिनाइयों की शिकायत नहीं की।

    इस आयत से हमने सीखा कि पूर्वजों के ईमान और उनकी अच्छाइयों की ओर बच्चों तथा नई पीढ़ी का ध्यान केन्द्रित कराना, उनके प्रशिक्षण का एक भावनात्मक मार्ग है।

    हर परिस्थिति में, चाहे कठिनाई या कड़ाई हो अथवा सुख और आराम हो, ईश्वर के प्रति कृतज्ञ रहना, मुक्ति व कल्याण का मूल मंत्र है।

    आइये अब सूरए इसरा की चौथी आयत की तिलावत सुनते हैं

    وَقَضَيْنَا إِلَى بَنِي إسْرائِيلَ فِي الْكِتَابِ لَتُفْسِدُنَّ فِي الْأَرْضِ مَرَّتَيْنِ وَلَتَعْلُنَّ عُلُوًّا كَبِيرًا (4)

    और हमने (अपनी) किताब (तौरैत) में बनी इस्राईल के लिए घोषणा कर दी कि तुम अवश्य ही धरती में दो बार बुराई पैदा करोगे और बहुत अधिक घमंड और अहं से काम लोगे।(17:4)

    पिछली आयत में बनी इस्राईल से अपने संबोधन को जारी रखते हुए यह आयत कहती है कि तुम लोगों ने ईश्वरीय अनुकंपाओं पर कृतज्ञ रहने के स्थान पर धरती में बुराई फैलाने का प्रयास किया, ईश्वर के आदेशों के प्रति उद्दंडता दिखाई और अपने आपको सबसे श्रेष्ठ समझ लिया।

    क़ुरआने मजीद ने विभिन्न आयतों में, पैग़म्बरों की हत्या करने, घूस व ब्याज प्रचलित करने और सत्य को छिपाने जैसी बनी इस्राईल की विभिन्न बुराइयों की ओर संकेत किया है। यह आयत कहती है कि तुम बनी इस्राईल के लोग दो बड़ी बुराइयों में ग्रस्त होगे जिसके कुपरिणाम पूरी धरती को अपनी चपेट में ले लेंगे।

    इस आयत में बुराई और घमंड जैसे दो शब्दों को एक साथ रखा गया है जिससे पता चलता है कि धरती में सभी बुराइयों की जड़ घमंड और स्वयं को श्रेष्ठ समझना है। जैसा कि क़ुरआने मजीद फ़िरऔन के बारे में कहता है कि उसने अपने आपको धरती में सर्वश्रेष्ठ समझ लिया था। इसी प्रकार एक अन्य आयत में कहा गया है कि ईश्वर ने स्वर्ग उन लोगों के लिए बनाया है जो धरती में न तो बुराई फैलाते हैं और न ही घमंड से काम लेते हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि यहूदी जाति और बनी इस्राईल में बुराइयां पहले से प्रचलित थीं और इसका उल्लेख तौरैत में भी हुआ है।

    बहुत से ऐसे भी शोषित व अत्याचारग्रस्त लोग बीते हैं जो सत्ता में आने के बाद स्वयं अत्याचारी व शोषणकर्ता बन गए। बनी इस्राईल जाति, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के माध्यम से फ़िरऔन तथा उसके लोगों के चंगुल से मुक्त हुई थी किन्तु उसने स्वयं धरती में बुराई फैलाना आरंभ कर दिया था।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 5 और 6 की तिलावत सुनते हैं।

    فَإِذَا جَاءَ وَعْدُ أُولَاهُمَا بَعَثْنَا عَلَيْكُمْ عِبَادًا لَنَا أُولِي بَأْسٍ شَدِيدٍ فَجَاسُوا خِلَالَ الدِّيَارِ وَكَانَ وَعْدًا مَفْعُولًا (5) ثُمَّ رَدَدْنَا لَكُمُ الْكَرَّةَ عَلَيْهِمْ وَأَمْدَدْنَاكُمْ بِأَمْوَالٍ وَبَنِينَ وَجَعَلْنَاكُمْ أَكْثَرَ نَفِيرًا (6)

    तो जब पहली बुराई सामने आ जाएगी तो हम शक्तिशाली और कड़ाई से युद्ध करने वाले अपने कुछ बंदों को तुम्हारे विरुद्ध लड़ने के लिए भेजेंगे तो वे बस्तियों में जा कर खोज करेंगे और हमारा यह वचन पूरा होकर रहेगा।(17:5) इसके बाद हम युद्ध को तुम्हारे हित में और उनके विरुद्ध पलटा देंगे और माल व संतान से तुम्हारी सहायता करेंगे और तुम्हारे लोगों की संख्या को भी उनसे अधिक कर देंगे।(17:6)

    पिछली आयत में बनी इस्राईल द्वारा धरती में दो बार बुराई फैलाने की सूचना दी गयी थी ये आयतें कहती हैं कि ईश्वर ने वचन दिया है कि वह दोनों बार उन्हें दंडित करेगा और उसका यह वचन अटल है। ऐतिहासिक पुस्तकों में वर्णित है कि लगभग छः सौ वर्ष ईसा पूर्व, बैबिलोनिया के क्षेत्र पर बुख़्तू नस्र नामक राजा शासन करता था और उसका शासन अत्यंत शक्तिशाली था। जब उसने बनी इस्राईल जाति की उद्दंडता को देखा तो उनके नगरों और बस्तियों पर आक्रमण कर दिया। जब तक बुख़्तू नस्र जीवित रहा तब तक बनी इस्राईल उसकी क़ैद में बड़े अपमान के साथ बैबिलोनिया में जीवन बिताते रहे, यहां तक कि ईरान के शासक साइरस ने बैबिलोनिया पर नियंत्रण कर लिया और यहूदियों को रिहा कर दिया। साइरस ने बनी इस्राईल को उनकी पवित्र धरती की ओर लौटने और अपने नगरों व बस्तियों के पुनर्निमाण की अनुमति दी।

    जब बनी इस्राईल के लोग अपनी मातृभूमि में पुनः पहुंच गये तो धीरे-धीरे उनकी शक्ति में वृद्धि होने लगी और साथ ही उनकी जनसंख्या भी बढ़ने लगी, यहां तक कि दूसरी बार रोम के शासक ने बैतुल मुक़द्दस की ओर एक सेना भेजी जिसने बनी इस्राईल को अपने नियंत्रण में ले लिया। रोम के शासक ने आदेश दिया कि बैतुल मुक़द्दस को ध्वस्त और लोगों के घरों व बस्तियों को तबाह करके उन्हें लूट लिया जाए।

    इन आयतों से हमने सीखा कि उद्दंडियों को यह बात समझ लेनी चाहिए कि उनसे भी अधिक शक्तिशाली बहुत से लोग हैं। बनी इस्राईल ने उद्दंडता की तो ईश्वर ने उनसे अधिक शक्तिशाली लोगों को उन पर वर्चस्व प्रदान कर दिया।

    वास्तविक तौबा, व्यक्तिगत भी होती है और सामूहिक भी, यही कारण है कि यदि कोई समूह अपने अतीत से तौबा व प्रायश्चित कर ले तो ईश्वर उन्हें अपनी दया व कृपा का पात्र बनाता है।